एक लकीर

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17/02/2026

बिहार में भारतरत्न जनानायक कर्पूरी ठाकुर जी ने ी_लकीर खींची है, जो आज भी अमिट है और आगे भी रहेगा। देश में बिहार इकलौता राज्य बना ज़ब 1967 में उपमुख्यमंत्री सह शिक्षा मंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने मैट्रिक बोर्ड में अंग्रेजी विषय में पास होने की अनिवार्यता खत्म की, जिसके परिणाम स्वरूप दलित-पिछड़े समाज के विद्यार्थियों की भागीदारी उच्च शिक्षा में बढ़ी।

1978 में मुख्यमंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट को लागू कर अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए 12%, पिछड़ा वर्ग के लिए 8%, पिछड़े वर्गों की महिला के लिए 3% एवं गरीब सवर्णों के लिए 3% आरक्षण लागू कर इतिहास रच दिया। उस ऐतिहासिक कार्य के लिए उन्हें सामंती और मनुवादी मानसिकता के लोगों ने बहुत भद्दी-भद्दी गालियां दी।

ऐसे महापुरुष को पुण्यतिथि के अवसर पर शत-शत नमन!💐

24/01/2026

भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को जयंती के अवसर पर सादर नमन!💐🙏🏾

भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर ने ी_लकीर खींची कि लाखों की तकदीर बदल गई।

आज 28 सितम्बर है, दो दिन बाद यह माह खत्म हो जाएगा और इसी के साथ हिन्दी पखवाड़ा का पाखण्ड भी खत्म हो जाएगा। हरेक साल सितम्बर माह में हिन्दी को लेकर हो हल्ला मचता है और हिन्दी प्रेमियों की बाढ़ सी आ जाती है लेकिन सितम्बर के बाद हिन्दी हवा में उड़ जाती है। दरअसल 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला, इसीलिए प्रत्येक साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है और साथ में हिन्दी पखवाड़ा भी। सबसे मजेदार बात यह है कि हिन्दी पखवाड़ा में हिन्दी से अंग्रेजी को याद की जाती है और उसे खूब खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। जो लोग दिनभर हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी को फेंटकर बोलते हैं, वे लोग भी हिन्दी पखवाड़े में जीभ ऐंठकर और मुँह बना-बनाकर शुद्ध हिन्दी बोलने की भरपूर कोशिश करते हैं। इस4सिर्फ हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश के केंद्रीय कार्यालयों व संस्थानों में होता है।

देश के बहुत कम लोग जानते हैं कि कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिन्दी प्रेमी थे। हिन्दी प्रेमी होने का यह मतलब कतई नहीं होता है कि अंग्रेजी, उर्दू या किसी भी भाषा से नफरत करें, जो जितना अधिक भाषा जानेगा, वो उतना ही बेहतर करेगा। हमें अधिक से अधिक भाषा सीखने की कोशिश आजीवन करते रहना चाहिए। बहरहाल, बात कर्पूरी ठाकुर की हो रही है तो मालूम होना चाहिए कि उन्होंने भाषा को लेकर बहुत क्रांतिकारी कदम उठाया था।

साल 1967 में देश के 16 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए, जिसमें 8 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। उन आठ राज्यों के नाम इस प्रकार हैं- बिहार, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल। बिहार में कांग्रेस को बहुमत भले ही नहीं मिला लेकिन 128 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही रही। कर्पूरी ठाकुर की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) 67 विधायकों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। गैर कांग्रेसी सरकार बनाने के नाम पर संसोपा के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा), भाकपा, जनसंघ एवं जनक्रांति दल गठबंधन बनाए और 33 सूत्री कार्यक्रम बनाकर संयुक्त विधायक दल (संविद) का गठन किया गया। 5मार्च, 1967 को संविद सरकार बनी, जिसमें सबसे कम विधायक वाली पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने और सबसे अधिक विधायकों वाली पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर बिहार के दूसरे उपमुख्यमंत्री बने।

मालूम हो कि 1967 के चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में संसोपा की ओर से नारे लग रहे थे- 'संसोपा ने बांधी गाँठ, पिछड़ा पावे सौ में साथ' और 'अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा'। संविद सरकार में कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ शिक्षा मंत्री भी थे। कर्पूरी ठाकुर दिल्ली गए और डॉ. लोहिया से भाषा को लेकर विमर्श किया। दिल्ली से लौटते ही उन्होंने एक अध्यादेश जारी करवाया कि अब मैट्रिक पास करने के लिए अंग्रेजी विषय में उत्तीर्ण होना अनिवार्य नहीं है अर्थात बिना अंग्रेजी पास किये भी मैट्रिक पास किया जा सकता है। उस समय के कर्पूरी विरोधी उनपर व्यंग करते हुए, इसे 'कर्पूरी डिवीजन' नाम दिया। जो विद्यार्थी अंग्रेजी में फेल होता था लेकिन मैट्रिक पास होता था, उसे उपहास उड़ाते हुए कुछ लोग कहते थे कि यह 'कर्पूरी डिवीजन' से पास किया है।

यह फैसला आज भले ही सामान्य-सा प्रतीत हो लेकिन आज से 68 साल पहले 1967 में यह बहुत क्रांतिकारी फैसला साबित हुआ था। दरअसल उस समय पाँचवीं कक्षा में ए, बी, सी, डी पढ़ाना शुरू होता था, जिसके कारण अधिकांश बच्चे मैट्रिक तक अंग्रेजी को बहुत कम समझ पाते थे। जो सम्पन्न परिवार के विद्यार्थी होते थे या जिनके घर-परिवार में पहले से पढ़े-लिखे लोग थे, उन्हें उतनी परेशानी नहीं होती थी लेकिन जो गरीब के बच्चे थे, जिन्हें टीयूशन पढ़ने के लिए न पैसे थे और न ही काम से फुर्सत या फिर जो पहली पीढ़ी के बच्चे कलम पकड़े थे, उनके लिए अंग्रेजी गले की फांस बन जाती थी, बहुत सारे बच्चे अंग्रेजी की वजह मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे और उच्च शिक्षा से महरूम रह जाते थे। उस समय बिहार के अधिकांश लोग गरीबी में जी रहे थे और पहली बार बार विद्यालय का मुँह देख रहे थे, जिसमें मुख्य रूप से दलित, आदिवासी एवं पिछड़े परिवार थे, उसमें भी लड़कियों के लिए और कठिन समस्या थी।

कर्पूरी ठाकुर के इस ऐतिहासिक फैसले के परिणाम स्वरूप उच्च शिक्षा में दलित, आदिवासी एवं पिछड़े तबका के विद्यार्थियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी। प्रसन्न कुमार चौधरी तथा श्रीकांत अपनी पुस्तक 'बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम' में लिखते हैं कि "उन दिनों के अभिजात्य माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में भी छात्रों की सामाजिक संरचना बदलने लगी। पिछड़ी जातियों के ग्रामीण छात्रों की तादात अब इन विश्वविद्यालयों में बढ़ने लगी।" उनका मानना है कि 1974 के छात्र आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति की सफलता में भी इसका असर है क्योंकिगांवों से पिछड़ी जाति के छात्र शहरों में पढ़ने आने लगे थे, जो आंदोलन से जुड़ कर आंदोलन को गाँवों तक पहुँचाकर व्यापकता प्रदान कर दिए।

साथ ही उनके हिन्दी भाषा प्रेम के सम्बंध में यह भी जानना चाहिए कि जब वे 22 दिसम्बर, 1970 को पहली बार मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने 'हिन्दी प्रगति समिति' का गठन किया। उस समिति के सदस्य रह चुके डॉ. रामखेलावन राय लिखते हैं कि "कर्पूरी जी के शासनकाल में राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन करनेवालों की प्रोन्नति और वेतन-वृद्धि रोक दी जाती थी, जिसके कारण परिणामस्वरूप जिलाधीश तक इस अधिनियम का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करते थे।" वे आगे लिखते हैं कि "कर्पूरीजी के मुख्यमंत्री काल में सभी सरकारी अधिकारियों को हिन्दी में ही संचिका प्रस्तुत करने का निर्देश प्राप्त था और कोई भी अधिकारी इस नियम का उल्लंघन करने की बात सोच भी नहीं सकता था। इस हिन्दी के हिमालय से भला कौन टकराता?" 'राष्ट्रीय विकास परिषद' की बैठक में उस वक्त सारा काम अंग्रेजी में ही होता था। उस परिषद में पहली बार हिन्दी में बोलने वाला सदस्य भी कर्पूरी ठाकुर ही बने और वहाँ भी हिन्दी को स्थापित करवाया।

देश के बहुत लोगों को नहीं पता होगा कि आज भी मैट्रिक बोर्ड में डिवीजन अंग्रेजी छोड़कर ही बनता है। समय-समय पर बदलाव होते रहे, इतिहास, भूगोल एवं नागरिक शास्त्र को सामाजिक विज्ञान तथा भौतिकीशास्त्र, रसायन शास्त्र, एवं जीव विज्ञान के तीन-तीन पत्रों की जगह एक-एक पत्र क्रमशः सामाजिक विज्ञान तथा विज्ञान कर दिया गया लेकिन अंग्रेजी को मेरिट में शामिल नहीं किया गया। बिहार के मैट्रिक बोर्ड में वर्तमान में छः विषय गणित, हिन्दी, संस्कृत, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान एवं अंग्रेजी हैं लेकिन डिवीजन सिर्फ शुरू के पाँच विषयों के प्राप्तांक पर ही तय होता है।

कर्पूरी ठाकुर, जननायक बने और अब भारतरत्न भी बन गए लेकिन उनके द्वारा खींची गई लकीर आज भी कायम है।

08/01/2026

7 जनवरी, 2026 को गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छतीसगढ़) के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने ी_लकीर खींचने की कुचेष्टा की है जो कोई भी कुलपति या सम्मानित व्यक्ति नहीं करेगा। किसी भी व्यक्ति को सिर्फ असहमति के कारण कोई कुलपति कैसे अपमानित कर सकता है। इस तरह की गुंडई तथा अभद्र भाषा वाला व्यक्ति कुलपति के पद पर कैसे बैठ सकता है।

कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने साहित्यकार मनोज रुपड़ा जी के साथ जिस तरह का व्यवहार किया है वह माफ़ी के योग्य नहीं है। इस तरह कुलपति को तत्काल बाँह पकड़कर कुलपति की कुर्सी हटाकर सड़क पर फेंक देना चाहिए। साहित्य -प्रेमियों को इसका मुखर विरोध करना चाहिए।

26/12/2025

ी_लकीर
एक पार्टी और एक जाति के तीन नेताओं की विशाल प्रतिमाएँ सरकारी संसाधन से बनी हैं।
वह एक जाति/पार्टी के लिए प्रेरणा स्थल हो सकता है, राष्ट्र के लिए कैसे?

15/12/2025

Indian National Congress के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने एक ी_लकीर खींची है, जो राजनीतिक नेताओं तथा कार्यकर्ताओं प्रेरित करेगी-

मेरे बेटे का परसों 8 घंटे का ऑपरेशन था। मुझे मेरे परिवार के लोगों ने फोन किया कि ये बड़ा ऑपरेशन है, आपको आना चाहिए।

लेकिन मैंने सोचा-

देश की हिफाजत में हमारे जवान जान दांव पर लगा देते हैं, इंदिरा गांधी जी और राजीव गांधी जी ने बलिदान दिया, सोनिया गांधी जी ने त्याग किया।

ऐसे में जब संसद चालू है और 'वोट चोरी' के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई चल रही है- मैं अपने बेटे के पास कैसे जा सकता हूं!

जैसे सरहद पर जवान लड़ते हैं, वैसे ही अन्याय के खिलाफ सोनिया गांधी जी लड़ी हैं, राहुल गांधी जी देश के लिए हजारों मील पैदल चले हैं... मैं भी ये लड़ाई जारी रखूंगा।

मैं अपने एक बेटे के लिए देश के 140 करोड़ लोगों को नहीं छोड़ सकता, इसलिए मैं आज यहां आया हूं।

हमें लड़ना है - पीछे नहीं हटना।

: कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खरगे

📍रामलीला मैदान, दिल्ली

28/09/2025

भारतरत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर ने ी_लकीर खींची कि लाखों की तकदीर बदल गई।

आज 28 सितम्बर है, दो दिन बाद यह माह खत्म हो जाएगा और इसी के साथ हिन्दी पखवाड़ा का पाखण्ड भी खत्म हो जाएगा। हरेक साल सितम्बर माह में हिन्दी को लेकर हो हल्ला मचता है और हिन्दी प्रेमियों की बाढ़ सी आ जाती है लेकिन सितम्बर के बाद हिन्दी हवा में उड़ जाती है। दरअसल 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला, इसीलिए प्रत्येक साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है और साथ में हिन्दी पखवाड़ा भी। सबसे मजेदार बात यह है कि हिन्दी पखवाड़ा में हिन्दी से अंग्रेजी को याद की जाती है और उसे खूब खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। जो लोग दिनभर हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी को फेंटकर बोलते हैं, वे लोग भी हिन्दी पखवाड़े में जीभ ऐंठकर और मुँह बना-बनाकर शुद्ध हिन्दी बोलने की भरपूर कोशिश करते हैं। इस4सिर्फ हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश के केंद्रीय कार्यालयों व संस्थानों में होता है।

देश के बहुत कम लोग जानते हैं कि कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिन्दी प्रेमी थे। हिन्दी प्रेमी होने का यह मतलब कतई नहीं होता है कि अंग्रेजी, उर्दू या किसी भी भाषा से नफरत करें, जो जितना अधिक भाषा जानेगा, वो उतना ही बेहतर करेगा। हमें अधिक से अधिक भाषा सीखने की कोशिश आजीवन करते रहना चाहिए। बहरहाल, बात कर्पूरी ठाकुर की हो रही है तो मालूम होना चाहिए कि उन्होंने भाषा को लेकर बहुत क्रांतिकारी कदम उठाया था।

साल 1967 में देश के 16 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए, जिसमें 8 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। उन आठ राज्यों के नाम इस प्रकार हैं- बिहार, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल। बिहार में कांग्रेस को बहुमत भले ही नहीं मिला लेकिन 128 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही रही। कर्पूरी ठाकुर की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) 67 विधायकों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। गैर कांग्रेसी सरकार बनाने के नाम पर संसोपा के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा), भाकपा, जनसंघ एवं जनक्रांति दल गठबंधन बनाए और 33 सूत्री कार्यक्रम बनाकर संयुक्त विधायक दल (संविद) का गठन किया गया। 5मार्च, 1967 को संविद सरकार बनी, जिसमें सबसे कम विधायक वाली पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने और सबसे अधिक विधायकों वाली पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर बिहार के दूसरे उपमुख्यमंत्री बने।

मालूम हो कि 1967 के चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में संसोपा की ओर से नारे लग रहे थे- 'संसोपा ने बांधी गाँठ, पिछड़ा पावे सौ में साथ' और 'अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा'। संविद सरकार में कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ शिक्षा मंत्री भी थे। कर्पूरी ठाकुर दिल्ली गए और डॉ. लोहिया से भाषा को लेकर विमर्श किया। दिल्ली से लौटते ही उन्होंने एक अध्यादेश जारी करवाया कि अब मैट्रिक पास करने के लिए अंग्रेजी विषय में उत्तीर्ण होना अनिवार्य नहीं है अर्थात बिना अंग्रेजी पास किये भी मैट्रिक पास किया जा सकता है। उस समय के कर्पूरी विरोधी उनपर व्यंग करते हुए, इसे 'कर्पूरी डिवीजन' नाम दिया। जो विद्यार्थी अंग्रेजी में फेल होता था लेकिन मैट्रिक पास होता था, उसे उपहास उड़ाते हुए कुछ लोग कहते थे कि यह 'कर्पूरी डिवीजन' से पास किया है।

यह फैसला आज भले ही सामान्य-सा प्रतीत हो लेकिन आज से 68 साल पहले 1967 में यह बहुत क्रांतिकारी फैसला साबित हुआ था। दरअसल उस समय पाँचवीं कक्षा में ए, बी, सी, डी पढ़ाना शुरू होता था, जिसके कारण अधिकांश बच्चे मैट्रिक तक अंग्रेजी को बहुत कम समझ पाते थे। जो सम्पन्न परिवार के विद्यार्थी होते थे या जिनके घर-परिवार में पहले से पढ़े-लिखे लोग थे, उन्हें उतनी परेशानी नहीं होती थी लेकिन जो गरीब के बच्चे थे, जिन्हें टीयूशन पढ़ने के लिए न पैसे थे और न ही काम से फुर्सत या फिर जो पहली पीढ़ी के बच्चे कलम पकड़े थे, उनके लिए अंग्रेजी गले की फांस बन जाती थी, बहुत सारे बच्चे अंग्रेजी की वजह मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे और उच्च शिक्षा से महरूम रह जाते थे। उस समय बिहार के अधिकांश लोग गरीबी में जी रहे थे और पहली बार बार विद्यालय का मुँह देख रहे थे, जिसमें मुख्य रूप से दलित, आदिवासी एवं पिछड़े परिवार थे, उसमें भी लड़कियों के लिए और कठिन समस्या थी।

कर्पूरी ठाकुर के इस ऐतिहासिक फैसले के परिणाम स्वरूप उच्च शिक्षा में दलित, आदिवासी एवं पिछड़े तबका के विद्यार्थियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी। प्रसन्न कुमार चौधरी तथा श्रीकांत अपनी पुस्तक 'बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम' में लिखते हैं कि "उन दिनों के अभिजात्य माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में भी छात्रों की सामाजिक संरचना बदलने लगी। पिछड़ी जातियों के ग्रामीण छात्रों की तादात अब इन विश्वविद्यालयों में बढ़ने लगी।" उनका मानना है कि 1974 के छात्र आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति की सफलता में भी इसका असर है क्योंकिगांवों से पिछड़ी जाति के छात्र शहरों में पढ़ने आने लगे थे, जो आंदोलन से जुड़ कर आंदोलन को गाँवों तक पहुँचाकर व्यापकता प्रदान कर दिए।

साथ ही उनके हिन्दी भाषा प्रेम के सम्बंध में यह भी जानना चाहिए कि जब वे 22 दिसम्बर, 1970 को पहली बार मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने 'हिन्दी प्रगति समिति' का गठन किया। उस समिति के सदस्य रह चुके डॉ. रामखेलावन राय लिखते हैं कि "कर्पूरी जी के शासनकाल में राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन करनेवालों की प्रोन्नति और वेतन-वृद्धि रोक दी जाती थी, जिसके कारण परिणामस्वरूप जिलाधीश तक इस अधिनियम का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करते थे।" वे आगे लिखते हैं कि "कर्पूरीजी के मुख्यमंत्री काल में सभी सरकारी अधिकारियों को हिन्दी में ही संचिका प्रस्तुत करने का निर्देश प्राप्त था और कोई भी अधिकारी इस नियम का उल्लंघन करने की बात सोच भी नहीं सकता था। इस हिन्दी के हिमालय से भला कौन टकराता?" 'राष्ट्रीय विकास परिषद' की बैठक में उस वक्त सारा काम अंग्रेजी में ही होता था। उस परिषद में पहली बार हिन्दी में बोलने वाला सदस्य भी कर्पूरी ठाकुर ही बने और वहाँ भी हिन्दी को स्थापित करवाया।

देश के बहुत लोगों को नहीं पता होगा कि आज भी मैट्रिक बोर्ड में डिवीजन अंग्रेजी छोड़कर ही बनता है। समय-समय पर बदलाव होते रहे, इतिहास, भूगोल एवं नागरिक शास्त्र को सामाजिक विज्ञान तथा भौतिकीशास्त्र, रसायन शास्त्र, एवं जीव विज्ञान के तीन-तीन पत्रों की जगह एक-एक पत्र क्रमशः सामाजिक विज्ञान तथा विज्ञान कर दिया गया लेकिन अंग्रेजी को मेरिट में शामिल नहीं किया गया। बिहार के मैट्रिक बोर्ड में वर्तमान में छः विषय गणित, हिन्दी, संस्कृत, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान एवं अंग्रेजी हैं लेकिन डिवीजन सिर्फ शुरू के पाँच विषयों के प्राप्तांक पर ही तय होता है।

कर्पूरी ठाकुर, जननायक बने और अब भारतरत्न भी बन गए लेकिन उनके द्वारा खींची गई लकीर आज भी कायम है।

Photos from एक लकीर's post 13/09/2025

अपने देश में 48 वर्षीय शिक्षक विजय कुमार बंधु ने ी_लकीर खिंच दी है, जो अमिट है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़कर लखनऊ में पढ़ा रहे उच्च माध्यमिक विद्यालय का एक साधारण शिक्षक राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता है, यह सोचकर कितना आश्चर्य होता है लेकिन यह सच है। उत्तर प्रदेश के सरकारी शिक्षकों का एक संगठन ATEWA है, जिसके प्रांतीय अध्यक्ष विजय कुमार 'बंधु' हैं, जिन्होंने नेशनल मुवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम (NMOPS) नामक एक विशाल संगठन खड़ा किया है और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।

भारत के एक ऐसे प्रधानमंत्री हुए जो आजीवन अविवाहित रहे, उनका नाम है अटल बिहारी वाजपेयी। उन्होंने परिवार के दुःख-दर्द और परिवार में सेवानिवृत बुजुर्ग की स्थिति को कितना समझा मुझे नहीं पता लेकिन वे एक कवि थे और साहित्य में रूचि रखते थे तो उषा प्रियंवदा की कहानी 'वापसी' तथा भीष्म साहनी की कहानी 'चीफ की दावत' जरूर पढ़ी होगी। खैर, उन्होंने देश में एक ऐसा काला क़ानून लाया, जिससे 30-40 साल सेवा देने के बाद नौकरी-पेशा वाला आदमी सेवानिवृत होता है तो उसकी आँखों के सामने कालीमा छा जाती है।

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल 2004 में 1 अप्रैल से पुरानी पेंशन योजना (OPS) को हटाकर नई पेंशन योजना (NPS) लागू किया, जिसका नाम बदलू सरकार नाम बदलकर 'नेशनल पेंशन स्कीम' कर दी। ज़ब यह योजना लागू की गई तब इसकी खूब बखान की गई लेकिन बखान करने वाले सब पुरानी पेंशन योजना के तहत सेवारत थे और आज भी कोई गुणगान करते दिखता है तो वह पुरानी पेंशन योजना का ही लाभ लेने वाला होता है। ज़ब यह काला क़ानून लागू हुआ तब उससे प्रभावित होने वाला कोई कर्मचारी नहीं था, शायद इसलिए पुरजोर विरोध नहीं हो पाया। धीरे-धीरे सभी राज्यों में इसे लागू किया गया लेकिन पश्चिम बंगाल जो वैचारिक रूप से बहुत परिपक्व व प्रगतिशील माना जाता है, वह लागू नहीं किया, जो कि सराहनीय फैसला रहा।

1 अप्रैल, 2004 के बाद जैसे-जैसे लोग नौकरी में आते गए और उनके वेतन से 10% कटौती करके एनपीएस के तहत सरकार पैसा शेयर मार्केट में लगाती गई और ज़ब उसमें से कुछ लोग सेवानिवृत होने लगे और उन्हें पेंशन के नाम पर सरकार झुनझुना थमाने लगी तब काले क़ानून की कलई खुलने लगी।

विजय कुमार बंधु जैसे क्रांतिकारी शिक्षक नेता को महसूस हुआ कि यह तो सरकारी सेवकों के साथ बहुत बड़ा छलावा है। उन्होंने एनपीएस के बारे में गहन अध्ययन किया और ज़ब वे पूरी तरह से संतुष्ट हो गये कि यह क़ानून कर्मचारी विरोधी है तब उन्होंने एक संकल्प लिया कि इस क़ानून का हटाकर ही दम लेंगे। बंधु जी ने अपने साथियों के साथ इसके खिलाफ एक मोर्चा खोला और पर्चा छपवाकर लोगों को बाँटना शुरू कर दिया। तब लोगों को लगता था कि इस पर्चे के बाँटने से केंद्र की सरकार थोड़ी सुन लेगी लेकिन इस देश में दशरथ मांझी जैसे पुरखे भी हुए हैं जो एकेले पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना दिए।

बंधु जी ने पिछले एक दशक से रविवार की छुट्टी को अपने परिवार के बीच व्यतीत न करके अपने संगठन के साथियों संग व्यतीत करते हैं और आज उनके इसी त्याग का परिणाम है कि उनकी एक आवाज पर लाखों-लाख लोग इकट्ठा हो जाते हैं। कन्याकुमारी से कश्मीर तक बंधु जी ने अपना संगठन खड़ा कर दिया है। आज लोग उन्हें 'पेंशन पुरुष' के रूप में सम्बोधित करते हैं। जो लोग पांच साल पहले कहते थे कि ओपीएस कभी लागू नहीं होगा, आज वही लोग कहते हैं कि एक न एक दिन ओपीएस जरूर लागू होगा।

लोकसभा चुनाव 2019 तक देश में सिर्फ पश्चिम बंगाल में ओपीएस लागू था लेकिन विजय कुमार बंधु के नेतृत्व में एनएमओपीएस तथा उसके सहयोगी संगठनों के संघर्ष की बदौलत छत्तीसगढ़, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार, झारखण्ड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार एवं पंजाब में आप की सरकार ने ओपीएस को बहाल किया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने घोषणा पत्र वादा किया था कि महागठबंधन की सरकार बनी तो वे ओपीएस बहाल करेंगे लेकिन सरकार नहीं बन सकी। बाद में सरकार में शामिल हुए भी तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे जो ओपीएस देना नहीं चाहते हैं। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने भी वादा किया था कि सपा की सरकार बनी तो ओपीएस बहाल की जाएगी लेकिन सरकार नहीं बन सकी। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सहित कई पार्टियों के घोषणा पत्र में ओपीएस को शामिल किया गया था लेकिन INDIA गठबंधन की सरकार नहीं बन सकी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली अहंकारी सरकार को भी UPS लाना पड़ा लेकिन सिर्फ OPS चाहिए। कहीं कहीं कर्मचारियों की भी गलती है कि वे एकजुटता होकर अपने मुद्दे पर मतदान नहीं करते हैं। ज़ब वे जाति व धर्म के नाम पर मतदान करेंगे तो उनके मुद्दे पर सरकारें क्यों विचार करेंगी। बंधु जी साफ कहते हैं कि हमें अपने मुद्दों पर मतदान करना है, जो हमारी बात करेगा हम उसी को वोट देंगे। ज़ब देश में नेताओं को ओपीएस मिल सकता है और अपने वेतन वृद्धि के मुद्दे पर सभी सांसद/विधायक एक हो सकते हैं तो हम क्यों नहीं एक हो सकते हैं।

विजय कुमार बंधु 100 प्रतिशत आश्वत हैं कि एक दिन देश में ओपीएस लागू होगा। यदि सभी कर्मचारियों को यह विश्वास हो जाए तो जल्द ही लागू हो जाएगा। एनएनओपीएस का संगठन सबसे कमजोर बिहार में है क्योंकि बिहार के पुराने शिक्षक ओपीएस में थे और नए शिक्षक नियोजित थे इसलिए वे इस संगठन से दूरी बनाये हुए थे लेकिन अब बिहार के सभी नए शिक्षक राज्यकर्मी हो गये हैं और एनपीएस में शामिल हो गये हैं इसलिए बिहार में भी संगठन को मजबूत किया जा सकता है।

बिहार में प्रदेश अध्यक्ष तथा महासचिव की जिम्मेदारी शिक्षक नेताओं को सौंपने की जरूर है ताकि वे 8-9 लाख शिक्षकों को एनएमओपीएस से जोड़ कर बिहार सरकार को मजबूर कर दें ओपीएस बहाल करने के लिए। बहरहाल एनएमओपीएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय कुमार बंधु जी 14 सितम्बर को पटना के ऐतिहासिक मैदान (मिलर हाई स्कूल मैदान) में पधार रहे हैं, जहां कि बदल में ही भाजपा, राजद एवं जदयू का पार्टी कार्यालय है।

अब बिहार के सरकारी कर्मचारियों का दायित्व बनता है कि 14 सितम्बर को पटना 'पेंशन संघर्ष महारैली' में पहुँच कर हुंकार भरें।

#पेंशन_संघर्ष_महारैली #पुरानी_पेंशन Vijay Kumar Bandhu

Photos from एक लकीर's post 05/09/2025

के लिए के साथी नगरपालिका चौक, छपरा पर एक दिवसीय धरना दिए हैं।

01/09/2025

1 सितंबर, 2005 को बिहार लागू किया और छीन लिया गया, इसलिए आज
#काला_दिवस है।

07/08/2025

माननीय सांसद #चंद्रशेखर_रावण जी को हार्दिक आभार!💐🙏🏾

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