Aap Ka Aur Hamara Corruption free Bharat

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We want Our Country Corruption free politics,equally distribution,Pollution free,greenery and good educated people.We Love Our Country Very Much...!!

Photos from Aap Ka Aur Hamara Corruption free Bharat's post 02/10/2024

**अमूल दूध पैकेट की खराब गुणवत्ता: प्रशासनिक असफलता का उदाहरण**

हमारी रोजमर्रा की ज़रूरतों में दूध एक आवश्यक वस्तु है, और भारत में अमूल का नाम गुणवत्ता के साथ जुड़ा हुआ है। लेकिन हाल ही में मेरे साथ हुई एक घटना ने इस विश्वास को थोड़ा झकझोर दिया। मैंने 1 अक्टूबर 2024 को एक स्थानीय विक्रेता से अमूल दूध का पैकेट खरीदा, और हैरानी की बात यह है कि इस पैकेट की उपयोग की अंतिम तिथि 2 अक्टूबर 2024 थी – यानी, सिर्फ एक दिन का समय।

यह घटना केवल मेरे साथ ही नहीं, बल्कि यह एक बड़ी प्रशासनिक असफलता को दर्शाती है। दूध जैसी ज़रूरी चीज़, जिसे लोग ताज़ा और लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए खरीदते हैं, उसके साथ इस तरह की लापरवाही कैसे हो सकती है? आखिर कौन इसका जिम्मेदार है?

हमारे स्थानीय विक्रेता और संबंधित प्रशासन को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ग्राहक को सही समय पर और सही गुणवत्ता का उत्पाद मिले। अगर उत्पाद की वैधता इतनी कम है, तो ग्राहकों को पहले से जानकारी दी जानी चाहिए या इस तरह के पैकेट बाजार में बिकने ही नहीं चाहिए।

यह केवल उपभोक्ता के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह भरोसे का सवाल भी है। प्रशासन को ऐसे मामलों में कड़ी निगरानी और कार्रवाई करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।

आप सब से अनुरोध है कि अगर आपके साथ भी ऐसा कोई अनुभव हो, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें और अपनी आवाज़ उठाएं। हमारे अधिकारों की सुरक्षा के लिए जागरूक होना बेहद ज़रूरी है।

#अमूल #प्रशासनिक_असफलता #उपभोक्ता_अधिकार #दूध_की_गुणवत्ता #स्वास्थ्य

24/09/2024

Dosto yaha khasi ki dabi ka bill h Maine apne expart se iski banne ki cost puchi to aap haran ho jayega iski banne ki cost hai 40 rs. Se bhi cm Jo mujhe 620 rs. Main di g*i main aap logo se puchna chahta hu iska jimedar kon h Bill upar laga hua hai ?

08/01/2021

क्या क्या हो जाता है 59 मिनट में साहेब ?

प्रधानमंत्री ने जैसे ही एलान किया कि अब छोटे व मझौले उघोगों [ एमएसएमई ] को 59 मिनट में एक करोड़ तक का कर्ज मिल जायेगा । वैसे ही एक सवाल तुरंत जहन में आया कि देश में एक घंटे से कम में क्या क्या हो जाता है । सरकारी आंकडों को ही देखने लगा तो सामने आया कि हर आंधे घंटे में एक किसान खुदकुशी कर लेता । हर 15 मिनट में एक बलात्कार हो जाता है । हर सात मिनट में एक मौत सड़क हादसे में हो जाती है । हर मिनट प्रदूषण से 4 से ज्यादा मौत हो जाती है । दूषित पानी पीने से हर दो मिनट में एक मौत होती
है । इलाज ना मिल पाने की वजह से हर पांच मिनट में एक मौत हो जाती है । हर बीस में किसी एक के डूबने से मौत हो जाती है । आग लगने से हर तीस मिनट में एक मौत हो जाती है । हर बीस मिनट में तो जहर से भी एक मौत होती है । हर 12 वें मिनट दलित उत्पीड़न की एक धटना होती है । हर तीसरे सेंकेंड महिला से छेड़छाड़ होती है । यानी एक घंटे से कम 59 मिनट में एक करोड़ का लोन आकर्षित करने से ज्यादा त्रासदीदायक इसलिये लगता है क्योंकि पटरी से उतरे देश में कौन सा रास्ता देश को पटरी पर लाने के लिये होना चाहिये उस दिशा में ना कोई सोचने को तैयार है ना ही किसी के पास पालिटिकल विजन है । यानी सत्ता चौंकाती है । सत्ता अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती है । सत्ताअपने होने के एहसास को जनता पर लादना चाहती है । जनता कभी इस हाथ कभी उस हाथ लुटे के सियासी रास्ते बनाने में ही पांच बरस गुजार देती है । और ये बरसों बरस से हो रहा है । तो निराशा होगी । ऐसे में मौजूदा सत्ता ने निराशा और आशा के बीच उस कील को ठोंकना शुरु किया है जिसमें राजनीतिक सत्ता पाने के तौर तरीके पारंपरिक ही रहे । लेकिन सत्ता के तौर तरीके अपने तंत्र को ही राष्ट्रीय तंत्र बना दे।

यानी सवाल ये नहीं है कि कि 59 मिनट में एक करोड़ का लोन मिल जाये । कानून बनाकर भीड तंत्र पर नकेल कसने की बात की जाये । रिजर्व बैक को राजनीतिक तौर पर अमल में लाने के लिये पुरानी विश्व बैंक या आईएमएफ की धारा को बदलने की जरुरत बताने की कोशिश की जाये । पुलिस-जांच एंजेसी की अराजकता को उभार कर सत्ता नकेल कसने के लोकप्रिय अंदाज को अपना लें । ध्यान दीजिये तो सत्ता अपनी मौजूदगी देश के हर उस छेद को बंद कर दिया जाये या रफू करने के नाम पर ये कहकर कर रही है । लेकिन सत्ता की मौजूदगी हर छेद को और बड़ा कर दे रही है । तो क्या ये रास्ता उस संघर्ष की दिशा में जा रहा है, जहां जनता को राहत के लिये राजनीतिक सत्ता की तरफ ही देखना पड़े और सत्ता पहले की तुलना में कहीं ज्यादा ताकतवर हो जाये । यानी चुनावी लोकतंत्र ही हिन्दुत्व हो । वही समाजवाद हो । वही विकास का प्रतीक हो । वही सेक्यूलर हो । वही सबका साथ सबका विकास का जिक्र करें । पहली सोच में ये असंभव सा लग सकता है लेकिन सत्ता के तौर तरीकों से ही समझे तो इस धारा को समझने में मुश्किल नहीं होगी ।

याद कीजिये मोदी सरकार का पहला बजट । कारपोरेट/उद्योगों के लिये रास्ता खोलता बजट । भाषण देते वक्त वित मंत्री ये कहने से नहीं चूकते कारपोरेट और इंडस्ट्री के पास धंधा करने का अनुकुल रास्ता बनेगा तो ही किसान- मजदूरों के लिये उनके जरीये पूंजी निकलेगी । फिर दूसरा बजट जिसमें उघोग और खेती में बैलेंस बनाने की बात होती है । लेकिन खेती को फिर भी कल्याण योजनाओ से ही जोड़ा जाता है । और तीसरे बजट में अचानक किसानों की याद कुछ ऐसी आती है कि कारपोरेट और इंडस्ट्री से इतर एनपीए का घड़ा यूपीए सरकार के माथे फोड कर मुश्किल हालात बताये जाते है । और चौथे बजट में मोदी सरकार किसानों की मुरीद हो जाती है और लगता है कि देश में चीन की तरफ कृषि क्रांति की तैयारी मोदी सरकार कर रही है । लेकिन बजट के बाद सभी को समझ में आ जाता है कि सरकार का खजाना खाली हो चुका है । इक्नामी डावाडोल है । और पांचवे बरस सिर्फ बात बनाकर ही जनता को मई 2019 तक ले जाना है । यानी बजट भाषण और बजट में अलग अलग मद में दिये गये रुपयों को ही कोई पढ़ लें तो समझ जायेगा कि 2014 में जो सोचा जा रहा था वह 2018 में कैसे बिलकुल उलट गया । तो ऐसे में फिर लौटिये 59 मिनट में एक करोड तक के लोन पर । संघ के करीबी गुरुमुर्त्ती ने रिजर्व बैंक का डायरेक्टर बनने के बाद बैंकों की कर्ज देने की पूर्व और पारंपरिक नीति को सिर्फ इस आधार पर बदल दिया कि कारोपरेट और उघोगपति अगर कर्ज लेकर नहीं लौटाते हैं तो फिर छोटे और मझौले इंडस्ट्री को भी ये हक मिलना चाहिये । यानी देश में उत्पादन ठप पडा है । नोटबंदी के बाद 50 लाख से ज्यादा छोटे-मझोले उघोग बंद हो गया । अंसगठित क्षेत्र के 25 करोड लोगों पर सीधा तो 22 करोड़ लोगों पर अप्रत्यक्ष तौर पर कुप्रभाव पडा । यानी एक करोड के कर्ज को इसलिये बांटने का प्रवधान बनाया जा रहा है जिससे देश की लूट में हिस्सेदारी हर किसी को हो । ये हिस्सेदारी जनधन से शुरु होकर स्टार्ट-अप तक जाती है । यानी बैंकों से मोदी नीति के नाम पर रुपया निकल रहा है लेकिन वह रुपया ना तो वापस लौटेगा और ना ही उस रुपये से कोई इंडस्ट्री , कोई उघोग , कोई स्टार्ट-अप शुरु हो पायेगा । बल्कि बेरोजगारी और ठप इक्नामी में राहत के लिये बैंकों को बताया जा रहा है कि सभी को रुपया बांटो ।

क्योकि जनता में गुस्सा ना हो । और जिसमें गुस्सा हो उसे दबाने के लिये मोदी नीति से राहत पाया शख्स ही बोले । यानी आर्थिक नीति कौन सी है ? स्वायत्त संस्थाओ का काम क्या है । क्योकि कानून के दायरे में काम होता नहीं और जहा कानून है वहा भीडतंत्र काम करते हुये नजर आता है । ऐसा नहीं है कि सारी गडबडी मोदी सत्ता के वक्त ही हुई । लेकिन पारंपरिक गडबडियो के आसरे ही सत्ता अगर देश चलाने लगेगी तो फिर गड़बडियां या अराजक हालात ही गवर्नेंस कहलायेगी। ध्यान दीजिये हो यही रहा है । सीबीआई के लिये कोई कानून है ही नही । कांग्रेस ने सीबीआई के जरीये काम कराये । तो मोदी सत्ता खुद ही सीबीआई बन गई। रिजर्व बैंक की नीति को मंनमोहन सिंह के दौर में आवारा पूंजी के साथ खड़े होने की खुली छूट दी गई। कारोपरेट की लूट को हवा मनमोहन सिंह के दौर में बाखूबी मिली। लेकिन मोदी सत्ता के दौर में सत्ता ही कारपोरेट हो गई । यानी कल तक जिन माध्यम के आसरे सत्ता निरकुंश या मनमानी करती था वह आज खुद ही हर माध्यम बन रही है । य़े ठीक वैसे ही है जैसे कभी करप्ट और अपराधियों के आसरे सत्ता में आया जाता था । पर धीरे धीरे करप्ट और आपराधिक तत्व चुनाव लड जितने लगे और खुद ही सत्ता बन गये। तभी तो देश में कानून या नीतियां बनती कैसे हैं, उसका एक नजारा ये भी है कि दिल्ली की निर्भया रेप कांड के बाद कड़ा कानून बना लेकिन बरस दर बरस रेप बढ़ते गये । 2013 में [ निर्भया कांड का बरस ] 33,707 रेप हुये तो 2017 में बढते बढते चालिस हजार पार कर गये । इसी तरह शिक्षा के अधिकार पर कानून। भोजन के अधिकार पर कानून , दलित अत्याचार रोकने पर कानून से लेकर 34 क्षेत्र के लिये बीते 10 बरस यानी 2009 के बाद कानून बना । लेकिन कानून बनने के बाद घटनाओ में तेजी आ गई । ज्यादा बच्चों स्कूल छोडने लगे । आलम ये है कि स्कूलो में दाखिला लेने वाले 18 करोड बच्चों में से सिर्फ 1 करोड 44 लाख बच्चे ही बारहवीं की परीक्षा दे पाते है । दो जून की रोटी के लाले ज्यादा पडे । हालात ये है कि 20 करोड लोगों तक 2013 में बना भोजन का अधिकार पहुंच ही नहीं पाया है । यहा तक की मनरेगा का काम भी गायब होने लगा । तो फिर इस कडी में कोई भी ये सवाल भी कर सकता है कि जब गवर्नेंस गायब है । पॉलिसी पैरालाइसिस है । या सबकुछ है और सबकुछ का मतलब ही सत्ता है तो फिर ? तो फिर का मतलब यही है कि सत्ता पर निगरानी के लिये लोकपाल और लोकायुक्त कानून भी 16 जनवरी 2014 को बना था और उसके बाद सत्ता तो नहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अलग अलग तरीके से पांच बार सत्ता से पूछा, लोकपाल का क्या हुआ । और सुप्रीम कोर्ट के तेवर और सत्ता की मस्ती देखिये । सुप्रीम कोर्ट 23 नवंबर 2016
को कहता है लोकपाल की नियुक्ति में देरी क्या ? फिर 7 दिसबंर 2016 को पूछता है लोकपाल की नियुक्ति के लिये अब तक क्या हुआ ? फिर 27 अप्रैल 2017 को निर्देश देता है , लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को अटकाया ना जाये । उसके बाद 17 अप्रैल 2018 को कहता है , लोकपाल की नियुक्ति जल्द से जल्द हो । और 2 जुलाई 2018 को तो सीधे कहता है , 10 दिन में बताए कबतक बनेगा लोकपाल ? और 2 जुलाई के बाद देश में स्वायत्त संस्था से लेकर सुप्रीम कोर्ट में क्या क्या हुआ ये किसी से छिपा नहीं है । यानी संकेत साफ है जब सत्ता संविधान की व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट को टरका सकती है और खुद को ही सीबीआई, सीवीसी , रिजर्व बैक से लेकर चुनाव आयोग में तब्दील कर सकती है तो उसमें आपकी क्या बिसात ?
आप और हम

25/03/2020

स्वयसेवक की किस्सागोई - पार्ट 4 ....... पंडित जी रणनीति और तिकडम मिल जाये तो साहेब की साख को आप डिगा नहीं सकते

2014 का जनादेश ही क्यो ? उसके बाद कमोवेश 18 राज्यो के चुनाव पर भी गौर करें और फिर सोचना शुरु करें बीजेपी के पास क्या वाकई कभी कोई ऐसा तुरुप का पत्ता रहा है जो चुनाव प्रचार के मैदान में उतरता है तो सारे समीकरण बदल जाते है । वाजपेयी जी भाषण अच्छा देते थे । लोग सुनते थे । लेकिन भाषण के सुखद क्षण वोट में तब्दि हो नहीं पाते थे । लेकिन नरेन्द्र मोदी के शब्द वोट में तब्दिल हो जाते है । स्वयसेवक की ये बात प्रोफेसर साहेब को खटक गई तो बरबस बोल पडे इसका मतलब है संगठन कोई काम नहीं कर रहा है । बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह जिस तरह बूथ दर बूथ बिसात बिछाते है क्या उसे अनदेखा किया जा सकता है । या फिर आप इसे चुनावी जीत की ना हारने वाली जोडी कहेगें । हम कुछ कहेगें नहीं । सिर्फ ये समझने की बात है कि आखिर कैसे उसी बीजेपी में अमित शाह जीत दिलाने वाले तिकडमी मान लिये गये । उसी बीजेपी में आखिर कैसे मोदी सबसे प्रभावी संघ के संवयसेवक होते हुये भी विकास का मंत्र परोसने में ना सिर्फ कामयाब हो गये बल्कि जीत का आधार भी वहीं रहा ।
बात तो महोदय आप ठीक कह रहे है । मुझे इस बहस के बीच कूदना पडा । मोदी साढे चार बरस में अयोध्या नहीं गये । वह भी सत्ता के पांचवे बरस भी नहीं जा रहे है जब सरसंघचालक मोहन भागवत भी नागपुर से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का दबाव अपने शब्दो के जरीये बना रहे है ।
पंडित जी अभी दोनो तथ्यो को ना मिलाइये । पहले चुनावी प्रचार की रणनीति-तिकडम और मोदी-शाह की जोडी को समझे । क्यो संघ समझ गया है । मै ये तो नहीं कह सकता कि संघ कितना समझा है लेकिन प्रचार जिस रणनीति के आसरे चल रहा है वह बीजेपी के कार्यकत्ता को सक्रिय करने की जगह कुंद कर रहा है , इंकार इससे किया नहीं जा सकता ।
कैसे
इसे दो हिस्सो में समझना होगा । पहला , जब अमित शाह की बिसात है और नरेन्द्र मोदी सरीखा चेहरा है तो फिर बाकि किसी को करने की जरुरत ही क्या है । दूसरा , जिन जगहो पर बीजेपी कमजोर है वहा भी अगर जीत मिल रही है तो फिर मोदी-शाह की जोडी ही केन्द्र से लेकर राज्यो में काम करेगी । तो बाकियो की जरुरत ही या क्यों है ।
बाकि का मतलब ?
बाकि यानी केन्द्र में बैठे मजबूत चेहरे । जिनके बगैर कल तक बीजेपी कुछ नहीं लगती थी ।
मसलन
मसलन , राजनाथ सिंह , सुषमा स्वराज , मुरली मनोहर जोशी सरीखे कोई भी नाम ले लिजिये .....किसी की भी जरुरत क्या किसी भी विधानसभा चुनाव तक में पडी । या आपने सुना कि कोई नेता गया और उसने चुनावी धारा बदल दी । सबकुछ केन्द्रित है नरेन्द्र मोदी के ही इर्द गिर्द ।
प्रोफेसर साहेब जो बार बार बीच में कुछ बोलना चाह रहे थे । झटके में स्वयसेवक महोदय के तमाम तथ्यो को दरकिनार करते हुये बोले .... मै सिर्फ आपकी इस बात से सहमत हूं कि बाकि कोई नेता फिलहाल मायने नहीं रख रहा है लेकिन आप अब भी उस नब्ज को पकड नही पा रहे है जहा रणनीति और तिकडम मिल रही है । अब स्वयसेवक को बोलना पडा प्रोफेसर साहेब आप ही बताइये कैसे ।
देखिये मैने जो बीजेपी के चुनाव प्रचार का अध्ययन किया है उसके मुताबिक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनाव प्रचार की रणनीति बनाते वक्त तीन स्तर पर काम करते है लेकिन केन्र्दित एक ही स्तर पर होते है ।
कैसे , थोडा साफ करें ।
जी , अमित शाह किसी भी राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले पता लगाते है कि वह किस सीट को जीत नहीं सकते । उन सीटो को अपने दायरे से अलग कर राज्यो के कद्दावरो को कहते है आप इन सीटो पर जीत के लिये उम्मीदवार बताइये । जीत के तरीके बताइये । तो राज्य स्तर की पूरी टीम जो कल तक खुद को बीजेपी का सर्वोसर्वा मानती रही वह हार की सीटो को जीत में बदलने के दौरान अपने ही अध्यक्ष के सामने नतमस्तक हो जाती है । दूसरे स्तर पर जिन सीटो पर बीजेपी जीतती आई है उन सीटो पर अपने करीबी या कहे अपने भक्तो को टिकट देकर सुनिश्तिच कर लेते है कि राज्य में सरकार बनने पर उनके अनुसार ही सारी पहलकदमी होगी । और सारा ध्यान उन सीटोपर होता है जहा कम मार्जिन में जीत-हार होती है । या फिर कोई मुद्दा बीजेपी के लिये परेशानी का सबब हो और किसी इलाके में एकमुश्त हार की संभावना हो ।
जैसे ?
जैसे , गुजरात में सूरत या राजकोट के हालात बीजेपी के लिये ठीक नहीं थे । पटेल तो इन दोनो जगहो पर अमित शाह की रैली तक नहीं होने दे रहे थे । लेकिन चुनाव परिणाम इन्ही दोनो जगहो पर बीजेपी के लिये सबसे शानदार रहे ।
हां इसे ही तो स्वयसेवक महोदय रणनीतिक बिसात की सफलता और मोदी के प्रचार के जादू से जोड रहे है ।
प्रसून जी ये तर्क ना दिजिये .... जरा समझने की कोशिश किजिये । यू ही ईवीएम का खेल नहीं होता और दुनिया भर में ईवीएम को लेकर यू ही सवाल नहीं उठ रहे है । आप ईवीएम से समूचे देश को प्रबावित नहीं कर सकते है लेकिन जब आपने बीस से तीस फिसदी सीटो को लेकर रणनीति बनानी शुरु की तो ईवीएम का खेल भी वहीं होगा और बीजेपी का चेहरा भी प्रचार के आखरी दौर में वहीं चुनावी प्रचार करेगा । जिसके बाद जीत मिलेगी तो माना यही जायेगा कि ये बीजेपी के तुरुप के पत्ते का जादू है । यानी विकास की थ्योरी जिसे एक तरफ नरेन्द्र मोदी देश के सामने परोस रहे है और दूसरी तरफ संघ का एंजेडा मंदिर मंदिर कर रहा है तो जीत विकास की थ्योरी को मिलेगी । क्योकि तब आप उन क्षेत्रो में जाति या धर्म के आधार पर वोटो को बांच नहीं सकते । यानी खेल ईवीएम का होगा लेकिन मैसेज मोदी के प्रचार से समहति बनाते वोटरो का होगा ।
अब स्वयसेवक महोदय ने ही सवाल किया .... प्रोफेसर साहेब अगर मौजूदा हालात को आप सिर्फ ईवीएम के माथे मढ देगें तो फिर रास्ता निकलेगा नहीं । क्योकि याद किजिये गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में क्या हुआ था । कलेक्टर ने आखरी राउंड की गिनती के बाद काउंडिग रोक दी थी । और तब विपक्ष से लेकर मीडिया ने हंगामा किया तो क्लेक्टर को झुकना पडा । फटाफट नतीजो का एलान करना पडा ।
तो इससे क्या मतलब निकाले...
यही कि ईवीएम या चुनावी गडबडी का विरोध हो रहा है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ज्यादा होगा ।
न न मेरा कहना कम या ज्यादा से नहीं है । मेरा कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के जादू को जिस तरह विकास की थ्योरी के तौर पर लारजर दैन लाइफ बना कर बीजेपी या संघ परिवार भी पेश करने में लगा है उसके पीछे तकनालाजी की ट्रेनिग है ।
मुझे लगा अभी के हालात पर बात तो आनी चाहिये .....तो बह के बीच में कूदना पडा ....स्वयसेवक महोदय आपको अगर याद हो तो 2009 में बीजेपी जब चुनाव हाी तो ईवीएम का मुद्दा उसने भी उठाया था । और 2010 में तो बकायदा जीवीएल नरसिम्भा राव जो कि तब सैफोलोजिस्ट हुआ करते थे बकायदा ईवीएम के जरीसे कैसे लोकतंत्र पर खतरा मंडरा है इसपर एक किताब " डेमोक्रेसी इन रिस्क " लिख डाली । और अगर उस किताब को पढा जाये तो मान कर चलिये ईवीएम के जरीये वाकई लोकतंत्र को राजनीतिक सत्ता हडप ले रही है ये खुले तौर पर सामने आता है । लेकिन अगला सवाल है कि फिर काग्रेस ये खेल 2014 में क्यो नहीं कर पायी ।
अब स्वयसेवक ही पहले बोल पडे । आप दोनो सही हो सकते है । लेकिन 2014 का चुनाव आपको इस दृश्टि से देखना ही होगा कि काग्रेस की दस बरस की सत्ता से लोग उभ चुके थे या कहे गुस्से में थे । और उस वक्त चुनाव प्रचार से लेकर कारपोरेट फंडिग और वोटिंग ट्रेंड भी तो देखिये । फिर कैसे बीजेपी जो चुनाव 2014 में जीतती है उसे बेहद शानदार तरीके से मोदी की जीत और अमित शाह को मैन आफ द मैच में परिवर्तित किया गया । क्योकि आने वाले वक्त में सत्ता का विस्तार नहीं करना था बल्कि सत्ता को चंद हाथो में सिमटाना था । और ये फिसाल्फी 2019 में क्या गुल खिला सकती है अब मोदी सत्ता के सामने यही चुनौती है ।
और क्या संघ परिवार इसे समझ रहा है ।
समझ रहा है या नहीं सवाल ये नहीं है ..... सवाल तो ये है कि संघ के भीतर संघर्ष करते हुये विस्तार या फिर सत्ता की सहुलियत तले आंकडो का विस्तार महत्वपूर्ण है । उलझन इस को लेकर है । तभी तो मोदी जी अयोध्या नहीं जाते और योगी जी अयोध्यावासी ही हो जाते है । मोदी जी बनारस जा कर गंगा या मंदिर को याद नहीं करते बल्कि गंगा में चलती नाव को देखकर खुश होते है ।
तो क्या हुआ मोदी जी और योगी जी के रास्ते दो तरीके से बीजेपी को लाभ पहुंचा सकते है तो अच्छा ही है ।
जी नहीं ...ऐसा होता नहीं है । जो चेहरा है वहीं सबसे बडा मोहरा है । और बीजेपी कही बोझ तो नहीं जरा इसका एक असर तमिलनाडु में देख कर समझे । रजनीकांत भी बीजेपी के खिलाफ नोटबंदी को लेकर बोल रहे है और एआईडीएमके भी फिल्म सरकार का समर्थन करने पर रजीनाकांत को निशाने पर ले रही है ।
तो...
तो क्या कुछ दिनो पहले तक एआईडीएमके , रजनी कांत और बीजेपी एक ही बिसात पर खडे थे । लेकिन अब कोई भी दूसरे का बोझ लेकर चलने को तैयार नहीं है ।
तो क्या बीजेपी भी बोझ बन रही है ।
क्यो नहीं । बिहार यूपी में छोटे दल जो सोशल इंजिनियरिंग के नाम पर जातिगत वोट लेकर बीजेपी से 2014 में जुडे वह अब क्या कर रहे है ।
जारी...........

आप ओर हम

22/02/2020

किसानो की खुदकुशी रोकने वाले बजट का इंतजार....

वाकई ये सवाल तो है कि जब देश की सियासत में किसान-किसान की आवाज सुनायी देती है । सत्ता परिवर्तन से लेकर सत्ता बचाने के लिये किसान राग देश में गाया जा रहा हो । आने वाल वक्त में किसानो के संघर्ष के आसरे ही व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद-आस समाजसेवी जगाने में ले हो तब कोई पूछ बैठे कि क्या , 2019 का आम बजट ये वादा कर पायेगा कि आने वाल वक्त में किसान खुदकुशी नहीं करेगा ? ये ऐसा सवाल है जिसे बजट के दायरे में देखा जाये या ना देखा जाये अर्थशास्त्री इसे लेकर बहस कर सकते है । लेकिन एक तरफ जब सरकार 2022-23 तक देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डालर तक पहुंचाने का वादा कर रही हो तब उसका आधार क्या होगा । कैसे होगा ये तो कोई भी पूछ सकता है । क्योकि दूनिया में भारत खेती पर टिके जनसंख्या को लेकर नंबर एक पर है । विश्व बैक की एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 44 फिसदी जनसंख्या खेती पर टिकी है । जबकि अमेरिका-बिट्रेन की सिर्फ एक फिसदी आबादी खेती से जुडी है । और एशिया में पाकस्तान के 42 फिसदी तो बांग्लादेश के 40 फिसदी और श्रीलंका के 26 फिसदी लोग खती स जुडे है । और भारत के इक्नामी इन सब से बेहतर है । लेकिन खुदकुशी करते किसानो की तादाद भी भारत में नंबर एक है । सिर्फ महाराष्ट्र में हर तीसरे घंटे एक किसान खुदकुशी कर लेता है [ चार साल में 12000 किसानो ने खुदकुशी की ] , तो देश में हर दूसरे घंटे एक किसान की खुदकुशी होती है ।और देश का अनूठा सच ये भी है कि भारत की जीडीपी में 48 फिसदी योगदान उसी ग्रामीण भारत का है जहा 75 फिसदी लोग खेती से जुडे है । तो फिर बजट से उम्मीद क्या की जाये । क्योकि 5 ट्रिलियन डालर इक्नामी के मतलब है उत्पादन की विकास दर 14.6 फिसदी हो जाये । कृर्षि विकास दर 10.1 फिसदी हो जाये । सर्विस क्षेत्र की विकास दर 13.7 फिसदी हो जाये । और जीडीपी की विकास दर 11.7 फिसदी हो । पर ये कैसे होगा कोई नहीं बताता । हालाकि किसान की आय 2022 तक दुगुनी हो जायेगी इसका राजनीतिक एलान पांच बरस पहले ही किया जा चुका है । लेकिन सच तो ये भी है किसान को फसल उगाने में जितने रकम खर्च होती है देश में एसएसपी उससे भी कम रहती है । मसलन हरियाणा को ही अगर आधार बना लें तो वहा प्रति क्विटल गेहू उगाने में किसान का खर्च होता है 2047 रुपया लेकिन एसएसपी है 1840 रुपये प्रतिक्विटल । एक क्विटल काटन उगाने में खर्च आता है 6280 रुपये लेकिन काटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी है 5450 रुपये । इसी तरह एक क्विटल मक्का को उगाने में खर्च आता है 2454 रुपये लेकिन एसएसपी है 1700 रुपये । और देश में किसानी का सच तो ये भ है कि 2002 से 2015 तक किसानो की आय में वृद्दि 3.7 फिसदी रही है । और 2014 से 2018 के बीच कृर्षि जीडीपी ग्रोथ 2.9 फिसदी रही । यानी किसान की आय की वृद्दि की रफ्तार जहतक 15 फिसदी के हिसाब से नहीं बढेगी तबतक दुगुनी आय कैसे होगी कोई नही जानता । फिर आलम तो ये भी है कि गन्ना किसानो का बकाया तक देने की स्थिति में सरार नहीं है । गन्ना मिल और राजनीति में शुगर लाबी की रईसी किसी से छुपी नहीं है । और सरकार भी उन्हे कितनी राहत कितनी सब्सीडी देती है ये सर्वव्यापी है, लेकिन यूपी में गन्ना किसानो का 10,183 करोड तो कर्नाटक में 1709 करोड और महाराष्ट्र में 1400 करोड रुपया बकाया है । और देश भर में गन्ना किसानो का बकाया 21000 करोड से ज्यादा का है ।
तो बजट को कैसे परखा जाये ये सवाल तो हर जहन में होगा क्योकि देश में 5 करोड किसान बैक से कर्ज लेने पहुंचते है लेकिन कर्ज की रकम दस हजार पार नहीं करती कि उनके घर से बकरी-गाय तक उठाने बैककर्मी पहुंच जाते है । यहा तक की जमीन पर भी बैक कब्जा कर लेती है और बैक के बाहर किसानो की तस्वीर भी चस्पा कर दी जाती है । लेकिन इसी दौर में कोई कारपोरेट-उघोगपति या व्यापारी बैक से कर्ज लेकर ना लौटाने का खुला जिक्र कर ना सिर्फ बच जाता है बल्कि सरकार ही उसकी कर्ज ली हुई रकम अपने कंघो पर ढोने के लिये तैयार हो जाती है । आलम ये है कि बैको से क्ज लेकर ना लौटाने वालो की तादाद बरस दर बरस बढ रही है । 2014-15 में 5349 लोग थे तो 2016-17 में बढकर 6575 हो गये और ये बढते बढते 2018-19 में 8582 हो चुक है । और तो और मुद्रा लोन के तहत भी एनपीए बीते एक बरस में 68 फिसदी बढ गया । 9769 करोड से बढकर 16,480 करोड हो गया । तो क्या बजट सिर्फ रुपये के हेर फेर का खेल होगा । जिसमें कहा से रुपया आयेगा और कहा जायगा इसको लेकर ही बजट पेश कर दिया जायेगा । क्योकि अमेरिका की कतार में खडे होने की चाह लिये भारत ये भी नहीं देख पा रहा है कि जिस अमेरिका में सिर्फ एक फिसदी लोग किसानी से जडे है उनकी लिए भी 867 बिलियन डालर का विधेयक [ फर्म बिल 2019-28 ] लाया गया । जिसमें पोषण से लेकर बीमा और जमीन के संरक्षण से लेकर समुदायिक समर्थन तक का जिक्र है ।
ऐसा भी नहीं है कि सरकार की समझ अब किसानी छोड टेकनालाजी पर जा टिकी हो । तो बजट में उसका जिक्र होगा । सच तो ये है कि टाप 15 इंटरनेट कंपनिया 30 लाख करोड का वेलूय़न कर रही है और उनसे टैक्स वसूलने की हिम्मत सरकार कर नहीं पा रही है । गूगल ने ही 2015-16 में भारत में 6000 करोड का कारोबार बताया लेकिन बिसने वर्लड ने इस आंकडे को 4.29 लाख करोड बताया । अगले दो बरस में ई-कामर्स का बजट भारत में 200 बिलियन डालर हो जायेगा । लेकिन बजट बेफिक्र रहेगा और इस्ट इंडिया की गुलामी से उबर चुका भारत अब इंटरनेट कंपनियो की गुलामी के लिये तैयार है । और आखरी सच तो देश का यही है कि जिस महाराष्ट्र में बारिश ने कहर बरपा दिया । मुबंई पानी पानी हो गई । फ्लाइट रुक गई । रेलगाडी थम गई । सत्ता का गलियारी बारिश में तैरता दिखा . बिजली के करंट और दीवार गिरने से 50 से ज्यादा मौत हो गई उस मुबई के मेयर ये कहने से नहीं चुकते कि मुबई में पीने का पानी खत्म हो चला है । मराठवाडा-विदर्भ में भी पानी नहीं है । तो फिर किसानो की खुदकुशी का जिक्र किये बगैर कैसे किसानो का हित साधने वाला बजट आने वाला है इसका इंतजार आप भी किजिये...हम भी करते है ।
Aap aur hum

19/07/2019

साहेब...देश ऐसे नहीं चलता है

सीबीआई, सीवीसी,सीआईसी, आरबीआई और सरकार । मोदी सत्ता के दौर में देश के इन चार प्रीमियर संस्थान और देश की सबसे ताकतवर सत्ता की नब्ज पर आज की तारिख में कोई अंगुली रख दें तो घडकने उसकी अंगुलियो को भी छलनी कर देगी । क्योकि ये सभी अपनी तरह के ऐसे हालातो को पहली बार जन्म दे चुके है जहा सत्ता का दखल , क्रोनी कैपटलिज्म , भ्रष्ट्रचार की इंतहा और जनता के साथ धोखाधडी का खुला खेल है । और इन सारे नजारो का सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक दायरे में देखना - परखना चाह रहा है लेकिन सत्ता का कटघरा का इतना व्यापक है कि संवैधानिक संस्थाये भी बेबस नजर आ रही है । एक एक कर परतो को उठाये तो रिजर्व बैक चाहे सरकार की रिजर्व मनी की मांग पर विरोध कर रहा है लेकिन बैको से कर्ज लेकर जो देश को चूना लगा रहे है उनके नाम सामने नहीं आने चाहिये इसपर रिजर्व बैक की सहमति है । यानी एक तरफ सीवीसी रिजर्व बैक को नोटिस देकर पूछ रहा है कि जो देश का पैसा लेकर देश छोड कर चले गये । और जो जा सकते है । या फिर खुले तौर पर बैको को ठेंगा दिखाकर कर्ज लिया पैसा ही लौटाने को तैयार नहीं है उनके नाम तो सामने आने ही चाहिये । लेकिन इसपर रिजर्व बैक की खामोशी और मोदी सत्ता की नाम सामने आने पर इक्नामी के ठगमगाने का खतरा बताकर खामोशी बरती जा रही है । यानी एक तरफ बीते चार बरस में देश के 109 किसानो ने खुदकुशी इसलिये कर दी क्योकि पचास हजार रुपये से नौ लाख रुपये तक का बैक से कर्ज लेकर ना लौटा पाने की स्थिति में बैको ने उनके नाम बैको के नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिये । तो सामाजिक तौर पर उनके लिये हालात ऐसे होल गये कि जीना मुस्किल हो गया और इसके सामानांतर बैको के बाउंसरो ने किसानो के मवेशी से लेकर घर के कपडे भांडे तक उठाने शुरु कर दिया । तो जिस किसान को सहन नहीं हुआ तो उसने खुदकुशी कर ली । लेकिन इसी सामानांतर देश के करीब सात सौ से ज्यादा रईसो ने कर्ज लेकर बैक को रुपया नहीं लौटाया और रिजर्व बैक के पूर्व गवर्नर ने जब इन कर्जदारो के नामो को सरकार को सौपा तो सरकार ने ही इसे दबा दिया । तो सीआईसी कुछ नहीं कर सकता सिवाय नोटिस देने के । तो उसने नोटिस दे दिया ।
यानी सीआईसी दंतहीन है । लेकिन सीवीसी दंतहीन नहीं है । ये बात सीबीआई के झगडे से उभर कर आ गई । खासकर जब सरकार सीवीसी के पीछे खडी हो गई । सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा ने सोमवार को जब सीवीसी की जांच को लेकर अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट को सीलबंद लिफाफे में सौपा तो तीन बातो साफ हो गई । पहला सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर आस्थाना के बीच सीवीसी खडी है । दूसरी सीवीसी बिना सरकार के निदर्श के बगैर सीबीआई के डायरेक्टर की जांच कर नहीं सकती है यानी सरकार का साथ मिले तो दंतहीन सीवीसी के दांत हाथी सरीखी नजर आने लगेगें । और तीसरा जब संवैधानिक संस्थानो से सत्ता खिलवाड करने लगे तो देश में आखरी रास्ता सुप्रीम कोर्ट का ही बचता है । और आखरी रास्ता का मतलब संसद इसलिये नहीं है क्योकि संसद में अगर विपक्ष कमजोर है तो फिर सत्ता हमेशा जनता की दुहाई देकर संविधान को भी दरकिनार करते हुये जनता के वोटो की दुहाई देगी । और यहा सरकार वाकई " सरकार " की भूमिका में होगी ना कि जन सेवक की भूमिका में । जो हो रहा है और दिखायी दे रहा है ।
लेकिन इस कडी में अगर सत्ता के साथ देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी जुड जाये तो देश किस मोड पर खडी है इसका एहसास भर ही हो सकता है । और इस बारिक लकीर को जब कोई पकडना या छूना तक नहीं चाहता है जब तब ये समझने की कोशिश करें कि सीबीआई सिर्फ नाम भर की संस्था नहीं है । या फिर जब किसी संस्था का नाम देश की साख से जुड जाता है और अपनी साख बचाने के लिये सत्ता संस्था की साख का इस्तेमाल करने लगती है तो क्या क्या हो सकता है । तो संयोग देखिये सोमवार को ही सीबीआई डायरेक्टर ने अपने उपर स्पेशल डायरेक्टर आस्थाना के लगाये गये करप्शन के आरोपो का जवाब जब सीवीसी की जांच रिपोर्ट के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में सौपा तो चंद घंटो में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा सीबीआई के डीआईजी रहे मनीष कुमार सिन्हा ने खटखटाया । और सबे महत्वपूर्ण तो ये है कि सिन्हा ही आलोक वर्मा के निर्देश पर आस्थाना के खिलाफ लगे करप्शन के आरोपो की जांच कर रहे थे । और जिस रात सीबीआई डायरेक्टर और स्पेसळ डायरेक्टर आस्थाना की लडाई के बाद सरकार सक्रिय हुई , और सीबीआई हेडक्वाटर में आधी रात को सत्ता का आपरेशन हुआ । उसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने सबसे प्रमुख भूमिका निभायी । और तब देश को महसूस कुछ ऐसा कराया गया कि मसला तो वाकई देश की सुरक्षा से जुडा है । हालाकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कभी भी सीबीआई या सीवीसी सरीखे स्वयत्त संस्थानो में दखल दे नहीं सकते । लेकिन जब सत्ता की ही दखल हो जाये तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और क्या कर सकते है । या उनके सामने भी कौन सा विक्लप होगा । लेकिन यहा बात रात के आपरेशन की नहीं है बल्कि आस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे सीबीआई डीआईजी मनीष कुमार सिन्हा के उस वक्तव्य की हो जो उन्होने सुप्रीम कोर्ट को सौपी है । चूकि सिन्हा का तबादला रात के आपरेशन के अगले ही दिन नागपुर कर दिया गया । यानी आस्थाना के खिलाफ जांच से हटा दिया गया । तो उन्ही मनीष कुमार सिन्हा जब ये कहते है कि अस्थाना के खिलाफ जांच के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने दो मौकों पर तलाशी अभियान रोकने के निर्देश दिए थे। वहीं, एक बिचौलिए ने पूछताछ में बताया था कि गुजरात से सांसद और मौजूदा कोयला व खनन राज्यमंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी को कुछ करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। तो इसके अर्थ क्या निकाले जाये । क्या सत्ता सिर्फ अपने अनुकुल हालातो को अपने ही लोगो के जरीये बनाने को देश चलाना मान रही है । और जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही कटघरे में है तो फिर बचा कौन ? क्योकि सिन्हा ने सोमवार को अदालत से तुरंत सुनवाई की मांग करते हुए जब ये कहने की हिम्मत दिखा दी कि , "मेरे पास ऐसे दस्तावेज हैं, जो आपको चौंका देंगे। " तो इसके मतलब मायने दो है । पहला दस्तावेज सत्ता को कटघरे में खडा कर रहे है । दूसरा देश के हालात ऐसे है कि अधिकारी या नौकरशाह अब सत्ता के इशारे पर नाचने को तैयार नहीं है और इसके लिये नौकरशाही अब गोपनियता बरतने की शपथ को भी दरकिनार करने की स्थिति में आ गये है । क्योकि कोरडो की घूसखोरी में नाम जब सीबीाई के स्पेशल डायरेक्टर का आ रहा है । गुजरात के सांसद जो मोदी सरकार में कोयला खनन के राज्यमंत्री है उनका भी आ रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दागियो को बचाने की पहले करने के आरोपो के कटघरे में खडे किये जा रहे है ।
तो क्या सरकार ऐसे चलती है क्योकि रिजर्व बैक सरकार चलाना चाहती है । सीवीसी जांच को सरकार करना चाहती है । सीबीआई की हर जांच खुद सरकार करना चाहती है । सीआईसी के नोटिस को कागज का पुलिंदा भर सरकार ही मानती है । और जब कोई आईपीएस सुप्रीम कोर्ट में दिये दस्तावेजो में ये लिख दें कि ‘‘अस्थाना के खिलाफ शिकायत करने वाले सतीश सना से पूछताछ के दौरान कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका के बारे में पता चला था।’’। और संकेत ये निकलने लगे कि प्रभावशाली का मतलब सत्ता से जुडे या सरकार चलाने वाले ही है तो फिर कोई क्या कहें । क्योकि सुप्रीम कोर्ट में दी गई सिन्हा की याचिकाके मुताबिक, ‘सना ने पूछताछ में दावा किया कि जून 2018 के पहले पखवाड़े में कोयला राज्य मंत्री हरिभाई चौधरी को कुछ करोड़ रुपए दिए गए। हरिभाई ने कार्मिक मंत्रालय के जरिए सीबीआई जांच में दखल दिया था।" और चूकि सीबीआई डायरेक्टर कार्मिक मंत्रालय को ही रिपोर्ट करते है तो फिर आखरी सवाल यही है कि सत्ता चलाने का तानाबाना ही क्या इस दौर में ऐसा बुना गया है जहा सत्ता की अंगुलियो पर नाचना ही हर संस्था से लेकर हर अधिकारी की मजबूरी है । नहीं तो आधी रात का आपरेशन जिसे अंजाम देने के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सक्रिय हो जाते है ।

आप और हम

08/06/2019

राहुल गांधी की कांग्रेस कैसी होगी .....

काग्रेस में सन्नाटा है । सन्नाटे की वजह हार नहीं है । बल्कि हार ने उस कवच को उघाड दिया है जिस कवच तले अभी तक बडे बडे काग्रेसी सूरमा छिपे हुये थे । और अपने बच्चो के लिये काग्रेस की पहचान और काग्रेस से मिली अपनी पहचान को ही इन्वेस्ट कर जीत पाते रहे । पहली बार इन कद्दावरो के चेहरे पर शिकन दिखायी देने लगी है कि क्योकि उनका राजा भी चुनाव हार गया । और बिना राजा कोटरी कैसी । चापलूसी कैसी । कद किसका । और बिना कद कार्यकत्ताओ की फौज भी नहीं । मान्यता भी नहीं । और चाहे अनचाहे काग्रेसी राजा यानी राहुल गांधी ने उस सच को अपने इस्तीफे की धमकी से उभार दिया जिसे सुविधाओ से लैस काग्रेसी राहुल गांधी की घेराबंदी कर अपनी दुकान को अरामपस्ती से अभी तक चलाते रहे । काग्रेस खत्म हो नहीं सकती इसे तो नरेन्द्र मोदी भी जानते है और रईस काग्रेसियो का झुंड भी जानता समझता है । क्योकि काग्रेसी की पहल किसी राजनीतिक दल की तर्ज पर कभी हुई ही नहीं । उसे शुरुआती दौर में आाजादी के संघर्ष से जोड कर देखा गया तो बाद में व्यक्तितव का खेल बन गया । गांधी परिवार से जो जो निकला , उसका जादूई व्यक्तित्व जब जब जनता को अछ्छा लगा उसने काग्रेस के हाथो सत्ता सौप दी । नेहरु, इंदिरा, राजीव की राजनीतिक पारी में मुद्दो का उभारना और व्यक्तित्व का जादुई रुप ही छाया रहा । लेकिन सोनिया गांधी के दौर में विपक्ष के अंधेरे ने काग्रेस को सत्ता दिला दी । और राहुल गांधी के वक्त गांधी परिवार के व्यक्तितव की चमक को अपने नायाब नैरेटिव या कहे मुद्दो के काकटेल तले कही ज्यादा चमक रखने वाले मोदी उभर आये । लेकिन काग्रेस की व्याख्या या काग्रेस का परिक्षण का ये आसान तरीका है । दरअसल काग्रेस की यात्रा या कहे नेहरुकाल से भारत को गढने का जो प्रयास गवर्नेंस के तौर पर हुआ उसमें गांव या कहे पंचायत से लेकर महानगर या संसद तक काग्रेसी सोच बिना पार्टी संगठन के भी पलती बढती गई । सीधे समझे तो जिस तरह पन्ना प्रमुख से लेकर संगठन महासचिव के जरीय बीजेपी ने खुद को राजनीतिक दल के तौर पर गढा उसके ठीक उलट देश की नौकरशाही [बीडीओ से आईएएस़] , देश में विकास का इन्फ्रस्ट्क्चर , औघोगिक और हरित क्रातिं या फिर सूचना के अधिकार से लेकर मनरेगा तक की पहल को काग्रेसी सोच तले देखा परखा गया । यानी काग्रेसी कार्यकत्ताओ ने या फिर काग्रेसी संगठन ने जो भी काम किया वह काग्रेसी सत्ता से निकली निकली नीति या देश में लागू किये गये निर्णयो की कारपेट पर ही चलना सीखा । और सत्ता के मुद्दे के साथ गांधी परिवार के व्यक्तित्व से नहायी काग्रेस को इसका लाभ मिलता चला गया । जबकि इसके ठीक उलट ना तो जनता पार्टी की सरकार में ना ही वाजपेयी की सत्ता के दौर में कोई ऐसा निर्णय लिया गया जिसे कभी जनसंध या फिर बीजेपी को लाभ मिलता । बीजेपी ने सत्ता में आने के बाद पहली बार मोदी कार्यकाल में ही नये तरीके से सत्ता के नैरेटिव को इतनी मजबूती से बनते देखा कि बीजेपी का संगठन या संगठन के साथ खडे स्वयसेवको की फौज यानी आरएसएस की चमक भी गायब हो गई । यानी एक वक्त मंडल को कउंटर करने के लिये कंमड की फिलासफी । या फिर अयोध्या आंदोलन के जरीये बीजेपी-संघ परिवार को एक साथ मथते हुये देश को पार्टी से जोडने की कोशिश जिस अंदाज में हुई वह बीजेपी को सत्ता मिलते ही गायब हो गई । यानी बीजेपी को सत्ता हमेशा अपने राजनीतिक संगठन की मेहनत से मिली । पर सत्ता मेंआते ही संगठन को ही कमजोर या घता बताने की प्रक्रिया को भी बीजेपी ने ही जिया । लकिन काग्रेस ने कभी संगठन पर ध्यान दिया ही नहीं और संगठन हमेशा काग्रेसी सत्ता के निर्णयो या कहे कार्यों पर ही निर्भर रहा । शायद इसीलिये पहली बार जब बीजेपी का अंदाज बदला । उसका सबकुछ नेतृत्व में समाया तो काग्रेस के सामने संकट ये उभरा कि वह पारंपरिक राजनीति को छोडे या फिर पारंपरिक राजनीतिक करने वाले दिग्गज नेताओ को ही दरकिनार करें । क्योकि काग्रेस मथने की जो पूरी प्रक्रिया है उसमें नेतृत्व को ना सिर्फ क्रूर होना पडेगा बल्कि निर्णायक भी होना होगा । और राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश इसी की शुरुआत है । क्योकि राहुल गांधी भी इस सच को जाने है कि जबतक उनके पास संपूर्ण ताकत नही होगी तबतक चिंदबरम या गहलोत या कमलनाथ के बेटे कही ना कहीं टकराते रहेगें । सिंधिया का महाराजा वाला भाव जागृत रहेगा । और चारो तरफ से चापलूस या गांधी परिवार के दरवाजे पर दस्तक देने की हैसियत वाले ही काग्रेस क भीतर बाहर खुद को ताकतवर दिखलाकर कद्दावर कहलाते रहेगें । राहुल गांधी अब काग्रेस के उस ठक्कन को ही खोल देना चाहते है जिस ठक्कन के भीतर सबकुछ गांधी पारिवार है । यानी सोनिया गांधी के आगे हाथ से राह दिखाते नेता , प्रियका गांधी के आगे खडे होकर रास्ता बनाते नेता या फिर खुद उनके सामने नतमस्तक भूमिका में खडेहोकर बडे काग्रेसी बनने कहलाने की सोच लिये फिरते काग्रेसियो से काग्रेस को मुक्त कैसे किया जाये अब इसी सवाल से राहुल गांधी ज्यादा जुझ रहे है ।
सवाल है कि अगर चिंदबरम, कमलनाथ या गहलोत को राहुल गांधी रिटायर ही कर दें तो किसी पर क्या असर पडेगा । या फिर इस कतार में सलमान खुर्शीद हो या पवन बंसल या फिर श्रीप्रकाश जयसवाल या सुशील कुमार शिंदे या फिर किसी भी राज्य का कोई भी वरिष्ट काग्रेसी । सभी के पास खूब पैसा है । सभी के लिय काग्रेस एक ऐसी राजनीति की दुकान है जहा कुछ इनवेस्ट करने पर सत्ता मिल सकती है यानी लाटरी खुल सकती है । और काग्रेस क पास अगर इन नेताओ का साथ ना रहेगा तो होगा क्या ? शायद पहचान पाये चेहरो की कमी होगी या फिर गांधी परिवार के सामने संकट होगा कि वह खुद को कद्दावर कैसे कहे जब वह काग्रेसी कद्दावरो से घिरे हुये नही है तो । लेकिन इसका अनूठा सच तो गुना संसदय सीट पर मिले जनादेश में जा छुपा है । जहा महाराज जी को उनका ही कारिदा या कह जनता से निकला एक आम शख्स हरा देता है । और वही से सबसे बडा सवाल भी जन्म लेता है कि बदलते भारत में पारंपरिक नेताओ को लेकर जनता में इतनी घृणा पैदा हो चुकी है कि वह उसकी रईसी से तंग आ चुका है । फिर युवा के मन में कभी कोई नेता आदर्श नहीं होता । और ना ही युवा किसी भी कद्दावर नेता को बर्दाश्त करता है । युवा भारत जब बोलने की स्वतंत्रता को ना सिर्फ राजनीतिक मिजाज से अलग देखता है बल्कि क्रियटीव होकर अब तो वह राजनीतिक पर किसी भी विपक्ष की राजनीतिक समझ से ज्यादा तीखा कटाक्ष करता है । तो ऐसे में नेताओ का भी संवाद सीधा होना चाहिये । साफगोई नीतियो के सामने आना चाहिये । और ये समझ कैसे काग्रेसी समझ ना पाये ये सिर्फ सिंधिया ही नहींबल्कि मल्लिकाजुर्न खडगे की चुनावी हार से भी समझा जा सकता है । यानी कल तक संसद में काग्रेस का नेता । विपक्ष का नेता । और भूमि अधिगरहण से लेकर नोटबंदी और जीएसटी भी इन्ही के काल में मोदी सत्ता ल कर आई तो फिर विपक्ष के नेता के तौर पर सिर्फ दलित सोच को उभारकर मल्लिकाजुर्जन खडके को आगे करने की जरुरत क्या थी । क्या 2014 में कमलनाथ विपक्ष के नेता के तौर पर सही नहींथे । तो फैसले गलत लिये गये या गलत होते चले गये । और एक वक्त के बाद काग्रेसी ही जब गांधी परिवार से थक हार जाता रहा तो फिर उसका संयम सिवाय काग्रेस से कमाई के अलावे कुछ रहा भी नहीं । राजनीति और चुनाव के वक्त जो सामाजिक-आर्थिक या कहे राजनीतिक नैरेटिंव भीचाहिये उसपर क्या किसी ने कभ सोचा । और नहीं सोचा तो मल्लिकाजुर्न इतनी बडी पहचान के वाबजूद चुनाव हार गये । यानी जिनका पहचान ही रही कि कभी चुनाव नहीं हारते है , इसलिये मल्लिकाजुर्न खडके को " सोल्लिडा सरदारा " भी कहते थे । लेकिन काग्रेस जबसिर्फ गांधी परिवार के कंधे पर सवार होकर राजनीतिक चुनावी प्रचार ही देखती रही और राहुल गांधी अभिमन्यु की तरह लडते लडते थके भी तब भी काग्रेस में अपने अपनी गरिमा समेटे कौन सा नेता निकला । तो क्या राहुल गांधी अब अभिमन्यु नहीं बल्कि अर्जुन की भूमिका में आना चाहत है जहा उनके जहन में कृष्ण का पाठ साफ तौर पर गूंज रहा है कि काग्रेस को जिन्दा रखना है तो कोटरी, चापलूस और डरे-सहमे रईस काग्रेसो का वध जरुरी है ।
और जिन काग्रेसियो से राहुल गांधी घिरे हुये है वह घबरा भी रहा है कि कही राहुल गांधी वाकई काग्रेस को पूरी तरह बदलन ना निकल पडे । तो वो पंजाब, राजस्थान , मद्यप्रदेश , छत्तिसगढ में काग्रेस की जीत का सहरा भी अपने माथे बांध लेता है । लेकिन इस सच को कोई नहीं कहता है कि इन राज्यो में काग्रेस की जीत से पहले बीजेपी की सत्ता की हार जनता ने चुनी । इसीलिये जब नारे लगते रहे कि "वसुंधरा तेरी खैर नहीं , लेकिन मोदी से बैर नहीं " तो भी काग्रेसी समझ नहीं पाये कि कौन सी व्यूबरचना मोदी ने अपने कद के लिये बना रखी है या भी वह लगातार बना रह है । बीजेपी में कद्दावर क्षत्रप भी मोदी को बर्दाश्त नहीं और काग्रेस में खुद को मजबूत क्षत्रप के तौर पर मान्यता पाने की होड अब कैप्टन से लेकर कमलनाथ और गहलोत से लेकर बधेल तक में है । लेकिन काग्रेस को पार्टी के तौर पर अवतरित सिर्फ 10 जनवपथ या 24 अकबर रोड में डेरा जमाये काग्रेसियो से मुक्ति भर से नहीं होगा बल्कि मोदी की सत्ता काल में बीजेपी की कमजोरी को काग्रेस कैसे ताकत बना सकती है और कैसे ग्राम सभा से लेकिन लोकसभा तक की लकीर सबको साथ जोडने वाली विचारधारा के साथ लेकर चला सकती है । इम्तिहान इसी का है । और इस परिक्षा का पहला सामना तो राहुल गांधी को ही करना होगा जिनके पास अभी तक जमीनी राजनीतिक समझ ही नहीं बल्कि समाज को समझने वालो की टीम तक नहीं है । जो अभी तक ये नहीं समझ पाये है कि संगठन का विस्तार या कारगर रणनीति बनाते रहना या फिर जनता से सीधा संपर्क कैसे बनाये इस समझ को अपनी कोर टीम में विकसित कर पाये । अगर अतीत में ना भी झांके की ममता और जगन ने काग्रेस क्यो छोडी या फिर वह सफल क्यो हो गये लेकिन भविष्य तो देख समझ सकते है कि आखिर ममता का साथ छोडने वाले बीजेपी से पहले काग्रेस की तरफ क्यो नहीं देख सकते है । वामपंथियो के 22 फिसदी वोट बंगाल में बीजेपी के पास क्यो चले गये जबकि वाम की पूरी फिलोस्फी ही काग्रेस ने अपने मैनिफेस्टो में डाल दी । फिर भी काग्रेस को लक भरोसा क्या नहीं जागा ।
इतना ही नहीं संगठन में बूथ लेबल पर काम करने वाल काग्रेसी जिन्हे एक वक्त वोट कलेक्टर माना जाता था उन्हे बेहद सम्मान मिलता था वह कहां गायब हो गये । आलम तो ये हो गया कि बूथ पर बैठे काग्रेसियो को ग्वालियर संभाग में तीन बजे के बाद खाना तक नहीं मिल पाया तो बीजेपी का बूथ लगाये लोगो ने भोजन दिया । और माहौल इस तरह बनता क्यो चला गया कि जिसने मोदी को वोट नहीं दिया वह भी बाहर आकर कहने लगा कि उसने मोदी को वोट दिया और दिसने काग्रेस को वोट दिया वह भी काग्रेस जिन्दाबाद के नारे लगाने में हिचकने लगा । कहीं तो नैतिक पतन है या फिर कहीतो राहुल गांधी को अकेले लडते छोड रईस काग्रेसियो में राहुल को लेकर ही सवाल है इसलिये सभी अपनी सुविधा बनाये रखने के लिये राहुल के इस्तीफे को भी नाटक मान रहे है और फैला भी रहे है । फिर ये सवाल अब भी अनसुलझा सा है क्या वाकई राहुल गांधी बतौर राजनीतक कार्यकत्ता रह सकते है । या फिर सिर्फ अध्यक्ष के तौर पर रह सकते है । या फिर गांधी नाम रखे हुये अध्यक्ष की कुर्सी संभालते हुये उस काग्रेसी कटघरे से बाहर निकल कर काग्रेसियो को ये पाठ पढा सकता है कि जो उनके अगल बगल खडाहोकर खुद को मजबूत मानता है दरअसल वह सबसे भ्रष्ट्र है । क्योकि सच तो ये भी है कि दिनभर राहुल के इर्द गिर्द मंडराते रईस, चेहरे वाले काग्रेसी रात में मोदी तक बात पहुंचा कर अपने नंबर संबह शाम में जोडते है और हमेशा खुश खुश नजर आते है और जब युद्द की मुनादी राहुल गांधी करते है तो पहले सभी समझाते है युद्द से कुछ नहीं होगा । फिर खुद को युद्द से बाहर कर नजारा देख हसंते ठिठोली कर शुश होते रहते है । और जब राहुल गांधी कहते है तुम्ही संभालो काग्रेस को तो रुआसा सा चेहरा बनाकर कहते है " राहुल गांधी है तो काग्रेस है ।"
तो बदलाव की बयार काग्रेस में बहेगी या फिर काग्रेस धीरे धीरे सिर्फ नाम भर में तब्दिल हो कर रह जायेगी ये नया सवाल है । जबकि इतिहास में राहुल गांधी के पास सबसे बेहतरीन मौका काग्रेस को संवारने का है । और इसकी सबसे बडी वजह मोदी सत्ता में बीजेपी-संघ परिवार की सोच के खत्म होने का है । सिर्फ मोदी की गरिमामय मौजूदगी और लारजर दैन लाइफ का जो खल खुद मोदी ने बीजेपी के 11 करोड कार्यकत्ता और 60 लाख स्वयसेवक के साथ साथ सवा सौ करोड भारतीय के नाम पर शुरु किया है । वह भारतीय राजनति के उस संघर्ष को ही झुठला रहा है जो कभी नेहरु-इंदिरा के खिलाफ लोहिया-जेपी ने किया । आज की तारिख में पुराने लोहियावादी हो या जेपी संघर्ष के दौर में तपे समाजसेवी सभी खुद को अलग थलग पा रहे है । मोदी काल में उनकी जरुरत ना तो बीजेपी को है ना ही संघ परिवार को । तो काग्रेस ने जब अपनी आर्थिक नीतियो में परिवर्तन कर कारपरेट इक्नामी को नकारना सीखा है । ग्रामिण भारत और किसान-मजदूरो के साथ न्याय को जोडा है । वामपंथी-समाजवादी एंजेडो को अपने लोकप्रिय अंदाज में समेटा है । और जिस तरह मोदी सत्ता अब अपने जनादेश को मंडल के खत्म होने के साथ जोड रही है और क्षत्रपो के सामने आस्तितव का संकट है उसमें काग्रेस के लिये खुद को खडे करने का इससे बेहतरीन मौका कुछ हो नहीं सकता । तो आखरी सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी भी काग्रेस के इस ब्लूप्रिट को समझ रहे है और उसे जमीन पर उतारने के लिये अब उन्हे बिलकुल नये सिपाही चाहिये । नये सिपाहियो के जरीये संघर्ष की मुनादी से पहले सिर्फ गांधी पारिवार का नाम नहीं बल्कि सारे अधिकार चाहिये । और जब राहुल गांधी काग्रेस के उस ठक्कन को खोल कर बोतल में बंद राजनीति को आजाद कर काग्रेस को भारत के सामाजिक-सास्कृतिक मूल्यो से जोड कर बीजेपी के छद्म राष्ट्रवाद , मोदी मैजिक और भावनात्मक हिन्दुत्व से मुक्ती दिलाने की दिशा में बढना चाहते है तो फिर सफेद कुर्ते-पजामे में खुद को समेटे गांधी पारिवार की चाकरी कर काग्रेसी होने का तमगा पाये लोगो से मुक्ति तो चाहिये ही होगी ।

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