Alok Vikram Singh

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मैं शैव-शाक्त परंपरा का साधक एवं उपासक हूँ।
माता-पिता, राष्ट्र और धर्म की सेवा-रक्षा ही मेरा परम ध्येय है। मैं सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र विचारक और सनातन-समर्पित साधक हूँ-सत्य एवं न्याय का पक्षधर।
मेरा व्यवहार-आपके व्यवहार पर निर्भर। 🙏

25/05/2026

🔱🚩🙏 ्री_महाकाल 🙏🚩🔱
🔱🚩बाबा श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जी के संध्याकालीन मंगला श्रृंगार आरती दर्शन🚩🔱
🙏 #विशेष_शिवप्रिय_सोमवार 🙏

25/05/2026

🔱🚩🙏 ्री_महाकाल 🙏🚩🔱
🔱🚩बाबा श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जी के प्रातः कालीन मंगला भस्म श्रृंगार आरती दर्शन🚩🔱
🙏 #विशेष_शिवप्रिय_सोमवार 🙏

24/05/2026

हमें जापान से उसकी तकनीक, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, ईमानदारी, शिक्षा, आपदा से लड़ने की क्षमता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और देशहित में समर्पण सीखना था… मगर भारतीय बाजार, समाज के नीम-हकीम और दवा कंपनियों ने लिया भी तो क्या लिया- एक तेल के आगे “जापानी” शब्द जोड़ लिया… और नाम दे दिया उसका “जापानी तेल”!
अब यह जापानी तेल वास्तव में जापान का है भी नहीं, न ही उसमें जापान की कोई विशेष तकनीक लगी दिखती है। लगता है किसी दूरदर्शी मार्केटिंग महापुरुष ने अपने उत्पाद को आकर्षक बनाने के लिए नाम के आगे “जापानी” जोड़ दिया- और खेल ऐसा खेला कि खेल ही जम गया और तेल सारा बह गया!
मगर जिस उद्देश्य से “जापानी” शब्द लगाया गया, उसका प्रभाव समाज में खूब दिख रहा है। लगता है जापान की मजबूती, तकनीक और अनुशासन तो नहीं ले पाए, पर “तेल” वाला प्रयोग बड़े समर्पण से आत्मसात कर लिया!
अरे, इस दौर में सीखना कुछ और था, सीख कुछ और गए… और जो सीखकर आए, उसमें आगे निकलने में तनिक देर भी नहीं लगाई! जिसने भी इस शब्द का खेल खेला, बड़ी चीज खेल गया। अपने ब्रांड और उत्पाद को आकर्षक बनाने के लिए ऐसा प्रयोग किया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, दवा दुकानें और चारदीवारी तक इस नाम से रंगी पड़ी हैं।
और वैसे भी भारतीय समाज एक बार जिसे स्वीकार कर ले, उसे आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अब कहीं जनसंख्या वृद्धि की कहानी में भी यह “अतिरिक्त उत्साह” अपना तनिक योगदान तो नहीं दे रहा- यह शोध का विषय समाज स्वयं तय कर ले!
अब मालूम नहीं किस महापुरुष ने “जापानी” शब्द को इस रूप में समाज में स्थापित किया, मगर मीडिया और प्रचार-प्रसार ने भी इसमें यथोचित योगदान दिया। देश तो शायद ऐसा नहीं सोचता, लेकिन गाहे-बगाहे समाज ने इसे आत्मसात जरूर कर लिया। कल तक जो केवल एक शब्द था, आज समाज उसे अपने ढंग से यथार्थ में उतारता भी दिख रहा है। इतना ही नहीं, अब तो बोलचाल की भाषा में भी लोग मजे लेने और तंज कसने के लिए इसका प्रयोग करने लगे हैं।
“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।”
जापान वहाँ तकनीक, शिक्षा, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, आपदा प्रबंधन, ईमानदारी, स्वास्थ्य, इन्फ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्ता, सैन्य क्षमता, स्वच्छता और वैश्विक प्रतिष्ठा के बल पर विश्व पटल पर मजबूती से खड़ा है… और हम “जापानी” शब्द का अर्थ शायद कुछ और ही निकाल बैठे!
अब जे है सो है… इसमें योगदान देने वाले भी सोचें और इसका सहारा लेने वाले भी कि वास्तव में खुद को, समाज को और देश को आगे बढ़ाने में क्या जरूरी है। या फिर समाज इतना कमजोर हो गया है कि मजबूती भी दूसरे देश के नाम के सहारे तेल में खोजनी पड़ रही हो, और देसी अंदाज में उसका प्रतिफल भी दिख रहा हो!
खैर, नाम का सदुपयोग देश, समाज और कंपनियाँ करतीं तो कुछ और भला होता… हालांकि भला तो वैसे भी हो ही रहा है! हम भले लोग और देशवासी हैं—किसी न किसी रूप में “भला” करके ही रहेंगे!
खूबसूरती तो देखो भाई- इस “जापानी” का प्रयोग करके भी लोग आखिरकार देसी ही हो रहे हैं!
✍️🤣

18/05/2026

कोर्ट के माध्यम से #भोजशाला प्रकरण में हिंदू पक्ष के पक्ष में आए निर्णय हेतु याचिकाकर्ताओं सहित समस्त हिंदू समाज को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
धीरे-धीरे #न्यायालय और #कानून के माध्यम से वे धार्मिक स्थल, जो कभी हिंदुओं की आस्था के केंद्र थे, समाज को पुनः प्राप्त होते दिखाई दे रहे हैं। यह निश्चित रूप से समस्त हिंदू समाज के लिए गौरव, प्रसन्नता और संतोष का विषय है। समाज खुशियाँ मना रहा है, और यह स्वाभाविक भी है।

किन्तु आज एक चिंताजनक विषय और विडंबना भी सामने है। हमारे समाज, मोहल्लों तथा हिंदू निवास क्षेत्रों के बीच बने छोटे-बड़े, स्थानीय एवं प्राचीन मंदिरों की वास्तविक स्थिति क्या हो गई है? न तो उन्हें समाज से अपेक्षित सुरक्षा मिल पा रही है और न ही समुचित सेवा-संरक्षण।
आए दिन देखने और सुनने को मिलता है कि कुछ नशेड़ी, उपद्रवी, असामाजिक तत्व तथा विधर्मी मानसिकता वाले लोग धार्मिक आस्था के केंद्रों को नुकसान पहुँचाने में सफल हो जाते हैं। कभी मंदिरों में अपवित्र वस्तुएँ फेंक दी जाती हैं, कभी तोड़फोड़ कर दी जाती है, तो कभी प्राण-प्रतिष्ठित विग्रहों को खंडित कर दिया जाता है। बीते एक-दो दशकों से ऐसी घटनाएँ लगातार देखी और सुनी जा रही हैं, परन्तु उनमें तनिक भी कमी आती दिखाई नहीं देती।
जबकि कहा जाता है कि हिंदू समाज जागृत, एकत्रित और संगठित हो गया है। दर्जनों और सैकड़ों हिंदुत्ववादी तथा धार्मिक संगठन भी इसी समाज में रहकर लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहे हैं। लेकिन सच पूछिए तो वर्तमान में धार्मिक आस्था के केंद्र आज भी पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं दिखते। जब अपने ही स्थानीय आस्था केंद्रों को कुछ नशेड़ियों, उपद्रवियों और असामाजिक तत्वों से सुरक्षित नहीं रखा जा पा रहा, तब सोचिए कि यदि कभी बड़े स्तर पर विधर्मी चुनौती सामने आए, तो समाज क्या कर पाएगा? यदि सोचने-समझने की शक्ति शेष है, तो कम-से-कम इस विषय पर गंभीरता से विचार अवश्य होना चाहिए।

वर्तमान परिस्थितियों को देखकर हमारा निजी विचार यही बनता है कि यदि सनातनी हिंदू समाज अपने आस्था केंद्रों- मठ, मंदिर और धार्मिक स्थलों- को सुरक्षा, सेवा और संरक्षण देने में असमर्थ है, तो केवल नए निर्माण करने या पुराने धार्मिक स्थलों को वापस प्राप्त करने की खुशी ही पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें सुरक्षित, संरक्षित और जीवंत बनाए रख पाएँगे?
बीते कालखंड में आक्रांताओं और विधर्मियों द्वारा जिन धार्मिक स्थलों पर कब्जा किया गया, आज उन्हें संविधान, न्यायालय, सरकार और प्रशासन के माध्यम से छुड़ाने का प्रयास हो रहा है। यह स्वागतयोग्य है, किन्तु सच पूछिए तो क्या भविष्य में समाज उन्हें सुरक्षित रख सकेगा, या वे फिर किसी #कब्जे, #सरकारी_नियंत्रण अथवा केवल #पुलिस #सुरक्षा के भरोसे रह जाएँगे?

सरकार को भी इससे अपना लाभ है। धर्म के नाम पर #न्यास_बोर्ड बने हुए हैं, जिन्हें कई लोग #नाश_बोर्ड की संज्ञा भी देते हैं। जब तक समाज न्यास बोर्डों की वास्तविक भूमिका, नियंत्रण और प्रभाव को समझने का प्रयास नहीं करेगा, तब तक धार्मिक स्थलों का वास्तविक उत्थान संभव प्रतीत नहीं होता। बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों को कई स्थानों पर #सरकारी_काउंटर जैसा बना दिया गया है, जहाँ स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था की जगह व्यवस्थागत नियंत्रण और #धार्मिक_उगाही अधिक दिखाई देती है। मगर समाज या तो इसे देख नहीं पा रहा, या फिर न देखने का ढोंग कर रहा है।
खैर, समाज जिस बात में खुश रहना चाहता है, रहे- लेकिन धर्म और आस्था का पतन नित्य निरंतर होता दिखाई दे रहा है। कल जिन स्थलों पर विधर्मी आक्रांताओं ने कब्जा किया था, आज उन्हें छुड़ाया जा रहा है; परंतु क्या उन्हें भविष्य में बचाए रखा जा सकेगा, या वे पुनः किसी अन्य नियंत्रण में चले जाएँगे- यह भी गंभीर चिंतन का विषय है।

खुशियाँ क्षणिक भी क्यों ना हों, लेकिन मजा और आनंद पूरा आना चाहिए। भोजशाला प्रकरण पर समाज को बधाई- परंतु साथ ही यह एक चिंताजनक विषय भी है।
#ध्यान_दें… या फिर #धांस_दें।
.. ✍️🫵

18/05/2026

🔱🚩🙏 ्री_महाकाल 🙏🚩🔱
🔱🚩बाबा श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जी के प्रातः कालीन मंगला भस्म श्रृंगार आरती दर्शन🚩🔱
🙏 #विशेष_शिवप्रिय_सोमवार 🙏

17/05/2026

साल भर जिस “वर” को तर करके गदगद प्रसाद मिलता रहा,
उस “वर” के नाम का “बरगद” बाहर बड़-तर पूजित होते देखा हमने।
🤔✍️😜

16/05/2026

माँ तो माँ होती है—हमारी हो, आपकी हो या हम सबकी, उसकी ममता, त्याग और स्नेह एक समान ही होता है। वैश्वीकरण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इस दौर में बहुत सी बातें बिना गहराई से समझे अपनाई जा रही हैं। ऐसे में #मदर्सडे या #मातृदिवस मनाने की परंपरा भी तेज़ी से बढ़ी है। जबकि भारतीय संस्कृति और परंपरा में माँ किसी एक दिन की मोहताज नहीं रही है। सच तो यह है कि माँ दिवसों में सिमटती कहाँ है, वह तो जीवन के हर दिन, हर क्षण में हमारे साथ रहती है। जिस देश में 'मातृ देवो भवः' की परंपरा रही हो, जहाँ माँ को सर्वोच्च स्थान दिया गया हो, वहाँ मातृ सम्मान का भाव किसी विशेष तिथि तक सीमित नहीं माना गया।
फिर भी आज के फैशन, दिखावे और डिजिटल दौर में ‘मदर्स डे’ का प्रभाव सोशल मीडिया पर सबसे अधिक दिखाई देता है। विडंबना यह भी है कि ऐसे अवसरों पर वे लोग भी बढ़-चढ़कर दिखाई देते हैं, जो स्वयं को धर्म, संस्कृति और परंपराओं का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं। बाज़ारवाद के कंधे पर बैठकर धीरे-धीरे पाश्चात्य प्रभाव हमारे सामाजिक व्यवहार में प्रवेश करता जा रहा है और #मातृ_दिवस तथा #पितृ_दिवस जैसे आयोजन भी उसी का हिस्सा बनते दिख रहे हैं।
स्वर्गीय भाई राजीव दीक्षित जी के कथनानुसार, विदेशों में वर्ष में एक विशेष दिन, विशेषकर मई महीने के दूसरे रविवार को ‘मदर्स डे’ मनाने की परंपरा के पीछे अलग सामाजिक परिस्थितियाँ रही हैं। इस विषय पर उनके विचार सुनने योग्य हैं। लेकिन भारतीय दृष्टि से देखें तो माँ का सम्मान किसी एक दिन का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि बच्चे वर्षभर माँ की ममता, त्याग और स्नेह में ही पलते-बढ़ते हैं। साल भर माँ का दूध पीकर, उसकी छाया में बड़े होने वाले बच्चे यदि केवल एक दिन औपचारिक शुभकामनाओं तक सीमित रह जाएँ, तो यह विचार का विषय अवश्य है। यह विडंबना है, सांस्कृतिक बदलाव है या हमारी परंपराओं में धीरे-धीरे आती सेंध—यह समय के हवाले है। भारतीय संस्कृति में तो हर दिन मातृ दिवस है, क्योंकि माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि जीवन का आधार होती है।
.. ✍️

15/05/2026

🔱🚩🙏 ्री_महाकाल 🙏🚩🔱
🔱🚩बाबा श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जी के संध्या मंगला श्रृंगार आरती दर्शन🚩🔱
🙏 #विशेष_मासिक_शिवरात्रि 🙏

15/05/2026
15/05/2026

🔱🚩🙏 ्री_महाकाल 🙏🚩🔱
🔱🚩बाबा श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जी के प्रातः मंगला भस्म श्रृंगार आरती दर्शन🚩🔱
🙏 #विशेष_मासिक_शिवरात्रि 🙏

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