केंद्र सरकार ने 94 करोड़ रूपए केवल स्वच्छता अभियान के विज्ञापनों पर खर्च कर दिया है - शरद यादव
केंद्र सरकार ने 94 करोड़ रूपए केवल स्वच्छता अभियान के विज्ञापनों पर खर्च कर दिए हैं। मुझे या किसी को भी करदाताओं के पैसों को इस तरह से खर्च करते हुए देखकर दुःख होगा मगर सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भारत की बहुसंख्यक आबादी लाचार, गरीब, पिछड़ी हुई 80 प्रतिशत से ज्यादा है और जो गाँवों में रहते हैं। इन लोगों को अपने पेट के लाले पड़े हुए हैं और बजाय इन गरीबों का पेट भरने से पहले आप स्वच्छ भारत अभियान में करोड़ों रूपए खर्च कर रहे हैं। इन विज्ञापनों पर खर्च हो रहे पैसों पर जल्द अंकुश लगाया जाये
जदयू किसान प्रकोष्ठ
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जदयू किसान प्रकोष्ठ Political Organization
जोसफ बर्नाड, नई दिल्ली
बेमौसम की बरसात का कहर झेल रहे किसानों को मुआवजा मिलने में देरी हो रही है । किसानों की खराब आर्थिक स्थिति का खुलासा इंडस्ट्री चैंबर एसोचैम ने किया है। एसोचैम ने स्टडी रिपोर्ट में कहा है कि केवल 19 फीसदी किसानों ने अपनी फसलों का इंश्योरेंस करवाया है। 81 प्रतिशत किसानों की फसलों का बीमा नहीं है। वह पूरी तरह से सरकारी मुआवजे पर निर्भर है। अगर चौपट हुई फसलों का सही मुआवजा नहीं मिला तो किसान पूरी तरह से बर्बाद हो जाएंगे।
जटिल हैं हालात
एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 81 प्रतिशत किसानों ने कई कारणों से अपनी फसलों का बीमा नहीं कराया है। 46 प्रतिशत किसानों को तो फसलों की इंश्योरेंस पालिसी की भी सही जानकारी नहीं है। 35 प्रतिशत किसानों का कहना है कि न तो उनके पास इंश्योरेंस कराने की सुविधा नहीं है और न ही उनके पास इंश्योरेंस का प्रीमियम देने के लिए पैसा है। किसानों ने यह भी बताया कि इंश्योरेंस सेटलमेंट में ज्यादा समय लगने से वह इससे दूर रहते हैं।
स्कीम से जुड़ नहीं रहे किसान
स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने फसलों के इंश्योरेंस के लिए कई योजनाएं तो चलाई है, मगर उसका सही तरीके से परिचालन नहीं हो पा रहा है। खास बात यह है कि इन योजनाओं को प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर चलाया जा रहा है। केंद्र सरकार फार्म इनकम इंश्योरेंस स्कीम पर काम कर रही है, लेकिन किसान इन योजनाओं से खुद को जोड़ नहीं पा रहे हैं।
बदलना होगा नजरिया
एसोचैम के डायरेक्टर जनरल डी.एस. रावत का कहना है कि सरकार को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। सरकार को पहले तो फसल इंश्यारेंस स्कीम की प्रीमियम दरों को तर्कसंगत रखना होगा। इसमें प्राइवेट सेक्टरों को इस तरह शामिल करना होगा, जिससे किसानों को सर्विस और प्रॉडक्ट बेहतर तरीके से दिया जा सकें। इन स्कीमों को न नुकसान, न फायदे की अवधारणा पर चलाना होगा। अगर हो सके तो सब्सिडी भी किसानों को दी जा सकती है। तब जाकर किसान अपनी फसलों के लिए इंश्योरेंस के लिए आगे आएंगे। गरीब किसानों के लिए प्रीमियम दरों में थोड़ी ढील दी जा सकती है।
12/04/2015
मोदी सरकार किसानो की कितनी बड़ी हितैषी है इसका अंदाज़ा सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी के इस बयान से लगाया जा सकता है
"किसानों को भगवान या सरकार पर भरोसा करना बंद करने की नसीहत देते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि किसानों को अपने जीवन का दायित्व स्वयं लेने की जरूरत है, ताकि वे उसमें सुधार कर सकें।"
http://www.jansatta.com/…/nitin-gadkari-to-farmers-d…/23944/
नितिन गडकरी ने किसानों से कहा: भगवान और सरकार पर न करें भरोसा किसानों को भगवान या सरकार पर भरोसा करना बंद करने की नसीहत देते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि किसानों को अपने जीवन का दायित्व स्वयं लेने की जरूरत है, ताकि वे उसमें सुधार कर सकें। गडकरी न...
जदयू किसान प्रकोष्ठ Political Organization
भारत में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और इनकी संख्या बढ़ रही है. नए इलाकों में इसका असर हो रहा है - आखिर क्यों?
इस सवाल के तह तक जाने के बजाए जो सरकारें कर रही हैं वे मर्ज़ का इलाज नहीं बल्कि उसको टालने की कोशिश भर है.
पिछले दिनों जब उत्तरप्रदेश सरकार ने बेमौसम बरसात से कम से कम 35 किसानों की खुदकुशी की बात स्वीकार की तो उसके बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कई ज़िलों का दौरा किया. आज शाम तक जांच टीमें तमाम ज़िलों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौपेंगी.
2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो जून महीने तक देगी. 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है हालांकि जानकार इस सरकारी आकंडे को काफी कम कर आंका गया समझते हैं.
पढ़ें लेख विस्तार से
भारतीय किसान
जहाँ पहले देश में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र से ही आती थीं, वहीं अब इसमें नए इलाक़े जुड़ गए हैं.
इनमें बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाक़े नहीं, बल्कि देश की हरित क्रांति की कामयाबी में अहम भूमिका वाले हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं.
इसके अलावा औद्योगिक और कृषि विकास के आंकड़ों में रिकॉर्ड बनाने वाले गुजरात के क्षेत्र शामिल हैं.
राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान भी अब आत्महत्या जैसे घातक क़दम उठा रहे हैं. पर क्यों? सीधा जवाब ये है कि खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है.
आत्महत्या की वजह
इससे निपटने के लिए सरकार ने अभी तक कोई पहल नहीं की है. आंकड़ों को आधार बनाकर बयानबाज़ी ज़रूर होती रही है.
फ़ाइल फोटो
क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडी के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी.
इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई. इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं.
लेकिन यह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई है.
असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है.
किसानों की लागत बढ़ी
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में किसानों की लागत में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी सिंचाई सुविधाओं पर होने वाले ख़र्च में हुई है.
फ़ाइल फोटो
भूजल स्तर में भारी गिरावट के चलते ब्लैक स्पॉट में शुमार इन इलाक़ों में बोरवेल की लागत कई गुना बढ़ गई है और इसके लिए कर्ज़ का आकार बढ़ रहा है.
तेलंगाना में जब आत्महत्या के आंकड़े बढ़े तो बोरवैल पर कर्ज़ इनकी बड़ी वजह थी. नीचे गिरते जल स्तर के चलते वहां बोरवैल पर प्रतिबंध लग गया था और इसके लिए बैंकों से कर्ज़ नहीं मिलने से किसान साहूकारों के पास जा रहे थे.
पिछले साल उत्तर प्रदेश से किसानों की आत्महत्यों की खबरें आई तो उसकी वजह वहां किसानों का चीनी मिलों पर हज़ारों करोड़ रुपए का बकाया था.
उसके बाद हालात और बदतर हुए हैं.अभी भी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर किसानों का करीब आठ हज़ार करोड़ रुपए का बकाया है.
मुश्किल में किसान
बड़ी तादाद में ऐसे किसान हैं जिनकी जोत दो एकड़ या इससे भी कम है, लेकिन उनको दो साल से गन्ना मूल्य का आंशिक भुगतान ही हो सका है.
फ़ाइल फोटो
पहली बार इन संपन्न माने जाने वाले इलाकों में बच्चों की शिक्षा से लेकर लड़कियों की शादियां तक अटकी हैं.
चीनी पर किसानों के फ़र्स्ट चार्ज के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जब चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट गईं थीं तो सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फ़ैसला दिया था. जबकि भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल बैंकों के पक्ष में खड़े थे.
इस तरह के उदाहरण सरकार की मंशा ज़ाहिर करते हैं कि वह किसान के साथ नहीं खड़ी है. यही वह संदेश होते हैं जो किसान की उम्मीद तोड़ते हैं.
फसलों की क़ीमतें गिरी
पिछले एक साल में अधिकांश फसलों की क़ीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. नतीजतन किसानों की आय कम हुई है.
फ़ाइल फोटो
लेकिन उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा करने का कोई बड़ा क़दम सरकार ने नहीं उठाया है. एक साल के भीतर किसानों को दो प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है.
कमज़ोर मॉनसून के चलते खरीफ़ का उत्पादन गिरा, वहीं फ़रवरी और मार्च के महीने से लेकर अप्रैल के पहले सप्ताह तक जिस तरह बेमौसम की बारिश, ओले और तेज़ हवाओं ने किसानों की तैयार फसलों को बर्बाद किया उसका झटका बहुत से किसान नहीं झेल पाए हैं.
यही वजह है कि इस प्राकृतिक आपदा के बाद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में जिस तरह से किसानों ने आत्महत्याएं कीं, उससे साफ़ है कि आर्थिक रूप से उनका बहुत कुछ दांव पर लगा था जो बर्बाद हो गया.
सरकारों पर भरोसा नहीं
फ़ाइल फोटो
केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम बयानों में उसे भरोसा नहीं दिखा क्योंकि ये कभी किसान की मदद के लिए बहुत कारगर क़दम नहीं उठा पाई हैं.
इस तरह की आपदा के बाद किसानों को राहत के लिए दशकों पुरानी व्यवस्था और मानदंड ही जारी हैं.
सरकार ने इस व्यवस्था को व्यवहारिक बनाने और वित्तीय राहत प्रक्रिया को तय समयसीमा में करने के लिए क़दम नहीं उठाए हैं.
भले ही जनधन में 13 करोड़ से ज़्यादा खाते खुल गये हों, आधार नंबर से जुड़ने वाले बैंक खाते लगभग पूरी आबादी को कवर करने की ओर जा रहे हों, लेकिन किसानों की मदद के लिए अभी भी बेहद पुरानी, लंबी और लचर व्यवस्था ही जारी है.
आत्महत्या की वजह अलग
भारत का किसान
कई बार सूखे का सामना करने वाले राजस्थान में किसान की आत्महत्या की ख़बरें नहीं आती थी क्योंकि वहां किसानों ने दूध को आय का एक मज़बूत स्रोत बना लिया था.
लेकिन अब वहां हालात बदल गए हैं. फसल बर्बाद होने के कारण हो रहे भारी नुकसान से किसान की बढ़ती हताशा उसे आत्महत्या की ओर ले जा रही है.
कर्ज़ नहीं है समाधान
फ़ाइल फोटो
दूसरी ओर, अब भी सरकार के साढ़े आठ लाख करोड़ रुपए के कृषि कर्ज़ के बजटीय लक्ष्य के बावजूद आधे से ज्यादा किसान साहूकारों और आढ़तियों से कर्ज़ लेने को मजबूर हैं. ये किसानों के लिए घातक साबित होता है.
किसानों के बढ़ते संकट का एक कारण किसानों को ज़्यादा कर्ज़ की वकालत करने की बजाय किसान कर्ज़ माफ़ी की बात उठना भी है.
आंध्र प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और तेलंगाना के राजनीतिक दल इसकी वकालत कर रहे हैं. लेकिन यह कोई स्थायी उपाय नहीं है. अगर ऐसा होता तो 2008 की साठ हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद किसान आत्महत्याएं बंद हो जातीं.
इसलिए इसका उपाय किसान की आय बढ़ाने में है न कि कर्ज़ माफ़ी. लेकिन सरकार शायद अभी इस दिशा में कुछ सोच नहीं रही है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पुल निर्माण निगम के कार्यक्रम में केन्द्र के साथ साथ बिहार भाजपा के भावी ,मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने वाले छपास रोग ग्रस्त सुशील मोदी पर जमकर हमला बोला, मुख्यमंत्री ने चुनौती दिया कि यदि हिम्मत है तो अगस्त तक कच्ची दरगाह - बिदुपुर पुल का निर्माण केन्द्र से शुरु करा दें . उन्होंने कहा कि जब राज्य सरकार ने पुल की सारी तैयारियाँ पुरी कर ली है और राज्य 2000 करोड़ लगाने को तैयार है तो केन्द्र से कहा जा रहा कि हमें दे दिजीए हम पुल का निर्माण करा देंगे । इसका पैसा भी हम दे देंगे, अब तक सो रहे थे क्या ?
अब बिहार के प्रति बड़ा प्रेम उमड़ा है, ऐसी बयान आने से तो लोगो को लगेगा कि केन्द्र सरकार पुल बनाने को तैयार है और पैसा भी दे रहा.
सुशील मोदी ने ओछी टिप्पणियाँ की है कि शिलापट्ट पर खुद का नाम खुदबाना चाहते हैं, क्या ऐसी टिप्पणियाँ शोभा देती क्या ?
2010 के चुनाव के समय ही मैं राघोपुर के लोगो को वादा किया था कि हमें सतीश कुमार विधायक चाहिये, और आपको पुल चाहिये ।
बड़े ही आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार अभी तक यह निश्चित नहीं कर पायी है कि बेमौसम की बारिश और ओलावृष्टि के प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में रखा जाए कि नहीं। देश के किसानों के हालात को देखते हुए यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक स्थिति है। हालत यह है कि देश में दलहन और तिलहन की ५०% तथा गेहूं जैसे मुख्य खाद्यान की आधी से अधिक फसल नष्ट हो चुकी हैं। इस भयानक बेमौसम की बारिश और उससे उत्पन्न महाविनाश से हताश सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या तक कर लिया है फिर भी ऐसी स्थिति को प्राकृतिक आपदा घोषित न किया जाना हास्यास्पद है। सरकार को इसे अविलम्ब प्राकृतिक आपदा घोषित करते हुए किसानों की शत -प्रतिशत क्षतिपूर्ति के लिए सामने आना चाहिए। यह बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक ऐसे हालात को राष्ट्रीय आपदा मानने की स्पष्ट नीति क्यों नहीं बन सकी है। वर्तमान केंद्र सरकार एक तरफ अपने विवादास्पद प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून को झूठे किसान मित्रवत बताने की कोशिश कर रही है तो दूसरी ओर इतनी भयानक स्थितियों में भी किसानों के हितों की घोर उपेक्षा कर रही है। यह स्थिति सरकार की नियती की पोल खोलती है।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ जनता दल यूनाइटेड ( किसान प्रकोष्ठ ) की ४ अप्रैल २०१५ को होने वाली बैठक अब ७ अप्रैल २०१५ को रविन्द्र भवन , पटना में होगी .
27/03/2015
बीजेपी समर्थित ए बी वी पी के द्वारा जिस तरह का पटना में रोड पर गुंडई किया गया जो काफी निंद्निये है . बीजेपी सत्ता में आने के लिए बेचैन है . बीजेपी सरकार को अस्थिर करने के लिए एक पर एक षड्यंत्र रच रही है . कल की घटना से उसका असली चेहरा बिहार के जनता के सामने उजागर हो गया . इनलोंगो ने पुलिस के साथ साथ आम पब्लिक को भी नहीं बख्सा . कई राहगीरों को भी चोटें आई . इनलोंगो की गुंडई से राहगीरों के बीच में भगदड़ सा माहौल बन गया था . स्थिति इतना भयानक हो गया कि पुलिस को भी बल का सहारा लेना पड़ा .
मेट्रिक के परीक्षा के समय में भी एक -दो फोटो के द्वारा बिहार को बदनाम करने की भरपूर कोशिश की . बीजेपी अपनी निजी स्वार्थ में छात्रो की भविष्य का भी चिंता नहीं किया कि इन छात्रों को बाहर में किस तरीके से देखा जायेगा . जबकि सच्चाई यह नहीं थी जो तस्वीर में दिखाया गया था . एक दो केन्द्रों के फोटो से पूरा बिहार का छवि बदनाम करना बिहार के छात्रो के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है . बिहार के सभी केन्द्रों पर वह स्थिति नहीं था जो फोटो के माध्यम से प्रचारित किया गया था . जिस केंद्र पर चोरी चल रही थी उस केंद्र का नाम लिखा जाता तो शायद बिहार की छात्रो की इतनी बदनामी नहीं होती .
राज्यसभा के चुनाव से लेकर मांझी प्रकरण तक बीजेपी ने बिहार में जो गन्दा खेल खेला है वह बिहार की जनता देख चुकी है . लोकसभा के चुनाव में जूमला के सहारे देश की जनता को इनलोगों ने अच्छा बेवकूफ बना चूका है . बीजेपी सत्ता में आने के लिए कोई भी स्त्तर तक गिर सकती है यह बिहार ही नहीं देश की जनता जान चुकी है . बीजेपी से सावधान रहने की जरुरत है .
23/03/2015
भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जदयू का सघन आंदोलन
पटना : भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ जदयू अप्रैल के तीसरे सप्ताह में व्यापक आंदोलन शुरू करेगा। गांवों में पदयात्र कर किसानों को इसके खिलाफ गोलबंद किया जाएगा। आंदोलन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह भी शामिल होंगे। आंदोलन की रूपरेखा तय करने के लिए पार्टी के किसान प्रकोष्ठ की रविवार को बैठक हुई। 1किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार सिंह, पार्टी के अभियान प्रमुख सतीश कुमार और प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार ने बैठक के तुरंत बाद संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अप्रैल की 20 एवं 25 तारीख के बीच किसी दिन पांच दिनों की पदयात्र आरंभ होगी। एक दिन में हर प्रखंड के दस गांवों का भ्रमण होगा। यात्र हर गांव में एक घंटे रहेगी। इस दौरान किसानों को भूमि अधिग्रहण कानून से होने वाले नुकसान की जानकारी देते हुए उन्हें इसके खिलाफ गोलबंद किया जाएगा। इस कार्यक्रम में किसान प्रकोष्ठ के पांच हजार कार्यकर्ता बढ़चढ़ कर हिस्सा लेंगे। पदयात्र की तारीख 4 अप्रैल को प्रकोष्ठ की राज्य स्तरीय बैठक में तय की जाएगी। सतीश कुमार ने कहा कि शरद यादव, नीतीश कुमार एवं वशिष्ठ नारायण सिंह के भी आंदोलन में शामिल होने का कार्यक्रम तय किया जा रहा है। नीरज कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात कार्यक्रम में अपनी भावनाओं को प्रकट कर रहे हैं। लेकिन उन्हें जानकारी रखनी चाहिए कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्हें उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा। केंद्र सरकार कह रही है कि गांवों के विकास के लिए यह कानून ला रहे हैं। लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण में उसने कहीं चर्चा नहीं की है कि जमीन अधिग्रहण देश के विकास में बाधा है। सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार किसानों की जमीन जबरन लेकर कारपोरेट घरानों को देना चाहती है। संवाददाता सम्मेलन में किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष श्री बिरेन्द्र कुय्मर सिंह , प्रधान महासचिव श्री सुरेश सिंह ,अभियान समिति के प्रभारी श्री सतीश कुमार, एम् एल सी एवं जदयू के प्रवक्ता श्री नीरज कुमार , जदयू के महासचिव श्री रविन्द्र सिंह एवं डॉ.नविन आर्या, महासचिव श्री रणविजय कुमार , श्री कर्मवीर आजाद ,सतेन्द्र सिंह , संगठन सचिव श्री सतीश कुमार सिन्हा , श्री राजकिशोर सिंह उर्फ़ कक्कू जी ,एवं सभी जिलों के जिला अध्यक्ष भी मौजूद थे।
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