Badi Tamanna Thi ki Koi Tarashta Mujhko..
Sari Umar maine ye khwab sajane me guzar di..
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Library Of Ghazal-kavita-nazam-sher by Indian Poets.
Wo ab paani ko tarsenge,
Jo Ganga chhod aaye hai.n...
Hare jhande ke chakkar mai,
Tiranga chhod aaye hai.n....
- Rahat Indori
मै दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है।
हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है॥
यहाँ पर नफरतो ने कैसे-कैसे गुल खिलाये हैं।
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है॥
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती।
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है॥
कई चेहरे अभी तक मुँह जबानी याद है इसको।
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूँगा बोल सकता है॥
बहोत सी कुर्सिया इस मुल्क मे लाशों पे रक्खी है।
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है॥
मुनव्वर राना
Uss ki aankhain balaa ki taajer hain
Jis ko dekhain khareed leti hain.
(Unknown)
Tumhara naam kisi ajnabi ke lab par tha
Zara si baat thi dil ko magar lagii hai bahut
बदला न अपने-आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
पहले जैसा रंग नहीं है जीवन की रंगोली में।
जाने कितना ज़हर भरा है अब लोगों की बोली में।
सबको अपना जान के तुम सब पर विश्वास नहीं करना ,
दोस्त नहीं दुश्मन भी शामिल होते हैं हमजोली में।
मर के भी ज़िंदा रहने का कोई तो उपचार करो ,
सारा जीवन बीत न जाये यूँ ही आंखमिचौली में।
सागर को तालाब की सोहबत होती है स्वीकार नहीं ,
शामिल कोई हंस नहीं होता गिद्धों की टोली में।
दौरे नौ में हर भोली सूरत को फूल नहीं समझो ,
एक भयानक दृश्य छुपा होता है सूरत भोली में।
सारे त्योहारों की रौनक महंगाई की नज़्र हुई ,
पहले जैसा लुत्फ़ कहाँ अब ईद ,दिवाली,होली में।
फूल बिना पौधे की हर इक शाख " अनिल " यूँ लगती है ,
जैसे बिन भांवर ही दुल्हन बैठ गई हो डोली में।
अनिल रस्तोगी
बदायूँ ( उत्तर प्रदेश )
22/07/2015
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
उसे ज़िन्दगी क्यूँ न भारी लगे
न छोड़े महब्बत दम-ए-मर्ग लग
जिसे यार-ए-जानीं सूँ यारी लगे
न होए उसे जग में हरगिज़ क़रार
जिसे इश्क़ की बेक़रारी लगे
हर इक वक़्त मुझ आशिक़-ए-पाक कूँ
पियारे तेरी बात प्यारी लगे
‘वली’ कूँ कहे तू अगर एक बचन
रक़ीबाँ के दिल में कटारी लगे
वली दक्कनी
सर से चादर बदन से क़बा ले गई
ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई
मेरी मुठ्ठी में सूखे हुये फूल हैं
ख़ुशबुओं को उड़ा कर हवा ले गई
मैं समुंदर के सीने में चट्टान था
रात एक मौज आई बहा ले गई
हम जो काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुये
क्यों चिराग़ों की लौ तक हवा ले गई
चाँद ने रात मुझको जगा कर कहा
एक लड़की तुम्हारा पता ले गई
मेरी शोहरत सियासत से महफ़ूस है
ये तवायफ़ भी इस्मत बचा ले गई
बसीर बद्र साहब
12/05/2015
पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
और फिर पूरी काएनात बना
हुस्न ने ख़द कहा मुसव्विर से
पाँव पर मेरे कोई हाथ बना
प्यास की सल्तनत नहीं मिट्टी
लाख दजले बना फ़ुरात बना
ग़म का सूरज वो दे गया तुझ का
चाहे अब दिन बना की रात बना
शेर इक मश्ग़ला था ‘कासिर’ का
अब यही मक्सद-ए-हयात बना
गुलाम मोहम्मद क़ासिर
08/05/2015
मैं न मैं, तू न तू, लगा मुझको
ऐसा क्या हो गया बता, मुझको
कम लगे आसमां भी उड़ने को
तूने ये कह दिया है क्या मुझको
रात तेरी भी जागते गुज़री
रात भर ऐसा क्यूँ लगा मुझको
जब से तेरा करम हुआ मुझपे
बददुआ भी लगे दुआ मुझको
क्या बिछड़ने का वक़्त आया है
वो समझने लगा ख़ुदा मुझको
- डॉ प्रेम भंडारी
03/05/2015
जब कोई उतरा नहीं मयार पर
फैसला छोड़ा गया तलवार पर
आ रहें हैं फिर फरिश्ते शहर में
लग गए हैं पोस्टर दीवार पर
बादबा का और हवा का एक मिजाज
अब भरोसा कीजिये पतवार पर
एक सुहागन आज फिर जल कर मरी
आँख से आंसू गिरे अखबार पर
खुश दिली से उनकी बातें मान ले
सर कलम हो जायेगा इनकार पर
पर लगा कर उड़ रही है कीमते
किस का साया पड़ गया बाजार पर
-मलिक् जादा जावेद
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