Swaraj Abhiyan in Media

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Swaraj Abhiyan News In Media and important updates about SA.

Clipping of jagbani.com - Navodaya Times Main 02/02/2018

जहां तक किसानों का संबंध है, इस बजट में व्यापक रूप में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी झलक रही है। अब किसानों ने यह फैसला लेना है कि उन्होंने इस बजट को स्वीकार करना है या नहीं। यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो इसके विरुद्ध संघर्ष करना ही एकमात्र रास्ता होगा।

Clipping of jagbani.com - Navodaya Times Main Dated 02 Feb 2018

12/08/2017

जयराम रमेश का सवाल और कांग्रेस की चुप्पी !

कड़वे सच की निशानी यही है कि उसे बोलने वाले को बहुत कुछ सुनना पड़ता है। ऐसा सच जितना गहरा होता है उतना ही तकलीफदेह भी। इसीलिए उस संदेश को पढऩे और उस तकलीफ को झेलने की बजाय अक्सर लोग डाकिए को गोली मारना पसंद करते हैं।

ऐसा ही कुछ जयराम रमेश के साथ हुआ है। एक इंटरव्यू में उन्होंने यह मान लिया कि आज कांग्रेस पार्टी के सामने उसके अस्तित्व का संकट है। यह संकट सिर्फ चुनावी हार का नहीं है जैसा कि 1977 या फिर 1989 या फिर 1998 में कांग्रेस ने झेला था। आज कांग्रेस का संकट उससे कहीं गहरा है। जयराम रमेश ने यह भी कह दिया कि सल्तनत तो चली गई लेकिन कांग्रेसियों का सुल्तानी रवैया नहीं गया। अब भला इस बात को कौन नहीं जानता। हर पत्रकार, हर नेता और हर कांग्रेसी कार्यकत्र्ता आपको यही कहता मिल जाएगा। जयराम रमेश का कसूर यह है कि जो बात बंद कमरे में कहनी चाहिए वह उसने खुल कर कह दी। बात सच थी इसीलिए चुभ गई। बस कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेता अब जयराम रमेश पर पिल पड़े हैं। कोई कहता है कि वह तो खुद सुल्तान हैं।

कोई कहता है कि उन्हें पिछले दरवाजे से एंट्री मिल गई थी इसीलिए ऐसी बात करते हैं। कोई उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर रहा है। अभी तक किसी ने यह नहीं कहा कि उन्होंने झूठ बोला। यहां असली सवाल जयराम रमेश का नहीं है, उनके बयान पर उठा तूफान चुपचाप से कांग्रेसी अंदाज में दफना दिया जाएगा यानी असली मुद्दे पर चर्चा कभी नहीं होगी। कांग्रेस भले ही इस सवाल का सामना न करे लेकिन शेष देश अब इस सवाल को टाल नहीं सकता। देश के भविष्य में कांग्रेस की क्या भूमिका होगी। आज नहीं तो कल क्या कांग्रेस देश के लिए एक सार्थक विकल्प बन सकती है? क्या बुनियाद पर हो रहे हमले का प्रतिकार करने में कांग्रेस एक अहम भूमिका निभा सकती है? यह सवाल कांग्रेस और कांग्रेसियों का नहीं है। यह देश के भविष्य का सवाल है।

इस सवाल का उत्तर देने से पहले एक गलतफहमी से मुक्त होना होगा। कई लोग ऐसा सोचते हैं कि कांग्रेस की समस्या सिर्फ उसके नेतृत्व की समस्या है। दबी जुबान में राहुल गांधी के बारे में जहर उगलने वाले कांग्रेसियों की कोई कमी नहीं है। अगर सोशल मीडिया को देखें तो ऐसा लगेगा कि राहुल गांधी ही कांग्रेस की सारी समस्याओं की जड़ हैं। मुझे हमेशा यह सोच बहुत अधूरी लगती रही है। राहुल गांधी न तो वैसे भोंदू हैं, न ही उतने बदनियत जैसा कि मीडिया उन्हें पेश करता है। इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी में वह संकल्प और राजनीतिक समझदारी नहीं है जिसकी जरूरत आज कांग्रेस पार्टी को है।

संकट यह नहीं है कि कांग्रेस जैसी पार्टी पर राहुल गांधी जैसा नेता काबिज है। संकट यह है कि आज की कांग्रेस पर राहुल गांधी जैसा नेता ही काबिज हो सकता है। जनाधार वाले नेता अब इस पार्टी के शीर्ष के नजदीक पहुंच ही नहीं सकते। वैचारिक आग्रह वाला व्यक्ति इस कांग्रेसी गाड़ी का ड्राइवर नहीं बन सकता। राहुल गांधी कांग्रेस के संकट का कारण नहीं, प्रतिबिम्ब भर हैं। पहला सच यह है कि आज कांग्रेस का संकट ऊपर से नीचे तक है। शीर्ष नेता से लेकर सड़क के कार्यकत्र्ता तक कहीं कोई संकल्प नहीं दिखता। आज भाजपा में और कुछ हो न हो, सत्ता की भूख जरूर है। कांग्रेसियों में बैठे-बिठाए सत्ता की लालसा जरूर है लेकिन सत्ता पाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करने की इच्छा भी नहीं है। कांग्रेस का संकट अंतत: दृष्टि के अभाव का संकट है।

आज कांग्रेस खुद नहीं जानती कि मुद्दे पर पार्टी कहां खड़ी है। मोदी सरकार की गैर-लोकतांत्रिक हरकतों का विरोध करना तो आसान काम है। लेकिन क्या एमरजैंसी के गुणगान करने वाली और गांधी परिवार से बंधी कांग्रेस सचमुच लोकतंत्र की हिमायत कर सकती है? नोटबंदी या जी.एस.टी. पर भाजपा सरकार की नीतियों का विरोध करना एक बात है। लेकिन क्या कांग्रेस के पास इन नीतियों का कोई विकल्प है? क्या कांग्रेस उस आर्थिक सोच से बाहर आने को तैयार है, जो मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों की आॢथक नीतियों का आधार रही है? आज भाजपा और कांग्रेस में बस एक अंतर दिखाई देता है। भाजपा खुलकर मुसलमान विरोधी है और सभी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध द्वेष भड़काने में लगी है। कांग्रेस के कार्यकत्र्ता की मानसिकता भाजपा से बहुत अलग नहीं है लेकिन कांग्रेस के नेता अल्पसंख्यकों की तरफदारी करते हैं और इस नाते सैकुलर कहलाना चाहते हैं।

कांग्रेस के इस सैकुलर चोगे के पीछे लोगों को वैचारिक आग्रह कम और वोट की मजबूरी ज़्यादा दिखाई देती है। कांग्रेस न तो हिंदू जनमानस में सैकुलर भारत के लिए समर्थन जुटा पा रही है और न ही अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव जगा पा रही है। सैकुलर भारत के सपने को बचाने की बजाय कांग्रेस इस विचार को बदनाम करने का औजार बन गई है। जहां दृष्टि नहीं है वहां दिशा बोध कैसे होगा? चाहे बिहार के गठबंधन का मामला हो या 2019 का चुनाव, कांग्रेस के पास रणनीति नाम की वस्तु है ही नहीं। गुजरात में अपने ही विधायकों से अपने ही दरबारी नेता के पक्ष में वोट डलवा लेना ही इस पार्टी के लिए उपलब्धि बन गया है। आज की कांग्रेस पार्टी भाजपा के सत्ता में बने रहने की सबसे बड़ी गारंटी है। न तो कांग्रेस खुद भाजपा का विकल्प बन सकती है और न ही वह कोई विकल्प बनने देगी। आज देश में जगह-जगह किसानों, युवाओं, दलित, आदिवासी समाज और विद्यार्थियों के आंदोलन खड़े हो रहे हैं।

कांग्रेस न तो इन आंदोलनों को राजनीतिक दिशा देगी और न ही इनसे एक नई राजनीति खड़ी होने देगी। सच यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह भले ही कांग्रेस मुक्त भारत की कितनी ही बात कर लें, वे नहीं चाहेंगे कि देश सचमुच कांग्रेस से मुक्त हो। वे चाहेंगे कि एक प्राणहीन व दिशाहीन कांग्रेस बची रहे, पड़ी रहे ताकि भाजपा का कोई सच्चा विकल्प खड़ा न हो पाए। इस कांग्रेस को वही सुझाव दिया जा सकता है जो महात्मा गांधी ने आजादी से पहले कहा था-देशहित में कांग्रेस पार्टी को भंग कर देना चाहिए। अपने वर्तमान स्वरूप में इस पार्टी का भंग होना ही देश के लिए श्रेयस्कर है।

05/08/2017

'Panama Papers' which led to dismissal of various heads of the countries are being quietly buried by the Indian government. Why? Join Prashant Bhushan to know the Untold Story of
at 7:00 pm today.

01/08/2017

फसल बीमा का घोटाला :

पिछले दो साल में मैंने सरकार की फसल बीमा योजना के बारे में यह बात कई बार सुनी है कि- 'भाई साहब, यह किसान की फसल का बीमा नहीं है. यह तो बैंकों ने अपने लोन का बीमा करवाया है.' साल 2015 से लेकर अब तक जय किसान आंदोलन के साथियों के साथ मिल कर मैंने देशभर में ‘किसान मुक्ति यात्रा’ की. ये यात्राएं उन्हीं इलाकों में हुईं, जहां किसानों पर सूखे या बाजार की मार पड़ी थी. हर सभा में मैं पूछता था, 'क्या किसी किसान को बीमे का भुगतान हुआ?' अधिकांश किसानों ने तो बीमे का नाम ही नहीं सुना. जो किसान क्रेडिट कार्ड वाले थे, उनमें से कुछ पढ़े-लिखे किसानों को पता था कि उनके खाते से बीमे का प्रीमियम कटा है. सैकड़ों सभाओं में मुझे एक-दो से ज्यादा किसान नहीं, मिले जिन्हें कभी बीमे का मुआवजा मिला.

धीरे-धीरे मुझे फसल बीमा का गोरखधंधा समझ आने लगा. जिस किसान ने बैंक से लोन लिया है, उसके बैंक खाते से जबरदस्ती बीमा का प्रीमियम काट लिया जाता है.

यही नहीं बीमाधारक किसान को बीमा पॉलिसी जैसा कोई भी दस्तावेज तक नहीं दिया जाता. यानी किसान को पता भी नहीं होगा कि उसका बीमा हो चुका है और उसे कब कितना मुआवजा मिल सकता है. अगर पता लग भी गया, तो मुआवजा लेने की असंभव शर्तें हैं. अगर आपकी फसल बरबाद हो गयी, तो मुआवजा पाने के लिए आपको यह साबित करना पड़ेगा कि आपकी तहसील या पंचायत में कम-से-कम आधे किसानों की फसल भी बरबाद हुई है.

पिछले हफ्ते एक साथ कई सूचनाएं सार्वजनिक होने से फसल बीमा योजना का पर्दाफाश हो गया. महा लेखाकार (सीएजी) ने 2011 और 2016 के बीच तमाम फसल बीमा योजनाओं के ऑडिट की रिपोर्ट संसद के सामने रखी.

और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसइ) ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पहले साल का मूल्यांकन करते हुए एक रिपोर्ट छापी. साथ में संसद के इस सत्र में सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के नवीनतम आंकड़े सदन के पटल पर रखे. इन तीनों स्रोतों से साफ जाहिर होता है कि सरकारी फसल बीमा योजना किसान के साथ कितना भद्दा मजाक है.

सीएजी का ऑडिट ऑडिट 2011 से 2016 के बीच चल रही तमाम सरकारी फसल बीमा योजनाओं के बारे में है. ‘राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’, ‘संशोधित राष्ट्रीय किसान बीमा योजना’, ‘मौसम आधारित फसल बीमा योजना’ जैसी इन योजनाओं से किसान का कोई भला नहीं हुआ.
दो तिहाई किसानों को सरकारी योजनाओं की जानकारी भी नहीं थी. देश के 22 प्रतिशत किसानों का ही बीमा किया जा सका, वह भी सर्वश्रेष्ठ साल में. बीमाधारकों में 95 प्रतिशत से अधिक किसान वो थे, जिन्होंने बैंकों से ऋण लिया. अधिकतर मामलों में बीमे की राशि ठीक उतनी ही थी, जितना बैंक का बकाया ऋण था. यानी किसान कार्यकर्ताओं की शिकायत वाजिब थी. बैंक मैनेजरों ने ऋण की वापसी सुनिश्चित करने के लिए किसान से बिना पूछे, बिना बताये उनका बीमा करवा दिया.

सीएजी की रिपोर्ट इस आरोप की भी पुष्टि करती है कि बीमे का मुआवजा बहुत कम किसानों तक पहुंचा है. कभी सरकार ने अपने हिस्से का प्रीमियम नहीं दिया, तो कभी बैंक ने देरी की. सरकारी और प्राइवेट बीमा कंपनियों ने खूब पैसा बनाया. रिपोर्ट प्राइवेट बीमा कंपनियों के घोटाले की ओर भी इशारा करती है. सरकार ने कंपनियों को पेमेंट कर दिया, लेकिन कंपनियों ने किसान को पेमेंट नहीं किया. कंपनियों से यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट तक नहीं मांगा गया. नियमों का उल्लंघन करते पकड़ी गयी कंपनियों को ब्लैक लिस्ट नहीं किया गया. किन किसानों को पेमेंट हुई, उसका रिकॉर्ड तक नहीं रखा गया.

अगर आप मोदी सरकार से इस रिपोर्ट के बारे में पूछें तो हमारे मंत्री कहेंगे कि यह तो पुरानी बात है. पुरानी योजनाएं अब बंद हो गयी हैं. अब इनके बदले नयी ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ आ गयी है. केंद्र सरकार ने इस नयी योजना में पिछले साल के तुलना में चार गुना पैसा खर्च किया.

लेकिन बीमाधारी किसानों की संख्या 22 प्रतिशत से बढ़ कर 30 प्रतिशत ही हो पायी. इस योजना में भी लोनधारी किसानों को ही शामिल किया गया. पिछली योजनाओं की तरह छोटे किसान और बटाइदार इस योजना के लाभ से भी वंचित रहे हैं. योजनाओं के नाम बदल जाते हैं, पर सरकारी काम नहीं बदलते.

हां, इस साल कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफा जरूरकमाया. लोकसभा में 18 जुलाई को दिये गये उत्तर के अनुसार, 2016 की खरीफ फसल ने कंपनियों को किसानों और सरकारों से कुल मिला कर 15,685 करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला और अब तक किसानों को सिर्फ 3634 करोड़ रुपये के मुआवजे का भुगतान किया गया.

इसका कारण सिर्फ अच्छी बारिश और फसल नहीं थी. तमिलनाडु में रबी की फसल में पिछले 140 साल का सबसे भयानक सूखा पड़ा. वहां कंपनियों को 954 करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला और अब तक सिर्फ 22 करोड़ रुपये के मुआवजे का भुगतान हुआ है.

31 जुलाई को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत खरीफ का बीमा करवाने की अंतिम तारीख थी. बीमा कंपनियां, बैंक मैनेजर, सरकारी बाबू और नेता- सब फसल बीमा के लिए लालायित हैं, सिवाय बेचारे किसान के.

Photos 27/07/2017

किसान की फसल का बीमा ये बैंकों के लोन का बीमा?
Yogendra Yadav का लेख

Photos 11/07/2017

Outstanding loan of scheduled commercial banks in agriculture is one-third of Industry still government & banks force farmers of this country to pay back at a time when they face such adverse agrarian crisis.
Source : RBI (*Data till March 2016)

Photos from Yogendra Yadav's post 06/07/2017
05/07/2017
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