04/06/2026
“खेत बचाओ अभियान: स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित फसल, समृद्ध किसान” 🌱
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – पूर्वी अनुसंधान परिसर (ICAR-RCER), पटना द्वारा 4 जून 2026 को पूर्वी चंपारण (बिहार) के कल्याणपुर प्रखंड स्थित मणि छपरा गाँव में “खेत बचाओ अभियान: स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित फसल, समृद्ध किसान” विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में 74 किसानों, जिनमें 23 महिला किसान शामिल थीं, ने भाग लिया। किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग, मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन तथा दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के महत्व से अवगत कराया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि संतुलित उर्वरक उपयोग से मृदा की उर्वरता, जलधारण क्षमता एवं संरचना में सुधार होता है, उत्पादन लागत घटती है तथा फसल उत्पादकता एवं किसानों की आय में स्थायी वृद्धि सुनिश्चित होती है।
02/06/2026
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने की जरूरत: डॉ. अनुप दास
देशव्यापी “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा दिनांक 02 जून, 2026 को पंचायत प्रतिनिधि/सरपंच सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य पंचायत प्रतिनिधियों, वार्ड सदस्यों एवं कृषक समुदाय के बीच समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तथा प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाकर मृदा स्वास्थ्य संरक्षण एवं कृषि की सतत उत्पादकता को प्रोत्साहित करना था।
इस अवसर पर अपने संदेश में संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास, निदेशक ने दीर्घकालीन मृदा उत्पादकता एवं पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने किसानों से मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों के समुचित संरक्षण हेतु समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने का आह्वान किया तथा बताया कि संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से समय के साथ मृदा के इन गुणों में सुधार देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मृदा के इन सभी गुणों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।
डॉ. दास ने रासायनिक उर्वरकों (यूरिया, डीएपी आदि) पर अत्यधिक निर्भरता को मृदा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि इससे उत्पादन लागत भी बढ़ती है। उन्होंने किसानों को हरी खाद (ढैंचा), जैविक खाद (गोबर की खाद/कम्पोस्ट), फसल अवशेषों के प्रभावी पुनर्चक्रण, जैव उर्वरकों (एजोला, एजोटोबैक्टर, पीएसबी, राइजोबियम आदि) के उपयोग तथा फसल प्रणाली में दलहनी फसलों को शामिल करने जैसे वैकल्पिक पोषक स्रोतों को अपनाकर रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने की सलाह दी।
डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने ग्रामीण समुदायों तक वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के प्रसार में पंचायत प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। डॉ. ए.के. चौधरी, प्रधान वैज्ञानिक ने मृदा उर्वरता बढ़ाने एवं उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में दलहनी फसलों के महत्व की विस्तृत जानकारी दी। वहीं डॉ. अनिर्बान मुखर्जी, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के वैज्ञानिक आधार पर चर्चा की।
कार्यक्रम में लगभग 115 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें मखदुमपुर, चिरोरा एवं अगजा पंचायतों के लगभग 40 पंचायत प्रतिनिधि एवं वार्ड सदस्य शामिल थे। इस अवसर पर मखदुमपुर पंचायत के मुखिया श्री अजय प्रसाद ने कहा कि इस प्रकार के अभियान किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस प्रकार “शिव चर्चा” ग्रामीण महिलाओं के बीच एक सफल जनआंदोलन के रूप में विकसित हुई है, उसी प्रकार मृदा स्वास्थ्य एवं पोषक तत्व प्रबंधन पर भी गांव स्तर पर नियमित चर्चाओं का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे नवीन कृषि तकनीकों को अपनाने की गति बढ़े।
संवाद सत्र के दौरान महिला प्रतिभागियों सुश्री शर्मिला कुमारी एवं सुश्री गीता कुमारी ने बताया कि वे पहले से ही प्राकृतिक खेती की विधियों को अपना रही हैं तथा इसके सकारात्मक परिणाम मृदा की गुणवत्ता एवं फसल स्वास्थ्य पर देख रही हैं।
अपने अनुभव साझा करते हुए वार्ड सदस्य श्री विक्रमादित्य उपाध्याय ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से हरी खाद के रूप में ढैंचा का उपयोग करने के कारण उन्होंने धान की खेती में यूरिया की मात्रा लगभग 50 प्रतिशत तक कम कर दी है, जबकि फसल की उत्पादकता लगभग समान बनी हुई है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी पंचायत प्रतिनिधियों ने मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों को मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने हेतु प्रेरित करेंगे, जैविक एवं जैविक-आधारित कृषि पद्धतियों के प्रसार में सहयोग देंगे तथा “खेत बचाओ अभियान” के उद्देश्यों को सफल बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे। कार्यक्रम ने मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा सतत कृषि के प्रति समुदाय की प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ किया।
02/06/2026
स्वस्थ मिट्टी, समृद्ध किसान!
खेत बचाओ अभियान के तहत रामपुर गांव के किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, हरी खाद एवं एनरिच्ड कम्पोस्ट के महत्व के बारे में जागरूक किया गया। इस कार्यक्रम ने किसानों को बेहतर उत्पादन और दीर्घकालीन मृदा स्वास्थ्य हेतु वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया।
02/06/2026
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने ‘खेत बचाओ अभियान’ के शुभारंभ में सहभागिता की
दिनांक 01 जून 2026 को कृषि भवन, पटना में बिहार सरकार के माननीय कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा जी द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ का शुभारंभ किया गया जिसमें संस्थान केनिदेशक डा.अनुप दास ने भाग लिया। इस अवसर पर कृषि विभाग, बिहार सरकार के प्रधान सचिव, विशेष सचिव, कृषि निदेशक, उद्यान निदेशक, बामेती निदेशक, अटारी के निदेशक, कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक एवं किसान समेत लगभग 400 लोग उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में माननीय मंत्री जी ने प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग एवं समेकित पोषक तत्व प्रबंधन को अपनाने पर बल दिया, जिससे कृषि की स्थिरता, मृदा स्वास्थ्य, किसानों की आय में वृद्धि तथा समृद्धि सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने ‘खेत बचाओ अभियान’ की सफलता हेतु बिहार सरकार की ओर से हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना इस अभियान के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित पोषण प्रबंधन तथा टिकाऊ कृषि तकनीकों के प्रसार के लिए किसानों के साथ निरंतर कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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27/05/2026
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम
आईसीएआर-पूर्वी क्षेत्र के लिए अनुसंधान परिसर, कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केंद्र, प्लांडू, रांची द्वारा रांची जिले के नामकुम प्रखंड अंतर्गत मल्टी गाँव में आदिवासी किसानों के लिए किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य सुधार, संतुलित उर्वरक उपयोग, हरित खाद, जैविक खेती एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम में कुल 27 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 21 महिलाएँ एवं 6 पुरुष शामिल थे। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को ढैंचा, सब्जी सोयाबीन एवं ऑफ-सीजन सेम जैसी दलहनी फसलों की उन्नत खेती, वर्मी कम्पोस्ट, हरित खाद एवं संतुलित उर्वरक उपयोग की तकनीकों की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के अंत में किसानों के बीच ढैंचा बीज का वितरण किया गया, ताकि मृदा उर्वरता बढ़ाने एवं कृषि उत्पादकता में सुधार हेतु हरित खाद को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
27/05/2026
कृषि अनुसंधान परिसर, पटना में IoT-सक्षम मृदा निगरानी प्रणाली का उद्घाटन
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने बीआईटी मेसरा के सहयोग से एक स्वदेशी IoT आधारित मृदा निगरानी प्रणाली विकसित की है, जिसका उद्घाटन 27 मई 2026 को किया गया। यह पहल स्मार्ट एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने तथा क्षेत्र में जल प्रबंधन को अधिक कुशल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट, सिंचाई की बढ़ती लागत तथा जल के असंतुलित उपयोग जैसी प्रमुख कृषि चुनौतियों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। पूर्वी भारत में छोटे एवं बिखरे हुए खेतों तथा मृदा नमी की वास्तविक समय जानकारी के अभाव में अक्सर आवश्यकता से अधिक सिंचाई की जाती है, जिससे जल की बर्बादी, कम जल उत्पादकता तथा मृदा क्षरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
इस परियोजना के अंतर्गत लोरा वैन तकनीक आधारित मृदा नमी निगरानी प्रणाली विकसित की गई है, जो खेत से वास्तविक समय में मृदा नमी संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराती है। इससे किसानों को आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करने में सहायता मिलेगी, जिससे जल की बचत, ऊर्जा लागत में कमी तथा सिंचाई दक्षता में वृद्धि होगी।
संस्थान के निदेशक डॉ अनुप दास ने इस पहल को “स्मार्ट फार्म” की दिशा में एक महत्वपूर्ण और समयोचित कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ कृषि उत्पादन प्रणाली को अधिक टिकाऊ, आधुनिक और संसाधन-कुशल बनाने में सहायक सिद्ध होगी। उन्होंने यह भी कहा कि संस्थान किसानों के लिए किफायती, उपयोगी एवं क्षेत्र विशेष के अनुरूप तकनीकों के विकास हेतु प्रतिबद्ध है।
इस अवसर पर डॉ. आशुतोष उपाध्याय, प्रभागाध्यक्ष, भूमि एवं जल प्रबंधन ने बताया कि यह प्रणाली मृदा नमी की वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम है, जिससे सिंचाई केवल आवश्यकता पड़ने पर ही की जा सकेगी। इससे जल की बर्बादी कम होगी तथा सिंचाई जल उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होगा। यह पहल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना एवं बी आई टी मेसरा, पटना परिसर के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गत विकसित की गई है। वर्तमान में विकसित प्रणाली का फील्ड स्तर पर परीक्षण, कैलिब्रेशन एवं प्रदर्शन मूल्यांकन किया जा रहा है, ताकि इसकी सटीकता, विश्वसनीयता तथा किसानों के बीच व्यापक उपयोग की संभावनाओं का आकलन किया जा सके।
कार्यक्रम में 50 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें वैज्ञानिक, कर्मचारी तथा आईएआरआई पटना हब के छात्र शामिल थे। इस अवसर पर दो हिंदी पुस्तकों—“कृषि में IoT : आधुनिक कृषि की तरफ बढ़ते कदम” तथा “किसानों के लिए ड्रोन संचालन मार्गदर्शिका”—का भी विमोचन किया गया। यह पहल जलवायु-सहिष्णु एवं सतत कृषि विकास को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है तथा पूर्वी भारत में स्मार्ट सिंचाई, कुशल जल प्रबंधन और टिकाऊ कृषि को नई दिशा प्रदान करेगी।
27/05/2026
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा भोजपुर जिले के बहियारा गांव में “उर्वरकों का संतुलित उपयोग” विषय पर प्रशिक्षण-सह-जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में 40 से अधिक किसानों ने भाग लिया। किसानों को मिट्टी जांच के महत्व, उर्वरकों के संतुलित उपयोग, जैव उर्वरकों, ढैंचा द्वारा हरी खाद तथा अजोला के कृषि उपयोग के बारे में जानकारी दी गई।
26/05/2026
स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित भविष्य: प्लांडू से बदलाव की शुरुआत
ICAR–RCER,FSRCHPR, रांची द्वारा प्लांडू गाँव में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, ढैंचा आधारित हरी खाद एवं फसल अवशेष प्रबंधन की उन्नत तकनीकों की जानकारी दी गई। इस दौरान 60 किग्रा ढैंचा बीज का वितरण कर हरित खाद को बढ़ावा दिया गया। किसानों को एकीकृत कृषि प्रणाली, दलहन एवं मोटे अनाज अपनाने के लिए भी प्रेरित किया गया। यह पहल न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक होगी, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारकर टिकाऊ खेती की दिशा में मजबूत कदम साबित होगी