Param Vir Academy

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24/11/2020

🇮🇳🙏 आज हरियाणा के रोहतक के सर छोटूराम की जयंती है. उनका जन्म 24 नवंबर, 1881 में हरियाणा के एक छोटे से गांव गढ़ी सांपला में बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था. उन्होंने ब्रिटिश शासन में किसानों के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने के लिए जाना जाता था.
वे पंजाब प्रांत के सम्मानित नेताओं में से थे और उन्होंने 1937 के प्रांतीय विधानसभा चुनावों के बाद अपने विकास मंत्री के रूप में कार्य किया. उन्हें नैतिक साहस की मिसाल और किसानों का मसीहा माना जाता था. उन्हें दीनबंधू भी कहा जाता है.
उनका असली नाम रिछपाल था और वो घर में सबसे छोटे थे, इसलिए उनका नाम छोटू राम पड़ गया. उन्होंने अपने गांव से पढ़ाई करने के बाद दिल्ली में स्कूली शिक्षा ली और सेंट स्टीफंस कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया. साथ ही अखबार में काम करने से लेकर वकालत भी की.
कहा जाता है कि सर छोटूराम बहुत ही साधारण जीवन जीते थे. और वे अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा रोहतक के एक स्कूल को दान कर दिया करते थे. वकालत करने के साथ ही उन्होंने 1912 में जाट सभा का गठन किया और प्रथम विश्व युद्ध में उन्होंने रोहतक के 22 हजार से ज्यादा सैनिकों को सेना में भर्ती करवाया.
1916 में जब रोहतक में कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ तो वो इसके अध्यक्ष बने. लेकिन बाद में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से असहमत होकर इससे अलग हो गए. उनका कहना था कि इसमें किसानों का फायदा नहीं था. उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी का गठन किया और 1937 के प्रोवेंशियल असेंबली चुनावों में उनकी पार्टी को जीत मिली थी और वो विकास व राजस्व मंत्री बने.
छोटूराम को साल 1930 में दो महत्वपूर्ण कानून पास कराने का श्रेय दिया जाता है. इन कानूनों के चलते किसानों को साहूकारों के शोषण से मुक्ति मिली. ये कानून थे पंजाब रिलीफ इंडेब्टनेस, 1934 और द पंजाब डेब्टर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 1936. इन कानूनों में कर्ज का निपटारा किए जाने, उसके ब्याज और किसानों के मूलभूत अधिकारों से जुड़े हुए प्रावधान थे.

प्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा 64 फुट प्रतिमा का अनावरण किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के सांपला में सर छोटूराम की 64 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था. इस मौके पर उन्होंने कहा था- 'उनका कद और व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि सरदार पटेल ने छोटूराम के बारे में कहा था कि आज चौधरी छोटूराम जीवित होते तो पंजाब की चिंता हमें नहीं करनी पड़ती, छोटूराम जी संभाल लेते'. पीएम मोदी ने कहा कि सर छोटूराम का किसान और देश में काफी अहम योगदान है. आपको बता दें, 9 जनवरी, 1945 को छोटूराम का निधन हो गया था. जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

24/11/2020

🇮🇳🙏 गुरू तेग बहादुर के धैर्य और संयम से आग बबूला हुए औरंगजेब ने चांदनी चौक पर उनका शीश काटने का हुक्म जारी कर दिया और वह 24 नवंबर 1675 का दिन था, जब गुरू तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया.
24 नवंबर का इतिहास: आज ही के दिन शहीद हुए थे गुरु तेग बहादुर--
सिखों के नौवें गुरू गुरू तेग बहादुर ऐसे साहसी योद्धा थे, जिन्होंने न सिर्फ सिक्खी का परचम ऊंचा किया, बल्कि अपने सर्वोच्च बलिदान से हिंदू धर्म की भी हिफाजत की.
देश के इतिहास में कुछ जांबाज ऐसे भी हुए हैं, जो धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटे. सिखों के नौवें गुरू गुरू तेग बहादुर भी ऐसे ही साहसी योद्धा थे, जिन्होंने न सिर्फ सिक्खी का परचम ऊंचा किया, बल्कि अपने सर्वोच्च बलिदान से हिंदू धर्म की भी हिफाजत की. उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम धर्म धारण नहीं किया और तमाम जुल्मों का पूरी दृढ़ता से सामना किया. गुरू तेग बहादुर के धैर्य और संयम से आग बबूला हुए औरंगजेब ने चांदनी चौक पर उनका शीश काटने का हुक्म जारी कर दिया और वह 24 नवंबर 1675 का दिन था, जब गुरू तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया. उनके अनुयाइयों ने उनके शहीदी स्थल पर एक गुरूद्वारा बनाया, जिसे आज गुरूद्वारा शीश गंज साहब के तौर पर जाना जाता है.

1. कश्मीर में हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बनाने के वे सख्त विरोधी रहे और खुद भी इस्लाम कबूलने से मना कर दिया. औरंगजेब के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई.
2. पिता ने उन्हें त्याग मल नाम दिया था लेकिन मुगलों के खिलाफ युद्ध में बहादुरी की वजह से वे तेग बहादुर के नाम से मशहूर हो गए.
3. दिल्ली का मशहूर गुरुद्वारा शीश गंज साहिब जहां है वहीं पर उन्हें कत्ल किया गया था और उनकी अंत्येष्टि हुई. वो जगह आज रकाबगंज साहिब के नाम से जानी जाती है.
4. साल 1665 में उन्होंने आनंदपुर साहिब शहर बनाया और बसाया.
5. उन्होंने 115 शबद भी लिखे, जो अब पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा हैं.

जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

24/11/2020

🇮🇳🙏 आज भारत माता के अमर बलिदानी वीर सपूत लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार के जन्मदिवस पर सम्पूर्ण भारतवर्ष की ओर से हाथ जोड़कर शिश झुकाकर नमन करते है।
लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार झारखंड राज्य के रांची से थे। उन्हें पंजाब रेजिमेंट के 24 पंजाब में कमीशन दिया गया था, जो कि शौर्य और युद्ध के सम्मान के एक लंबे इतिहास के साथ एक पैदल सेना रेजिमेंट है। कुछ वर्षों तक सेवा करने के बाद उन्होंने सुश्री प्रिया से शादी कर ली और दंपति की दो बेटियाँ सारा और मन है। एक सख्त सिपाही होने के अलावा, लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प एक प्यार करने वाले पिता भी थे। जब भी वह घर वापस आता, लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प ने सुनिश्चित किया कि वह परिवार के साथ बहुमूल्य समय बिताएगा। उन्होंने अपनी बेटियों के लिए खाना बनाना, उन्हें साइकिल चलाना सिखाना और तैराकी के लिए लेकर जाना और उनके साथ कार्टून देखना। यह ऐसा था जैसे वह अपनी बेटियों के साथ बच्चा बन गया हो। लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प के माता-पिता ने उनके बेटे की जिम्मेदारी को स्वीकार किया, चाहे वह देश हो, परिवार हो या सड़कों पर कोई अजनबी।

लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार हमेशा सामने से नेतृत्व करते थे। 2004 में आतंकवादियों के साथ उसकी पहले मुठभेड़ में उसे जो गोलियां लगीं, उसने 2014 में भी आतंकवादियों से लड़ने के लिए उसकी आत्मा को उकसाया था।

उरी ऑपरेशन: 05 दिसंबर 2014
05 दिसंबर 2014 को, लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में 31 फील्ड रेजिमेंट के सेना शिविर पर फिदायीन हमले को बेअसर करने के लिए शुरू किए गए ऑपरेशन के हिस्से के रूप में एक स्तंभ का नेतृत्व कर रहे थे। उरी शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर सेना का कैंप था। 05:45 बजे, उन्होंने महुरा गन एरिया के पश्चिमी भाग में स्टॉप स्थापित किया, जिसमें छह आतंकवादी अंदर घुस गए थे और पांच जवानों को हताहत कर दिया। 05:50 बजे लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार हवलदार सुभाष चंद और लांस नायक गुरमेल सिंह के साथ फायरिंग की चपेट में आ गए। अधिकारी ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए आतंकवादियों को मार गिराया।

इसके बाद, आतंकवादियों ने ग्रेनेड दागे और लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार को घायल करते हुए गोलीबारी करते रहे। अपनी निजी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अवहेलना के साथ, लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार ने उन आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ जारी रखा, जो खुद के सैनिकों को अधिक मजबूत करने का इरादा रखते थे। लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार ने प्रभावी फायरिंग के साथ आतंकवादी को मार गिराया। लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार ऑपरेशन के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए और शहीद हो गए।

लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार को उनकी वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए "शौर्य चक्र" से सम्मानित किया गया। लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार अपनी पत्नी श्रीमती प्रिया शुक्ला और दो बेटियों सारा ओर मन को छोड़कर भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गया। जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

24/11/2020

🇮🇳🙏 मात्र 21 वर्ष की आयु में भारत माता की रक्षा करते हुए चीन के साथ झड़प में गलवान घाटी में शहीद हुए अमर शहीद वीर सैनिक अंकुश ठाकुर को उसके 22 वहां जन्मदिवस पर सम्पूर्ण भारतवर्ष की तरफ से हाथ जोड़कर शिश झुकाकर नमन करते है।

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के भोरंज उपमंडल के कडोहता के अमर शहीद वीर सैनिक अंकुश ठाकुर (21) ने वर्ष 2018-19 में भारतीय सेना की 3 पंजाब रेजिमेंट में भर्ती हुए थे।

आर्मी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह शहादत से सात माह पूर्व ही रंगरूटी छुट्टी पर घर आया था। छुट्टी काटने के बाद वह लद्दाख के सियाचिन में तैनात थे। चीनी सैनिकों ने जब एलएसी के पास गलवां में भारतीय जवानों पर हमला किया, उस दौरान अंकुश भी भारतीय सेना की उसी पलाटून में शामिल थे। इस हिंसक झड़प में भारत के कर्नल रैंक के अफसर समेत बीस जवान शहीद हुए थे।
अंकुश के पिता अनिल कुमार जहां बेटे की शहादत पर गम में डूबे थे, वहीं उन्हें बेटे के बलिदान पर गर्व भी था। अंकुश के पिता अनिल कुमार और दादा सीता राम भी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं। अनिल कुमार हवलदार, जबकि दादा सीता राम ऑनरेरी कैप्टन रैंक से सेवानिवृत्त हुए हैं।

अंकुश के माता-पिता के अलावा घर पर एक छोटा भाई है, जो सातवीं कक्षा में पढ़ता है। परिवार वालों ने बताया कि अंकुश ने उन्हें फोन पर बताया था कि उसकी छुट्टी मंजूर हो चुकी है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण अभी घर नहीं आ पाएगा। वह हालात सामान्य होने के बाद जल्द घर आएगा। परन्तु अमर शहीद ने भारत माता की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और वो घर जरूर आया लेकिन तिरंगे में लिपट कर। अमर शहीद वीर सपूत अंकुश ठाकुर अमर रहे। जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

05/10/2020

🇮🇳🙏 अमर शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा का जन्म एक सैन्य परिवार में एक वायु सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट जेपी शर्मा और श्रीमती सुदेश शर्मा के घर हुआ था। बचपन से ही वह अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना और सशस्त्र बलों में सेवा करना चाहता था। 1991 में एनडीए के लिए चुने जाने पर उनका सपना सच हो गया और वह एनडीए खडकवासला, और आईएमए, देहरादून में अपने प्रशिक्षण के दौरान कई पुरस्कार जीत गए। बाद में 10 जून 1995 को, उन्हें प्रसिद्ध जम्मू और कश्मीर लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट के 12 JAK LI में कमीशन दिया गया था, जो अपने निडर सैनिकों और कई युद्ध सम्मानों के लिए जानी जाने वाली एक रेजिमेंट थी।

अपनी मूल इकाई के साथ कुछ वर्षों तक सेवा देने के बाद, कैप्टन शशिकांत शर्मा दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थे। भारतीय पोस्ट सियाचिन ग्लेशियर के दक्षिण पश्चिम में संकरे साल्टोरो रिज पर स्थित थे, जहां सैनिकों को बर्फीले हवाओं और उप शून्य तापमान के साथ शत्रुतापूर्ण मौसम का सामना करना पड़ता था।

ओप्रेशन मेघदूत: 05 अक्टूबर 1998:
अक्टूबर 1998 के दौरान, कैप्टन शशिकांत शर्मा को सियाचिन ग्लेशियर से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित साल्टोरो रिज पर तैनात किया गया था। 3 अक्टूबर 1998 की रात में 22000 फुट से अधिक की बर्फीली ऊंचाई पर बाना चौकी पर पाकिस्तानी की ओर से भारी गोलाबारी हुई थी। उस दिन कैप्टन शशिकांत शर्मा बाना पद के कमांडर थे, जो भारत के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण पद था। कैप्टन शशिकांत शर्मा ने अपने बहादुर सैनिकों के साथ दुश्मन से अकारण गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए जवाबी हमला किया। हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान, कैप्टन शशिकांत अपनी दाहिनी जांघ और पेट में गंभीर रूप से घायल हो गए।

अपनी चोटों के बावजूद कैप्टन शशिकांत शर्मा ने फायरिंग को निर्देशित करना जारी रखा और अपने पद की रक्षा की। 5 अक्टूबर की सुबह, हालांकि कैप्टन शशिकांत शर्मा के माथे में गोली लगी और वह गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया और शहीद हो गए। कैप्टन शशिकांत शर्मा को उनकी वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण और सर्वोच्च बलिदान के लिए वीरता पुरस्कार, "सेना पदक" दिया गया।

कैप्टन शशिकांत शर्मा अपने माता-पिता और भाइयों को छोड़कर भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गया। जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

05/10/2020

🇮🇳🇮🇳 भारतीय वायुसेना के कौशल से कौन परिचित नहीं है? दुश्मनों को धूल चटाने के कई गौरव कराने वाले पल हमारे जांबाज एयर मैन ने दिए हैं। ऐसी ही एक गाथा है 1971 में भारत-पाकिस्तान जंग की। इस दौरान एयरफोर्स की ओर से जो पराक्रम दिखाया गया था वो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षर में दर्ज है। आज हम वीर गाथा सीरीज में कहानी बताने जा रहे हैं 1971 में एयर फोर्स के लिए जी जान से लड़ने वाले विंग कमांडर विजय कार्निक की जिन्होंने अपनी बहादुरी और मुस्तैदी से पाकिस्तान को मंसूबे में कामयाब नहीं होने दिए थे।

क्या हुआ था उस दिन? 1971 के दिसंबर महीने में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया। पाकिस्तान के हमले का जवाब देते हुए भारतीय वायुसेना के विमानों ने पाकिस्तान को खदेड़ा। इसी दौरान पाकिस्तानी एयरफोर्स ने पश्चिमी एयरफील्ड्स को निशाना बनाया। अब विंग कमांडर की बहादुरी पर एक फिल्म बनने जा रही है। मेकर्स का कहना है- स्क्वॉड्रन लीडर विजय कार्निक 1971 में इंडो-पाक वार के दौरान गुजरात के भुज एयरपोर्ट के इंचार्ज थे। पाकिस्तानी ने वहां बमबारी शुरू कर दी। इस हवाई हमले में एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचा था। पर कार्निक ने बहादुरी दिखाई और उन्होंने किसी भी सूरत में एयरबेस को ऑपरेशनल रखने का फैसला लिया।

तबाह हो गया था एयरबेस: बमबारी की वजह से एयरबेस पूरी तरह तबाह हो गया था। इसे ऑपरेशनल रखना मुश्किल था। लेकिन कार्निक ने वहां आसपास के गांव की 300 महिलाओं को एकजुट किया और उन्होंने एयरबेस को फिर से निर्मित करने का फैसला लिया ताकि इंडियन आर्मी को लेकर आ रही फ्लाइट की वहां लैंडिंग कराई जा सके। उन्होंने इस दौरान अपने दो अफसर, 50 एयरफोर्स जवानों और 60 सुरक्षा कर्मियों के साथ शानदार काम किया जिसके चलते पाकिस्तानी की बमबारी के बाद भी वह एयरबेस ऑपरेशनल रह सका। इस घटना को भारत के ‘पर्ल हार्बर’ मूवमेंट के तौर पर भी जाना जाता है।

ऐसे शुरू हुई थी लड़ाई: दिसंबर 1970 में बांग्लादेश में चुनाव होने के करीब एक साल बाद भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था। इससे पहले कई महीनों तक दोनों देशों के बीच तनाव रहा। मई महीने में पाकिस्तानी आर्मी ने खुलना में करीब 10 हजार लोगों की हत्या कर दी थी। इसी दौरान 16 अगस्त को ऑपरेशन जैकपॉट की भी शुरुआत की गई थी। इसी दौरान 3 दिसंबर को बांग्लादेश एयरफोर्स ने पाकिस्तनी ऑयल डिपो तबाह कर दिए थे। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान एयर फोर्स ने पश्चिमी भारत के एयरफिल्ड को निशाना बनाते हुए हमले शुरू कर दिए। भारत ने तुरंत जंग का ऐलान करते हुए 4 दिसंबर तड़के से पूरी मुस्तैदी से जवाब दिया। 4 दिसंबर 1971 को लोंगेवाला की लड़ाई लड़ी गई। इस दौरान सबसे बड़ा हमला भारत ने कराची में पाकिस्तान पर किया। भारतीय वायुसेना बड़ी बहादुरी का परिचय देते हुए कराची पोर्ट के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया। करीब दस दिन बाद 16 दिसंबर 1971 को मित्रो वाहिनी ने ढाका को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद ईस्ट पाकिस्तान आर्मी ने बिना शर्त भारतीय सेना के सामने सरेंडर किया और इसी के साथ बांग्लादेश आजाद हो गया। जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🇮🇳🇮🇳

04/10/2020

🇮🇳🇮🇳 बाबा हरभजन सिंह : एक शहीद सैनिक, जो आज भी देश की सेवा में है

भारतीय सेना की बहादूरी के किस्से जितने हैरतअंगेज़ और प्रेरणादायक होते हैं उतने ही दिलचस्प भी ! हमने आज तक कई शहीदों और सेना में सेवारत जवानों के किस्से सुने हैं, जिन्होंने जीते-जी अपनी मातृभूमि पर आंच तक नहीं आने दी। पर आज हम एक ऐसे जवान की कहानी बयान करने जा रहें हैं, जिसने शहादत के बाद भी अपने देश की रक्षा का बीड़ा उठा रखा है!
ये दास्तान है बाबा हरभजन सिंह की। 30 अगस्त 1946 को जन्मे बाबा हरभजन सिंह, 9 फरवरी 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थे। 1968 में उन्हें 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में भेजा गया।
4 अक्टूबर 1968 की बात है जब हरभजन खच्चरों का एक काफिला अपने साथ ले जा रहे थें। अचानक नाथू ला पास के नज़दीक आकर उनका पांव फिसल गया और घाटी में गिरने से उनकी मृत्यु हो गई। पानी का तेज बहाव उनके शरीर को बहाकर 2 किलोमीटर दूर ले गया।
कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी मौत की ख़बर दी और यह भी बताया कि उनका शरीर कहाँ मिलेगा। खोजबीन करने पर तीन दिन बाद भारतीय सेना को बाबा हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर उसी जगह मिल गया।
यह भी माना जाता है कि सपने में उन्होंने इस बात की इच्छा जताई थी कि उनकी समाधि बनाई जाये। और उनकी इस इच्छा का मान रखते हुए उनकी एक समाधि बनवाई गई। लोगों में इस जगह को लेकर बहुत आस्था थी लिहाजा श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने 1982 में उनकी समाधि को 9 किलोमीटर नीचे बनवाया दिया, जिसे अब बाबा हरभजन मंदिर के नाम से जाना जाता है। हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते है।
भारतीय सेना में यह मान्यता है कि कहा जाता है कि शहीद होने के बाद भी बाबा हरभजन सिंह नाथु ला के आस-पास चीन सेना की गतिविधियों की जानकारी अपने मित्रों को सपनों में देते रहे है, जो हमेशा सच साबित हुई है। इसी तथ्य के आधार पर उनको मरणोपरांत भी भारतीय सेना की सेवा में रखा गया। यहां तक उनके प्रति सेना का भी इतना विश्वास है कि उन्हें बाकी सभी की तरह वेतन, दो महीने की छुट्टी आदि सुविधा भी दी जाती थी। दो महीने की छट्टी के दौरान ट्रेन में उनके घर तक की टिकट बुक करवाई जाती है और स्‍थानीय लोग उनका सामान लेकर जुलूस के रूप में उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते हैं। उनके वेतन का एक चौथाई हिस्सा उनकी मां को भेजा जाता है। यही नहीं पद भी बदल जाता है। नाथुला में जब भी भारत और चीन के बीच फ्लैग मीटिंग होती है तो चीनी बाबा हरभजन के लिए एक अलग से कुर्सी भी लगाते हैं।
इनके मंदिर में बाबा हरभजन सिंह के जूते और बाकी का सामन रखा गया है। भारतीय सेना के जवान इस मंदिर की चौकीदारी करते हैं और उनके रोज उनके जूतों को पॉलिश भी करते हैं। वहां पर तैनात सिपाहियों का कहना है कि रोज उनके जूतों पर किचड़ लगा हुआ होता है और उनके बिस्तर पर सलवटें पर ‌‌दिखाई पड़ती है। भारतीय सेना ही नहीं बल्कि‌ चीनी सैनिकों का भी मानना है कि उन्होंने भी रात में बाबा हरभजन सिंह को घोड़े पर सवार होकर गश्त लगाते हुए देखा है।
उनकी मौत को 50 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी बाबा हरभजन सिंह की आत्मा भारतीय सेना में अपना कर्तव्य निभा रही है। बाबा हरभजन सिंह को नाथू ला का हीरो भी कहा जाता है। जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🇮🇳🇮🇳

03/10/2020

🇮🇳🙏 अवश्य पढ़ें वीर गाथा----भारत माता की वीर पुत्री शांति तिग्गा: देश की पहली महिला जवान

किसी जंग में एक पुरुष अफसर या जवान की शहादत के कई किस्से तो आपने सुने ही होंगे.

ऐसा कम ही हुआ है, जब एक महिला फौजी को देश के लिए शहीद होने का मौका मिला हो. जिनको भी यह मौका मिला, उन्हें बहादुरी और हिम्मत की मिसाल समझना गलत नहीं होगा.

ऐसी ही एक महिला थीं शांति तिग्गा, जो भारतीय सेना में भर्ती होने वाली पहली महिला जवान थीं. उन्होंने 35 की उम्र में यह साबित कर दिया कि कुछ करने के लिए जवानी नहीं, बल्कि रगों में दौड़ता गर्म खून और जज़्बा चाहिए. हालाँकि उनका सफ़र काफी छोटा रहा, लेकिन जितना रहा वो अनंतकाल तक उनके नाम की “अमर ज्योति” जलाये रखने के लिए काफी है.

तो आइए शांति तिग्गा की जिंदगी और उनके दुखद अंत के रहस्य को ज़रा नज़दीक से जानने की कोशिश करते हैं-

पति की मौत के बाद भी नहीं मानी हार

शांति का जन्म पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ. उनके घर के हालात बहुत नाज़ुक थे. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई का खर्चा नहीं उठा सकते थे. इसी कारण वो ज्यादा पढ़ नही सकी.

वो एक रूडिवादी सोच रखने वाले समाज से थीं. उस समाज की अन्य लड़कियों की ही तरह शांति की शादी भी बहुत छोटी उम्र में करवा दी गयी. वो अभी 20 वर्ष की हुई ही थीं कि वो दो बच्चों की माँ भी बन चुकी थीं.

जिंदगी पति और बच्चों के सहारे कट रही थी. पति रेलवे में थे. उनकी आमदनी से ही घर का गुज़ारा चल रहा था. किसे पता था कि एक छोटे से परिवार के खुशहाल दिन अब ख़तम होने वाले थे.

शांति उस समय कुछ 30 बरस की ही रही होंगी, जब 2005 में उनके पति की मृत्यु हो गयी. बच्चों के सर से पिता का साया उठ चुका था. शांति को अपने दुःख पर गाँठ बाँध कर अपने बच्चों के लिए जीना था.

सरकारी नौकरी होने के कारण उन्हें अपने पति की ही नौकरी मिल गयी. पॉइन्ट्स मैन के तौर पर उन्हें नौकरी पर रख लिया गया. उनकी पहली पोस्टिंग जलपाईगुड़ी जिले में ही, चालसा स्टेशन पर हुई.

इससे परिवार का गुज़ारा चलाने की चिंता अब एक हद तक कम हो चुकी थी. पति की मृत्यु से कुछ समय पहले ही शांति ने टेरिटोरियल आर्मी का ज़िक्र सुना था. उनके कुछ रिश्तेदार इसका हिस्सा भी थे.

देखते ही देखते कब यह शांति का सपना बन गया उन्हें पता ही नहीं चला. चूंकि वो एक गृहणी थीं और 2 बच्चों की माँ थीं, उन्होंने कभी इस ख्याल को हकीकत में तब्दील करने की बात नहीं सोची थी.

35 की उम्र में पूरा किया सपना

अब नौकरी करने की राह पकड़ कर, शांति आत्मनिर्भरता की तरफ अपना पहला कदम उठा चुकी थीं. इसी क्रम में उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी में जाकर अपना सपना पूरा करने का सोचा. वो ओलिव ग्रीन ड्रेस पहनना और बंदूक चलाना चाहती थीं.

2011 में उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी के लिए आवेदन डाला. आवेदन डालते समय उन्हें पता चला कि अब तक कोई भी महिला भारतीय सेना में अफसर रैंक से नीचे भर्ती नहीं हुई है. शांति ने कदम पीछे नही हटाऐ. उन्होंने सोचा कि जब यह सपना उन्होंने अकेले ही देखा था तो इसकी राह पर वो अकेली क्यों नहीं चल सकती.

बिना किसी तरह की हिचकिचाहट के उन्होंने आगे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. परीक्षा में होने वाले फिजिकल टेस्ट की तैयारी करने के लिए शांति ने दिन रात एक कर दिया था.

टेरीटोरियल आर्मी में जवान बनने के लिए जितनी भी लिखित परीक्षा हुई, शांति ने वो सभी पास कर ली. जब बात फिजिकल टेस्ट की आई तो उन्होंने देखा कि हज़ारों पुरुषों के बीच वो अकेली महिला थीं. यह भी उनके जज्बे को तोड़ नहीं सका.

शांति ने अपने प्रदर्शन से सभी को हैरान कर दिया. 1.5 किलोमीटर की दौड़ में उन्होंने सभी पुरुषों को पीछे छोड़ दिया. वो 5 सेकंड पहले ही दौड़ पूरी कर चुकी थीं.

इसके अलावा 50 मीटर की दौड़ उन्होंने केवल 12 सेकंड में पूरी कर ली. यह उस समय का सबसे अच्छा स्कोर माना गया. उन्हें दौड़ते देख वहां मौजूद सभी पुरुष हक्के बक्के रह गए.

सभी परीक्षा पास कर वो भर्ती प्रशिक्षण शिविर पहुंची. वहां रहने के दौरान तिग्गा ने बंदूक को हैंडल करने के अपने कौशल से अपने प्रशिक्षकों को काफी प्रभावित किया और निशानेबाजों में सर्वोच्च स्थान हासिल किया.

इतना ही नहीं, रिक्रूटमेंट ट्रेनिंग कैंप में उनका जोश एक नए उफान पर था. उन्होंने ट्रेनिगं के दौरान इतना शानदार प्रदर्शन किया की उन्हें सर्वोच्च ट्रेनिंग कैडेट घोषित किया गया. इसके लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से पुरस्कार भी मिला.

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें टेरीटोरियल आर्मी की 969 रेलवे इंजिनियर रेजिमेंट में तैनाती मिली. तैनाती के दौरान भी उनकी जाबाज़ी और शारीरिक योग्यता की खूब तारीफ़ हुई.

बदनामी का दाग और फिर...

जिंदगी में ख़ुशी और गम के बादल, धूप और छाया की तरह ही आते-जाते रहते हैं. शांति को अंदाजा भी नहीं था कि उनकी जिंदगी को काले बदल फिर से एक बार घेरने वाले हैं. और शायद ये भी नहीं कि इस बार काले बदल अब कभी हटने वाले नहीं थे.

नौकरी के महज़ डेढ़ दो साल बाद ही शांति पर ये इलज़ाम लगने लगे कि वह सिफ़ारिश कर लोगों की नौकरी लगवाती हैं. इतना ही नहीं, उन पर आरोप लगे कि वो नौकरी लगवाने के बदले लोगों से बड़ी रकम लेती हैं.

जहां एक समय पर पूरी दुनिया उनकी बहादुरी और हिम्मत के किस्से सुनाया करती थी, वहीं लोग अब उन्हें ओछी नज़रों से देखने लगे थे. इल्जामों के शोर के बीच जीना आसान नहीं था. तभी उन पर शारीरिक हमले भी शुरू हो गये.

9 मई, 2013 को उन्हें कुछ अनजान लोगों ने अगवा कर लिया. उनके अपहरण की खबर जब उनकी कंपनी को मिली, तो बिना कोई समय गवाएं उनकी तलाश शुरू कर दी गयी. रात भर तलाश करने के बाद भी शांति का कोई नाम और निशान नही मिला.

अगले दिन सुबह रेल की पटरी के पास शांति उन्हें दिखाई दी. उन्हें एक खंबे से बांधा हुआ था. उनकी आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी. लोग उन्हें जल्दी से अस्पताल ले गए. वहां उन्हें पूरी जांच के बाद भर्ती कर लिया गया. होश आने पर शांति ने सबको बताया कि जिन भी लोगों ने उनका अपहरण किया है, उन्होंने उन पर किसी प्रकार का शारीरिक प्रहार नहीं किया था.

पुलिस अब उनकी जान की हिफाज़त को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. अस्पताल के जिस कमरे में उन्हें भर्ती किया गया था, वहां सुरक्षाबल तैनात किये गए. उन्हें लग रहा था कि निगरानी में होने से शांति अब हर खतरे से सुरक्षित है.

इसी दौरान शांति के बेटे ने कमरे से जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. वो शांति के साथ कमरे में ही था. बाहर खड़े लोग आवाज़ सुन कर अंदर पहुंचे. शांति के बेटे ने बताया कि वो काफी देर से बाथरूम से बहार नहीं निकली हैं.

लोगों ने जब बाथरूम का दरवाज़ा तोड़ा, सामने छत से शांति की लाश लटकी हुई थी. पुलिस ने तो इसे इल्जामों के दबाव में आकर की आत्महत्या बताया, लेकिन शांति के परिवारजनों का कहना है कि उनकी हत्या की गयी थी.

सच्चाई जो भी हो, लेकिन शांति तिग्गा एक जाबाज़ महिला थीं इससे इंकार नहीं किया जा सकता. उनकी विपरीत परिस्थितियों में भी सपने देखने की हिम्मत और उन्हें सच कर दिखाने के जज़्बे ने लाखों महिलाओं को प्रेरित किया है.जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳

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