🙏महीना फागुन का🙏
फागुन का महीना यानी बौराने का, पगलाने का और होडदगं का महीना,
अउरी महिनवा में बरसे न बरसे फगुनवा में रंग रस बरसे जरुर।
बहुत ख़ामोश है जिंदगी थोड़ा शोर होना चाहिए, महीना फागुन का है आसमाँ रंग से सराबोर होना चाहिए।
फागुन महीना नवजीवन, नवयौवन, उमंग,मस्ती और उल्लास का महीना । फागुन का महीना बड़ा अजीब है, कहीं पतझड़ है, हरियाली की उम्मीद लिये, कहीं हरियाली, गरमी की आहट से बेखबर, तो कहीं फूल खिले हैं, रंग समेटे हुए। मानव जीवन का संघर्ष भी कुछ ऐसा ही है।
फाल्गुन का महीना हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना है, इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण इस महीने का नाम फाल्गुन है,इस महीने को आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है, इस महीने से धीरे धीरे गरमी की शुरुआत होती है, और सर्दी कम होने लगती है।
पीली चूनर ओढ़े प्रकृति और जाति,भेद, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी से ऊपर उठकर मित्रता और भाईचारे का त्योहार होली, मानो इन सब में फागुनी बहारें रंग भर रही हों। मुझे याद आती है, अपने समय की होली यूं ही बैठे बैठे सोचने पर मजबूर करती अपनी एवं आधुनिक होली को...
समय समय की बात है होली आज है कल भी होती थी आज इन्टरनेट से बधाईयां देते कल थे देते थे लगा रंग बधाईयां, होली पर पड़ोसी, रिश्तेदारों, दोस्तों के आने पर खुश और आज की बात करें सब सोचे क्यों आये ये और दिखे नाखुश । मेल मिलाप अब दूर का ही सबको लगता अच्छा । हमारे त्यौहार ही हमारे संस्कार है नहीं मनाओगे खुल के त्योहार तो संस्कार कहाँ से पाओगे, अब तो सब त्यौहार फेसबुक व्हाट्सएप्प पर ही मन जातें हैं वह समय दूर नहीं होली हो जाएगी गुल, कहीं यादों में गुम, होली दिखेगी फोटो में सिर्फ ढूंढेंगे उसे गूगल पर मिल हम सब।
इसलिए निकलो और निकालो सब को घरों से बताओ, मनाओ एवं सिखाओ अपने नैनिहालो को होली है त्योहार बौराने का, पगलाने का, मिलने का और मिलाने का ।
सभी को ममता की तरफ से फागुन की पर हार्दिक बधाई🙏🙏🙏
ममता की कलम से
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बहन, बेटी, बहु, सहचारिणी तो कभी माँ बनकर सबके सुख- दुख को सहती है, खट्टे मीठे हर लम्हे एवं रिश्तों को सहेज कर अपने कर्तव्यों को बड़ी बखूबी से निभाती है। पत्थर की दर-ओ-दीवारों को औरत ही घर बनाती है । तभी तो वो नारी कहलाती है । महिला दिवस की हार्दिक बधाई एव शुभेच्छा ।
#नारीशक्ती
#नारी
ममतयी हूँ, बिंदास हूँ,
अपने किरदार से अलग दिखुं।
ये बात मुझे अच्छी नही लगती।
जो हूँ, जैसी हूँ, सबके सामने हूँ, ना पीठ पीछे ज्यादा ना मुँह पर कम हूँ,
ना सोलह साल की कमसीन हूँ, ना बनना चाहती हूँ
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूँ।
मुझे बिल्कुल शौक नही
पडोस के बच्चे से दीदी, भाभी कहलवाने का
मैं उनकी आंटी जैसी हूँ
वही कहलवाना भी चाहती हूँ।
मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूं।
कभी सुट पहन उड़ती हूँ उन्मुक्त गगन में, तो कभी साड़ी बांध धरा पर चलती आहिस्ता-आहिस्ता
छोटी-बड़ी सभी बिन्दी लगाने लगी हूँ,
सुना है, सब फबता है मुझ पर ना भी फबे,
अब इतना नही सोचना चाहती हूँ।
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूं।
कभी चुड़ियाँ खनकाती हूँ हाथों में, कभी घड़ी बांध चलती हूँ समय के संग में,
आजादी अच्छी लगती है मुझको, पर अब रिश्तो के बंधन भी भाने लगे है, मुझको मैं दोनों में तालमेल बिठाना सीख गई हूँ ना उम्र से ज्यादा ना उम्र से कम लगना चाहती हूँ।
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूं।
अपनी बेटे- बेटी की बड़ी बहन जैसी लगती हूँ, ये सुनना पसंद नही मुझको
माँ हूँ, माँ की गरिमा का भी ख्याल रखती हूँ,
थोड़ा पास बिठा उपदेश देती हूँ, तो थोड़ा दोस्त बन बिंदास भी लगना चाहती हूँ।
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूं।
कम उम्र की नासमझी से परे, बुढ़पा के तजुर्बे से पहले परिपक्वता का समागम चेहरे पर अच्छा लगने लगा है मुझको, हल्की सी झांकती बालों की चाँदी को छुपाना नही चाहती हूँ।
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही दिखना चाहती हूं।
ना जीवन को हराना है मुझको, ना मौत से जीतना है मुझ, ये तो तय है कि आये है तो एक दिन जाना है सबको इसलिए कोई गम नही पालना चाहती हूँ, बस आज और इस पल को जीना चाहती हूँ ।
75वीं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, सभी देशवासियों
28/07/2021
बहुत खुबसूरत रचना, मुझे नहीं पता किस ने लिखा, वरन बहुत सजीव चित्रण एक स्त्री के मन का, रचनाकार को मेरा नमन।
*पता नहीं मां सावन में,यह ऑंखें क्यों भर आती हैं -*
जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई, मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते ! जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....
इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पता नहीं किस दिन, उसका अपना घर, मायके में बदल जाता है ! और "अपने घर" में रहते, पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !
राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा, उसको, उसके घर पर याद किया जा रहा होगा !
याद है उंगली पापा की
जब चलना मैंने सीखा था !
पास लेटकर उनके मैंने
चंदा मामा जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद
पापा की गोदी आती है !
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !
पता नहीं जाने क्यों मेरा
मन , रोने को करता है !
न जाने , क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद रात ,
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !
क्यों लगता अम्मा मुझको
इकला पन मेरे जीवन में ,
क्यों लगता जैसे कोई
गलती की माँ लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठीं ये
आँखे , झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !
ए बात बतलाओ माँ ,
मैं किस घर को अपना मानूँ
जिसे मायका बना दिया ,
या इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ
गुड़िया की , यादें आतीं हैं !
पायल, झुमका, बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !
आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,
खुलके हंसना याद आ गया
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग छत की याद वे रातें आती हैं !
तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ
तुम सब भूल गए मुझको
पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?
छीना सबने , आज मुझे
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग, बिसरे घर की यादें आती है !
पता नहीं मां सावन में,यह ऑंखें क्यों भर आती हैं
08/03/2021
नारी के द्वारा, नारी के लिए नारी दिवस पर।
हमने समझ लिया, खुद को साबित करना है, कमजोर नहीं पड़ना है। तभी हम सफल और संतृष्ट होगी।
नारी दिवस 2021 के अवसर पर एक छोटी सी कोशिश हम सहचारिणी के द्वारा, आज के दिन को अपने स्मृति पटल पर अंकित करते हुए।
08/03/2021
नारी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
नारी सरस्वती का रूप है।
नारी लक्ष्मी का स्वरुप है।
नारी दुर्गा-काली का रूप है।
नारी खुशियों का संसार है।
नारी प्रेम का सागार है।
नारी सूरज की सुनहरी किरण है।
नारी कवियों की प्रेरणा है।
नारी श्वेत गंगा जल है।
नारी कृष्ण की मीरा है।
नारी ममता का सम्मान है।
नारी संस्कारों की जान है।
नारी दिव्य ज्योति है।
नारी फूल गुलाब है ।
नारी शक्ति का अवतार है।
नारी स्वयं अर्चना, आराधना है।
नारी स्नेह, प्यार और त्याग की इकलौती पहचान है।
नारी ईश्वर का चमत्कार हैं।
नारी श्रृष्टि का आधार है।
मैं नारी, बीते कुछ दिनों में समाज की विकृत मानसिकता का उदाहरण साक्षात् मेरे समक्ष रहा, मै चाहकर भी अपनी आवाज बुलंद ना कर पाई , अंततः मुझे बोध हुआ कि मैं अपने शब्दों को अपने कलम की ताकत दे अपने विचार समाज के समक्ष रख सकती हूँ, अतः मैं अपनी कलम से अपने व्यक्तिगत विचारों को पंक्तिबद्ध कर समाज के समक्ष रख रही हूँ एवं समाज के विचार जानने के लिए उत्सुक रहूँगी
"नारी का सम्मान, उसका अधिकार है या पुरुष समाज द्वारा भिक्षाटन"
सम्मान शब्द अपने आप में सम्पूर्ण शब्दकोश धारण किए हुए है।
प्रश्न है आखिर सम्मान है क्या?
सम्मान प्रतिष्ठा है, मान है, आबरू, इज्ज़त, गौरव, आदर, तुलना, सत्यकार, अदब,ध्यान रखना, साधुवाद, वाहवाही, सतीत्व, स्तृति, प्रशंसा, जय-जयकार, अभिनंदन, कद्रकरना, महत्त्व प्रदान एवं पगड़ी भी है।
हमारे सभ्य समाज में नारी को यह सब कब और कैसे मिलेगा।
"सम्मान एक अमूर्त अवधारणा है जो योग्यता और प्रतिष्ठा का आवेश है"
वेदों में, ग्रंथों में, संविधान में नारी एवं उसके सम्मान के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता है। मंच से, कलम से भी नारी एवं उसके सम्मान पर अनगिनत सभायें, संगोष्ठीयां आयोजित होती आई है और होती रहेंगी। आज़ादी के 74 साल बाद भी नारी की स्थिति जस की तस बनी है, कहने को हम इक्किसवीं सदी में जी रहे हैं पर खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि मानसिकता में कोई उत्थान नजर नहीं आता।
नारी आज अपने बल बूते एवं संघर्ष की बदौलत आसमां की नई उंचाई छू रही है, कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां हमारी उपस्थिति दर्ज नहीं है।
मगर क्या पुरुष प्रधान समाज स्वयं के समकक्ष नारी को ग्रहण कर पाया है? चाहे वह कार्यक्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र, समाज उस पर कटाक्ष करने से नहीं चुकता।
आज भी स्त्री के अवतरण से लेकर उसकी मृत्युशय्या तक उसके प्रत्येक क्षण पर उसका अधिकार ना के बराबर है। वह जन्म लेगी या नहीं यह तक निश्चित नहीं होता वरन् अगर वह नीयती को मात दे, इस संसार में अवतरित हो भी जाती है तो आज भी वह क्या पहनेगी,क्या खाएगी, किस से बात करेगी, कैसे चलेगी, क्या पढ़ेगी , कहाँ पढ़ेगी, कैसा जीवन साथी होगा आदि...इस प्रकार के अनेक महत्वपूर्ण पलों का निर्णय में उसका अपना मत ना के बराबर होता है। जन्म से नारी के जीवन से संबंधित निर्णय पर उसके स्वयं के अलावा उसके परिवार का, समाज एवं राष्ट्र का योगदान उससे ज्यादा रहता है। कुछ परिवारों में (जो अपवाद है) नारी को स्वयं से संबंधित प्रश्न में निर्णय का अधिकार है परन्तु वहां भी समाज के कर्णधार और ठेकेदार उत्पन्न हो जाते है यह बताने के लिए की नारी के लिए समाज में अमुक चीजें सही हैं एवं अमुक गलत ।
नारी को समानता देने के प्रश्न पर इनके विचार कुछ यूं होते हैं- "नारी को समानता देने के साथ सुरक्षा की जवाबदेही और जिम्मेदारी पुरुष समाज पर है"
मेरा प्रश्न है कि यह जिम्मेदारी किसने दी पुरुष समाज को? पुरुष समाज स्वयं ही अपना महामंडलेश्वर गान कर लेता है । उसने कभी जानने की कोशिश की कि एक नारी के स्वयं के क्या विचार है?
और रही सुरक्षा का प्रश्न तो नारी अवश्य जानना चाहेगी कि सुरक्षा किस से? समाज में व्याप्त कुंठित एवं घृणित मानसिकता से ग्रसित पुरुष समाज से ही ना। नारियों का अपमान, तिरस्कार, शारीरिक व मानसिक बलात्कार, उनको जलाने, दहेज के लिए कष्ट देने,उनको भोग की वस्तु समझने आदि जैसे कुंठित विचार पुरुष समाज की ही देन है। कार्य क्षेत्र में या समाज में नारी का व्यवहार कैसा होगा, इसका निर्णय भी समाज स्वयं लेना चाहता है। नारी अपने विचार, हल्के-फुल्के अनुभव मुस्कुरा के अपने कार्य क्षेत्र या समाज के कुछ मंच पर व्यक्त करती है तो यही कर्णधार नारी पर कटाक्ष एवं असंवैधानिक टिप्पणी करने से नहीं चुकते।
एक प्रश्न जो अक्सर प्रत्येक नारी को कचोटता है वह यह है कि क्या इस सभ्य समाज में कभी नारी के लिए बनी सोच में बदलाव आ पाएगा?
पुरुष-स्त्री को समान अधिकार होते हुए भी लिंगभेद के आधार पर पुरुषों का अपने आपको श्रेष्ठ समझना न केवल गलत बल्कि असंवैधानिक है। कोई भी विभाजन क्षमताओं एवं गुणों के आधार पर किया जाए वही बेहतर , न्यायिक एवं संवैधानिक होता है। इसके लिए सबसे पहले बदलना होगा हमें स्वयं को। जिस दिन नारी खुद को बदलेगी उस दिन बदलाव आएगा।
नारी की दयनीय एवं जटिल परस्थितियों की जिम्मेदार, मैं स्वयं नारी को ही मानती हूंँ क्योंकि वो नारी ही है जो अपने स्वाभिमान की लड़ाई स्वयं ना लड़ अपने लिए सहारा खोजती है वह भी पुरुष के रूप में, जीवन में हमें कोई परेशानी, समस्या, विपत्ति आती है तो हम अपने पिता, पती, पुत्र, भाई या अपने पुरुष सहकर्मी के पास दौड़ कर जाते हैं आखिर क्यों?
या तो हम अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने में सक्षम नहीं है या हमें अपने भीतर व्याप्त असीम नारी शक्ति का बोध या यूं कहें की विश्वास नहीं है। जिस दिन नारी अपने भीतर की असीम नारी शक्ति का बोध कर लेगी एवं अपने निर्णय स्वयं लेने लगेगी एवं किसी पुरुष पर आश्रित ना हो कर अपने सही एवं गलत की जिम्मेदार खुद को मान लेगी उस दिन निश्चित बदलाव आयेगा।
एक नारी की गलती पर जब दूसरी नारी खड़ी होगी उस दिन बदलाव आएगा। शिक्षा और स्वावलम्बन की जागरूकता जितनी जरूरी है उससे कहीं अधिक जरूरत मानसिक उत्कर्ष को बढ़ावा देने की है। हमारे सभ्य समाज में कुछ वर्षों में नारी उत्पीड़न चाहें वह शारीरिक अथवा मानसिक का आंकड़ा हर पल बढ़ा है मगर क्यों ? प्रत्येक पल एवं दिन नारी के मन का, अस्तित्व का, विचार का, शब्दों का, उसकी भावनाओं का शोषण होता है।
नारी के उत्थान में सबसे बड़ी बाधा स्वयं नारी ही बनी हुई है । जब नारी ही नारी के प्रति संवेदनशील नहीं होगी तो नारी उत्थान कैसे संभव होगा। उसे समानता का अधिकार कैसे मिलेगा? नारी समाज के उत्थान का तात्पर्य है उसे उसके प्रति निरंकुशता,क्रूरता, अमानवीय व्यवहार से मुक्ति मिले, लिंग भेद से छुटकारा मिले उसे एवं उसके विचारों को समुचित सम्मान मिले । नारी उत्थान का अर्थ यह कदापि नहीं है कि समाज नारी प्रधान हो जाय और नारी समाज, पुरुषों का शोषण करने लगे या प्रताड़ित करने लगे ।
समाज में नारी को यथोचित स्थान दिलाने के लिए स्वयं महिलाओं को ऐसी बातों पर ध्यान देना होगा और वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना होगा ।
आजादी के 74 सालों के पश्चात क्या आज भी नारी सुरक्षित हो पायी है? क्या नारी को आज भी खेलने की वस्तु या छेड़ने का सामान नहीं समझा जाता? उसे उपभोग की चीज मान कर विज्ञापनों में प्रदर्शित नहीं किया जाता? समारोह में आगंतुकों के आदर सत्कार के लिए महिला को ही क्यो ? समाज हमें प्रत्येक क्षेत्र में विफल साबित करने में प्रयत्नशील रहेगा, परन्तु हमारा मजबूत मनोबल हमें हारने से रोकता है और हमें निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित करता है।
नारी को नारी के समर्थन, संबल व आश्वासन की जरूरत है। एक नारी पर अन्याय के समय उसी क्षण एक की जगह दस नारियां एकता के परचम में नज़र आएंगी तो अन्याय के बढ़ते हाथ खुद-ब-खुद पीछे हट जाएंगे। एकता की अखण्ड शक्ति ही हर नारी की आत्मशक्ति बन जाएगी।
आज की नारी अपने कर्तव्यों को गृहकार्यो की इतिश्री ही नहीं समझती है, अपितु अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सजग है। स्वयं के प्रति सचेत होते हुए अपने अधिकारों के प्रति आवाज़ उठाने में सक्षम है। कोई सिर्फ यह कहकर हमारे आत्मविश्वास को नहीं हिला सकता कि वह एक नारी है।
नारी का सम्मान उसका अधिकार है जिसे नारी को एकजुट हो अर्जित करना पड़ेगा ना कि पुरूष समाज द्वारा प्राप्त भिक्षाटन।
एक बहुत खुबसूरत रचना जो की हमारे सहपाठी द्वारा रचित है, खास बात इस रचना की यह है कि इसमें बड़ी सुगमता से हमारे नवोदय बिहिया बैच 1991 - 1998 की सभी छात्राओं के नामों को मोतीयों की माला में पिरोया है ,
सहपाठी "अवधेश सिंह" तुम्हरा आभार
" बिन प्रेरणा, स्नेह कब कविता हुई है,
श्वेत, निर्मल, संगीत गा मीरा ममतामयी हुई है।
पुष्प एंव पुष्पलताओं ने मंजूमय, कृष्ण किरण, रेनू-गुणियों का सुनीति रागिनी गाया होगा,
तब खुशबूदार रिंकी कर अर्चना इंदु-रीत ज्योतिमय सरिक आभा पाया होगा"
ढलते सूर्य के साथ आपके जीवन की सभी परेशानी आपसे दूर हो जाये और उदयमान सूर्य की तरह आपके जीवन मे नई नई खुशियों का आगमन हो। आपका मान सम्मान,धन, वैभव, यश कृति, पद, प्रतिष्ठा हमेशा बढ़ती रहे।
हमारे पुत्र 'पलाश ओझा' द्बारा बक्सर अपने ननिहाल की छठ पूजा की कुछ झलकियां।
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