24/01/2026
भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को जयंती के अवसर पर सादर नमन!💐🙏🏾
भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर ने ी_लकीर खींची कि लाखों की तकदीर बदल गई।
आज 28 सितम्बर है, दो दिन बाद यह माह खत्म हो जाएगा और इसी के साथ हिन्दी पखवाड़ा का पाखण्ड भी खत्म हो जाएगा। हरेक साल सितम्बर माह में हिन्दी को लेकर हो हल्ला मचता है और हिन्दी प्रेमियों की बाढ़ सी आ जाती है लेकिन सितम्बर के बाद हिन्दी हवा में उड़ जाती है। दरअसल 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला, इसीलिए प्रत्येक साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है और साथ में हिन्दी पखवाड़ा भी। सबसे मजेदार बात यह है कि हिन्दी पखवाड़ा में हिन्दी से अंग्रेजी को याद की जाती है और उसे खूब खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। जो लोग दिनभर हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी को फेंटकर बोलते हैं, वे लोग भी हिन्दी पखवाड़े में जीभ ऐंठकर और मुँह बना-बनाकर शुद्ध हिन्दी बोलने की भरपूर कोशिश करते हैं। इस4सिर्फ हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश के केंद्रीय कार्यालयों व संस्थानों में होता है।
देश के बहुत कम लोग जानते हैं कि कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिन्दी प्रेमी थे। हिन्दी प्रेमी होने का यह मतलब कतई नहीं होता है कि अंग्रेजी, उर्दू या किसी भी भाषा से नफरत करें, जो जितना अधिक भाषा जानेगा, वो उतना ही बेहतर करेगा। हमें अधिक से अधिक भाषा सीखने की कोशिश आजीवन करते रहना चाहिए। बहरहाल, बात कर्पूरी ठाकुर की हो रही है तो मालूम होना चाहिए कि उन्होंने भाषा को लेकर बहुत क्रांतिकारी कदम उठाया था।
साल 1967 में देश के 16 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए, जिसमें 8 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। उन आठ राज्यों के नाम इस प्रकार हैं- बिहार, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल। बिहार में कांग्रेस को बहुमत भले ही नहीं मिला लेकिन 128 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही रही। कर्पूरी ठाकुर की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) 67 विधायकों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। गैर कांग्रेसी सरकार बनाने के नाम पर संसोपा के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा), भाकपा, जनसंघ एवं जनक्रांति दल गठबंधन बनाए और 33 सूत्री कार्यक्रम बनाकर संयुक्त विधायक दल (संविद) का गठन किया गया। 5मार्च, 1967 को संविद सरकार बनी, जिसमें सबसे कम विधायक वाली पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने और सबसे अधिक विधायकों वाली पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर बिहार के दूसरे उपमुख्यमंत्री बने।
मालूम हो कि 1967 के चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में संसोपा की ओर से नारे लग रहे थे- 'संसोपा ने बांधी गाँठ, पिछड़ा पावे सौ में साथ' और 'अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा'। संविद सरकार में कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ शिक्षा मंत्री भी थे। कर्पूरी ठाकुर दिल्ली गए और डॉ. लोहिया से भाषा को लेकर विमर्श किया। दिल्ली से लौटते ही उन्होंने एक अध्यादेश जारी करवाया कि अब मैट्रिक पास करने के लिए अंग्रेजी विषय में उत्तीर्ण होना अनिवार्य नहीं है अर्थात बिना अंग्रेजी पास किये भी मैट्रिक पास किया जा सकता है। उस समय के कर्पूरी विरोधी उनपर व्यंग करते हुए, इसे 'कर्पूरी डिवीजन' नाम दिया। जो विद्यार्थी अंग्रेजी में फेल होता था लेकिन मैट्रिक पास होता था, उसे उपहास उड़ाते हुए कुछ लोग कहते थे कि यह 'कर्पूरी डिवीजन' से पास किया है।
यह फैसला आज भले ही सामान्य-सा प्रतीत हो लेकिन आज से 68 साल पहले 1967 में यह बहुत क्रांतिकारी फैसला साबित हुआ था। दरअसल उस समय पाँचवीं कक्षा में ए, बी, सी, डी पढ़ाना शुरू होता था, जिसके कारण अधिकांश बच्चे मैट्रिक तक अंग्रेजी को बहुत कम समझ पाते थे। जो सम्पन्न परिवार के विद्यार्थी होते थे या जिनके घर-परिवार में पहले से पढ़े-लिखे लोग थे, उन्हें उतनी परेशानी नहीं होती थी लेकिन जो गरीब के बच्चे थे, जिन्हें टीयूशन पढ़ने के लिए न पैसे थे और न ही काम से फुर्सत या फिर जो पहली पीढ़ी के बच्चे कलम पकड़े थे, उनके लिए अंग्रेजी गले की फांस बन जाती थी, बहुत सारे बच्चे अंग्रेजी की वजह मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे और उच्च शिक्षा से महरूम रह जाते थे। उस समय बिहार के अधिकांश लोग गरीबी में जी रहे थे और पहली बार बार विद्यालय का मुँह देख रहे थे, जिसमें मुख्य रूप से दलित, आदिवासी एवं पिछड़े परिवार थे, उसमें भी लड़कियों के लिए और कठिन समस्या थी।
कर्पूरी ठाकुर के इस ऐतिहासिक फैसले के परिणाम स्वरूप उच्च शिक्षा में दलित, आदिवासी एवं पिछड़े तबका के विद्यार्थियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी। प्रसन्न कुमार चौधरी तथा श्रीकांत अपनी पुस्तक 'बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम' में लिखते हैं कि "उन दिनों के अभिजात्य माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में भी छात्रों की सामाजिक संरचना बदलने लगी। पिछड़ी जातियों के ग्रामीण छात्रों की तादात अब इन विश्वविद्यालयों में बढ़ने लगी।" उनका मानना है कि 1974 के छात्र आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति की सफलता में भी इसका असर है क्योंकिगांवों से पिछड़ी जाति के छात्र शहरों में पढ़ने आने लगे थे, जो आंदोलन से जुड़ कर आंदोलन को गाँवों तक पहुँचाकर व्यापकता प्रदान कर दिए।
साथ ही उनके हिन्दी भाषा प्रेम के सम्बंध में यह भी जानना चाहिए कि जब वे 22 दिसम्बर, 1970 को पहली बार मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने 'हिन्दी प्रगति समिति' का गठन किया। उस समिति के सदस्य रह चुके डॉ. रामखेलावन राय लिखते हैं कि "कर्पूरी जी के शासनकाल में राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन करनेवालों की प्रोन्नति और वेतन-वृद्धि रोक दी जाती थी, जिसके कारण परिणामस्वरूप जिलाधीश तक इस अधिनियम का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करते थे।" वे आगे लिखते हैं कि "कर्पूरीजी के मुख्यमंत्री काल में सभी सरकारी अधिकारियों को हिन्दी में ही संचिका प्रस्तुत करने का निर्देश प्राप्त था और कोई भी अधिकारी इस नियम का उल्लंघन करने की बात सोच भी नहीं सकता था। इस हिन्दी के हिमालय से भला कौन टकराता?" 'राष्ट्रीय विकास परिषद' की बैठक में उस वक्त सारा काम अंग्रेजी में ही होता था। उस परिषद में पहली बार हिन्दी में बोलने वाला सदस्य भी कर्पूरी ठाकुर ही बने और वहाँ भी हिन्दी को स्थापित करवाया।
देश के बहुत लोगों को नहीं पता होगा कि आज भी मैट्रिक बोर्ड में डिवीजन अंग्रेजी छोड़कर ही बनता है। समय-समय पर बदलाव होते रहे, इतिहास, भूगोल एवं नागरिक शास्त्र को सामाजिक विज्ञान तथा भौतिकीशास्त्र, रसायन शास्त्र, एवं जीव विज्ञान के तीन-तीन पत्रों की जगह एक-एक पत्र क्रमशः सामाजिक विज्ञान तथा विज्ञान कर दिया गया लेकिन अंग्रेजी को मेरिट में शामिल नहीं किया गया। बिहार के मैट्रिक बोर्ड में वर्तमान में छः विषय गणित, हिन्दी, संस्कृत, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान एवं अंग्रेजी हैं लेकिन डिवीजन सिर्फ शुरू के पाँच विषयों के प्राप्तांक पर ही तय होता है।
कर्पूरी ठाकुर, जननायक बने और अब भारतरत्न भी बन गए लेकिन उनके द्वारा खींची गई लकीर आज भी कायम है।