16/08/2020
#LetsOpenBihar Twitter Trend : Most Popular Tweets | Tweet247.net India: बिहार में महिलाओं के सशक्तिकरण में इतनी कमी क्यों ? मिलेगा समान अधिकार, जब बनेगी प्लुरल्स की सरकार । .
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16/08/2020
#LetsOpenBihar Twitter Trend : Most Popular Tweets | Tweet247.net India: बिहार में महिलाओं के सशक्तिकरण में इतनी कमी क्यों ? मिलेगा समान अधिकार, जब बनेगी प्लुरल्स की सरकार । .
08/08/2020
तटबंध का किया निरीक्षण मांझागढ़ । एक संवाददाता। प्रखंड के पुरैना में सारण मुख्य तटबन्ध का निरीक्षण करने पलूरल्स पार्टी की सीएम उम्मीदवार...
05/08/2020
“Examinee is better than examiner!” बिहारी छात्र-प्रतिभा के प्रकाश-स्तंभ ‘देशरत्न’ डॉ. राजेंद्र प्रसाद के घर जीरादेई में! वो बिहारी डीएनए कहाँ चला गया जो मानता था कि “जो बात सिद्धांत में सही नहीं, वह व्यवहार में कभी सही नहीं होगी।” उस आदर्शवाद और उस मेधा का फिर से शासन!
05/08/2020
05/08/2020
"जब 1982 में मिल नया-नया खुला था तो लगता था कि ओह क्या ज़िंदगी हो जाएगी, लेकिन सब बर्बाद कर दिया, अगर किसी और राज्य में होते तो ऐसा होता?" मिल के श्रमिक और संघ के सचिव लाल मोहम्मद मियाँ बकाए पैसे की आस में ऐसा बोलते हुए भावुक हो जाते हैं! बिहार के औद्योगिक पतन की बेशर्म विद्रूपता देखनी हो तो सीवान के टेक्स्टायल 'स्पिनिंग मिल (स्थानीय - 'सुता मिल') की हत्या में जाकर देखिए, जहाँ सड़ चुकी स्पिंडल्स में आसाम की रुई अभी तक फँसी है! 17 एकड़ ज़मीन वाली मिल ज़मींदोज़ होने के कगार पे है, 537 श्रमिक परिवार लुट गए, मशीनें चोरी हो गयी, सरकार ने 13 लाख में पैसे ले-दे कर मिल की छत तक बेच दी, और इस डार्क कॉमेडी का एंटी-क्लाइमैक्स यह है कि पटना में बैठकर "उद्योग के लिए 'उपजाऊ' बिहार में ज़मीन नहीं है" का खटराग अलापने वाली सरकार ने न सिर्फ़ मिल की ज़मीन कॉलेज के नाम कर दी, बल्कि माननीय ने वहीं से रिमोट दबाकर उसकी शिलालेख भी खुदवा दी (जो चोरी-छुपे रात में अधिकारी लगा कर भाग खड़े हुए)! रोज़गार छिन गए श्रमिकों की ज़िंदगी तो डूब ही चुकी, उनका दिल भी टूट गया है। वे जीते-जी मिल की ज़मीन जाने नहीं देंगे की क़सम खाए बैठे हैं और आए दिन बुलडोजर के सामने सो जाते है! लाल मोहम्मद जी, संघर्ष और धैर्य अब सिर्फ़ चार महीने का है, शिलालेख ज़मींदोज़ होगा, मिल नहीं! 'फ़ाइबर टू यार्न' मिल को छोड़िए, आपको पूरा टेक्स्टायल पार्क बना कर देंगे, ज़िंदगी वही होगी जो आपने सोचा था!
03/08/2020
रक्षा बंधन की शुभ कामनाएँ!
02/08/2020
मार्गरेट थैचर की पॉलिटिकल फ़िलासफ़ी से मेरी असहमति है लेकिन 'थैचरिस्म' की एक बात बिल्कुल पते की थी कि समाज, सामाजिक न्याय और समाजों के उद्धार की बातों का कोई मतलब नहीं अगर पॉलिसी-मेकिंग के केंद्र में लोग, परिवार और उनकी ज़िंदगी न हो। सरकार की हर खबर, हर पोर्टल और हर बहस में सिर्फ़ यही आँकड़े मिलेंगे कि कोरोना के कितने टेस्ट हुए, कितने संक्रमित हुए, कितने मरे और कितने स्वस्थ हुए। राज्य में एक बहुत ही सुविधाजनक चुप्पी है कि कितने दुकान बंद हुए, कितने रोज़गार गए, कितने व्यवसाय नष्ट हो गए और कितनों को मुआवज़ा मिला! बिहार जैसे उद्योग-विहीन राज्य में जहां संस्थागत रोज़गार और बिज़नेस हैं ही नहीं और लाखों परिवार दिन-प्रतिदिन की छोटी-सी कमाई पर निर्भर हैं, वहाँ चार-छह महीने तक बिना आर्थिक सहायता के बचे रहना एक ख़ौफ़नाक अनुभव है। यह समझ पाना मुश्किल है कि जनता के पैसे से चलने वाली सरकार आख़िर होती ही क्यों है! आपने टैक्स लेना बंद नहीं किया, बिजली के बिल भी देने हैं, स्कूलों ने फ़ीस लेनी बंद नहीं की और अस्पतालों ने दवाई मुफ़्त नहीं की, लेकिन आय के सारे स्रोत पर लॉकडाउन है! पॉलिसी लोगों को बचाने की है या उनके कष्ट को बढ़ाने की? शगुन के 1000/- भेजने के बाद भी लोग हैं, और उनका जीवन है। उनको सहेजने का समय है और साथ ही सिलाव जैसे लाखों पारम्परिक दिन-प्रतिदिन के उद्योगों को बचाने की।
02/08/2020
01/08/2020
गया ज़िला का होमवर्क: गन्ना की खेती का पुनरुद्धार गुरारू चीनी मिल के साथ, मानपुर के टेक्स्टायल उद्योग का आधुनिक सम्मान, पीतल-काँसा उद्योग की चमक और हज़ारों साल की विरासत की अनमोल धरोहर! ज्ञान की भूमि Plurals Gaya की कमान है ज़िला प्रभारी सुश्री अलका जी के पास, एक आदर्श शिक्षिका, एक शानदार व्यक्तित्व और क्या ग़ज़ब की सकारात्मकता! उनका साथ होना एक आशीर्वाद की तरह है!
31/07/2020
एक और नया महीना, Plurals की एक और नई यात्रा! हर गाँव तक जहां बिहार का भविष्य बसता है। आपको भी बिहार के बेहतर भविष्य में यक़ीन है तो बिहार बदलाव के यात्री बनें!
https://www.plurals.org/JoinTheMovement.aspx
29/07/2020
मीडिया में राजनीतिज्ञों के द्वारा 'कोरोना विस्फोट', 'श्मशान', 'घाट' इत्यादि जैसे शब्दों का लापरवाह इस्तेमाल एक सामान्य व्यक्ति का दिल दहलाने के लिए काफ़ी है। एक चीज़ जो आपको किसी भी संकट में धैर्य देती है वह है 'सकारात्मकता' और आपके धर्म-मज़हब-पंथ के माध्यम से एक अदृश्य शक्ति में आपकी 'आस्था'। लेकिन "डरें नहीं बचें" के सरकारी आश्वासनों का खोखलापन इस बात से उजागर हो जाता है कि शायद इतिहास में पहली बार 'राज्य' ने 'आस्था' के मामले में सीधा पॉलिसी हस्तक्षेप किया है। आस्था के परिसरों को सीधे बंद कर देने पर एक विस्तृत आध्यात्मिक और दार्शनिक बहस हो सकती है। 'सगुण' मार्ग और ईश्वर के साकार रूप में यक़ीन करने वालों के लिए यह एक सदमे वाली बात हो सकती है कि उनके आस्था के केंद्र में विराजमान ईश्वर न सिर्फ़ उनकी सुरक्षा करने में लाचार है बल्कि उसके पास जाना भी आशीर्वाद की जगह वायरस का अभिशाप हो सकता है। इस सूक्ष्म दार्शनिक बात को समझने में तो सरकारें असफ़ल रही ही हैं, बड़ी पॉलिसी बात यह है कि आस्था के केंद्रों को "आवश्यक सेवाओं" का हिस्सा नहीं समझा गया और निर्देशों में उसे 'मॉल, मल्टीप्लेक्स और मनोरंजन केंद्रों' की केटेगरी में रखा गया! क्या 'आस्था' मनोरंजन है, यह एक बड़ा आध्यात्मिक सवाल हो सकता है। बहरहाल, मेरी शिकायत सीधे पॉलिसी-निर्माण की प्रक्रिया को लेकर है जिसमें इस देश में 'स्टेकहोल्डर' को शामिल करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। क्या आस्था के केंद्रों के परिचालन को लेकर 'रिलिजियस ट्रस्ट बोर्ड' इत्यादि से बात की गई? क्या धार्मिक परिसरों के प्रबंधन से तालमेल कर सोशल-डिस्टन्सिंग का पालन करते हुए सीमित गतिविधियों की अनुमति दिए जाने पर कोई विचार हुआ? ठीक है आपने सावन-मेला और तीर्थयात्रा पर रोक लोगा दी, लेकिन क्या लोगों को डराने की बजाय माहौल को सकारात्मक नहीं बनाया जा सकता था? क्या स्थानीय आस्था के परिसरों को पर्याप्त सुरक्षा के साथ सावन जैसी पूजा या लोकल प्रेयर्स के लिए तीर्थयात्रा का स्थानीय केंद्र नहीं बनाया जा सकता था जिस पर गाँवों और शहरों की बड़ी अर्थव्यवस्था भी निर्भर करती है? क्या कोई मुआवज़ा नहीं देना चाहिए था? क्या ऑनलाइन दर्शनों और दान की एक बड़ी व्यवस्था का नेट्वर्क नहीं बन जाता इतने दिनों के निठल्लेपन में जिससे फूल-प्रसाद इत्यादि बेचने वालों को आर्थिक सहायता दी जाती? हो सकता है कि विचार-विमर्श के उपरांत इन सब प्रश्नों का उत्तर 'नहीं' में होता, लेकिन विमर्श तो हो! हो सकता है कि एक मध्यम-मार्ग हो सकता था जो लोगों को खुश भी रखता, सकारात्मक भी और सही 'मेंटल हेल्थ' में भी! लेकिन जनता के 'आस्था' पर चलने वाली सरकारें चूक गईं क्योंकि सरकारें सच में यह मानने लगी हैं कि इस पृथ्वी के भगवान तो वे ही हैं! भगवान बन गए हैं तो उनकी तरह आश्वस्त भी करना सीखिए, डराइए मत और मृत्यु का ख़ौफ़ तो मत ही दिखाइए प्लीज़! भगवान से मुक़ाबला छोड़िए, आप अपनी हॉस्पिटल सम्भालिए बस! सब बचेंगे, सब सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि लोगों के दिलों में आप नहीं, ईश्वर बसता है!