30/05/2026
आज बिहार की ज्ञानभूमि बोधगया के ऐतिहासिक महाबोधि मंदिर में म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग (President U Min Aung Hlaing) ने शीश नवाया और विश्व शांति के लिए प्रार्थना की।
बिहार की यह पवित्र धरती युगों-युगों से संपूर्ण विश्व को शांति, करुणा और बंधुत्व का मार्ग दिखाने वाला वैश्विक केंद्र रही है। भगवान बुद्ध की यह साझी विरासत आज भी हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक अटूट सूत्र में पिरोती है और वसुधैव कुटुंबकम के हमारे संकल्प को और मजबूत करती है।
28/05/2026
Heartiest wishes on Eid-ul-Adha
Madhubani painting by
25/05/2026
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कला जगत में अपने अद्वितीय योगदान के लिए श्री भरत सिंह भारती को पद्म श्री से अलंकृत किया। श्री भारती भोजपुरी लोकसंगीत के प्रख्यात गायक, संगीतकार, गीतकार, गुरु तथा सांस्कृतिक धरोहर के सजग संरक्षक हैं।
बिहार की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और व्यापक प्रसार में उनका आजीवन समर्पण अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। सात से अधिक दशकों की अपनी साधना यात्रा में उन्होंने एक आदरणीय गुरु, सिद्धहस्त कलाकार और प्रेरक मार्गदर्शक के रूप में लोक परंपराओं को न केवल जीवित रखा बल्कि उन्हें समकालीन समाज से सार्थक रूप से जोड़ने का भी अविस्मरणीय कार्य किया।
25/05/2026
पारंपरिक कृषि-पद्धति को आधुनिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नवीन दिशा प्रदान करने वाले प्रख्यात कृषि मनीषी डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का 'पद्मश्री' से अलंकृत होना, समग्र बिहार तथा राष्ट्र के लिए अतीव गौरव का विषय है।
मुजफ्फरपुर की माटी से जुड़े और बिहार के कृषि क्षेत्र के इस पुरोधा ने अपनी सेवानिवृत्ति के उपरांत भी स्वयं को धरती माता की सेवा में पूर्णतः समर्पित रखा है। तालाबों को समेकित कृषि (Integrated Farming) के रूप में विकसित करने का उनका नवोन्मेषी कार्य, কৃষकों की आय वृद्धि और समृद्धि के नूतन द्वार उद्घाटित कर रहा है।
मक्का तथा चना जैसी फसलों की उन्नत कृषि-विधियों के संदर्भ में उनका प्रगल्भ वैज्ञानिक ज्ञान एवं सुदीर्घ अनुभव, आज भी हमारे अन्नदाताओं एवं नीति निर्माताओं के लिए एक सतत आलोक स्तंभ की भाँति पथ प्रदर्शन कर रहा है।
25/05/2026
बिहार के प्रख्यात लोक कलाकार और नृत्याचार्य स्वर्गीय विश्व बंधु जी को भारत सरकार द्वारा दिया गया पद्मश्री सम्मान, बिहार की लोककला, संस्कृति और परंपराओं के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
बिहार की सांस्कृतिक धरोहर के सच्चे रक्षक के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन लुप्त होती लोककथाओं और ‘डोमकच’ नृत्य शैली को फिर से जीवित करने में समर्पित कर दिया। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष अपना पहला कार्यक्रम प्रस्तुत करने से लेकर 1962 में ‘ये भारत के गांव’ के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से सम्मान पाने तक, उनकी यात्रा अपने आप में ऐतिहासिक रही।
1959 में स्थापित अपने संस्थान ‘सुरंगन’ के माध्यम से और 6,000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियों के जरिए उन्होंने निरंतर कला की सेवा की। उनका देशभक्ति से ओतप्रोत नृत्य-नाटक ‘ई हमर हिमालय’ 1962 के युद्ध के समय राष्ट्रीय चेतना जगाने में एक महत्वपूर्ण माध्यम बना।
मार्च 2025 में वे स्वर्गवासी हो गए लेकिन यह सम्मान उनकी भारतीय रंगमंच और नृत्यकला के क्षेत्र में की गई विराट साधना को अमर कर देता है।