Dr Rajeev Singh

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Dr Rajeev Singh उपाध्यक्ष आरोग्य भारती अवध प्रान्त, National Eminent Member BJP

स्व. पंडित दीन दयाल जी की जयंती पर शुभकामनाएँ ध्येय मन्दिर की दिशा में पग सदा बढ़ते रहें।ह्नदय में तव स्मृति लता नित पल्...
25/09/2026

स्व. पंडित दीन दयाल जी की जयंती पर शुभकामनाएँ

ध्येय मन्दिर की दिशा में पग सदा बढ़ते रहें।
ह्नदय में तव स्मृति लता नित पल्लवित होती रहें।

कृपा से हमको मिले गति मति सहित द्युति आपकी
कष्ट में सुख में सदा आ बसी हो छवि आपकी।
ध्येय निष्ठा ह्नदय उर में पथिक बस चलता रहे ॥१॥

देखकर चहुँ ओर दुःख दारिद्रय भीषण आपदा।
द्रवित होकर आपने फिर त्याग दी सब सम्पदा।
दंभ मोह हताश होकर आपको लखते रहे ॥२॥

शत युगों में आप जैसा अवतरित व्यक्तित्व पाया
आपके स्मृति कवच ने नित्य ही हमको बढ़ाया।
दृष्टि निश्चय भाव से धृव ध्येय पर केन्द्रिय रहे ॥३॥

धूल के प्रत्येक कण से घोष उठता है महा।
आपका पद-स्पर्श पाया देह धन्य हुई महा।
चरण की गति हो अखण्डित और बढ़ती रहे ॥४॥....

जब हम दूसरों द्वारा किए गए, अपमान और अपशब्द को अपने दिल में जगह देते हैं। जीवन में कुछ चीजों को जाने दिया करो। सब चीजों को मन मैं गांठ बनाकर रखने को आदत हो मानव जीवन में दुख और अशांति का, कारण है।

वास्तव में किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपमान के विरुद्ध प्रतिशोध का भाव हमारे उत्थान की राह को अवरुद्ध करता है। बदले के भाव से हम विचारों के एक ऐसे जाल में फंस जाते हैं, जो मन को शांति को छीन लेता है, हम तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं। प्रतिशोध की अग्नि में हम अपनी हथेलियों में जलते अंगारों को लेकर जीना शुरू कर देते हैं।

लिहाजा जीवन में जब तिरस्कृत होने की परिस्थिति आए तो मन को मजबूत करने की आवश्यकता है। अनादर और अपशब्द से खुद को सुरक्षित रखने की जरूरत है। वैसे ऐसा करना सहज तो नहीं है, लेकिन जब इसके कारण जीवन ही दांव पर लगा हो तो मन को कठोर रखने और विषाक्त बातों को छोड़ या भूला देने में ही जीवन की खुशी का रहस्य छुपा है।

आइए अंतिम व्यक्तियोदय हेतु स्व. पंडित दीन दयाल जी की जयंती पर संकल्पित हो!

महान् एकता की अनुभूति... मातृभूमि के पुत्र हम, हृदय हमारा मीत,रग-रग में बहती रहे, पावन देशभक्ति की प्रीत।मक्खन जैसा कोमल...
09/09/2026

महान् एकता की अनुभूति...

मातृभूमि के पुत्र हम, हृदय हमारा मीत,
रग-रग में बहती रहे, पावन देशभक्ति की प्रीत।
मक्खन जैसा कोमल मन, पर वज्र जैसी है शान,
देश की रक्षा में अर्पित, कर देंगे हम प्राण।
ऊंच-नीच का भेद मिटाकर, सबको गले लगाएंगे,
अपने पावन विचारों से, नवयुग नया लाएंगे।
सत्य, अहिंसा और प्रेम का, जग में गूंजेगा संगीत,
सच्चे सपूत बनकर जीतेंगे, हर मानव का मन-मीत।
मातृभूमि की सेवा ही, सबसे बड़ा हमारा धर्म,
सदा करेंगे जग में हम, बस परोपकार के कर्म।
ज्ञान-ध्यान का दीप जलाकर, हर लें सारा अंधकार,
भारत माँ के चरणों में, अर्पित जीवन का हर तार।...मैथिली शरण गुप्त जी

हमारे भूत और वर्तमान काल का यह ऐसा ही चित्र है। यह दृश्य देखकर स्वाभाविक ही इस भूमि के प्रत्येक पुत्र को उमंग आना चाहिये कि अति प्राचीन सामाजिक एकात्मकता को अतीव शुद्धावस्था में पुनरुज्जीवित किया जाय । हमारा सम्पूर्ण समाज साक्षात् ईश्वर के रूप में हमारे हृदयों में पुनः प्रतिष्ठित होना चाहिये । वास्तव में यही एकत्व की भावना हमारी प्राचीन संस्कृति का अमर सन्देश रही है। संसार के अन्य लोग ईश्वर के पितृत्व एवं मनुष्य के भ्रातृत्व तक पहुंचकर रुक गये हैं किन्तु हम बहुत आगे तक बढ़ चुके हैं। हमने तो ब्रह्म से लेकर जड़ पदार्थ पर्यन्त एकत्व का अनुभव किया है।

अतः हम वह शुद्ध एकत्व की भावना पुनरुज्जीवित करें जिसका प्रादुर्भाव इस अनुभूति के द्वारा होता है कि हम सभी इस महान् पवित्र जन्मभूमि भारत माता के पुत्र हैं। हम उन विविध असंगत स्वरों को रोक दें जो जान या अनजान में उठ रहे हैं और जिनके द्वारा हममें विच्छेद एवं भ्रान्ति उत्पन्न होती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की  शुभकामनाएं पाप से सद्धर्म छिप जाता जगत में जब कभीईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभीधर्म-रक्षा ...
04/09/2026

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं

पाप से सद्धर्म छिप जाता जगत में जब कभी
ईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभी

धर्म-रक्षा हेतु करके दुर्जनों का सर्वनाश
दूर कर संसार का तम सत्य का करता विकाश

इस तरह अवतार लेता विश्व में विश्वेश है
शेष रहता फिर कहाँ आपत्ति का लवलेश है। .......
कृष्ण का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, भीतर की संभावना भी है। जिस तरह देवकी और वसुदेव के बंधन कृष्ण के जन्म के साथ खुल गए, उसी तरह जब भीतर कृष्ण चेतना का जन्म होता है, तब मोह. भय, क्रोध और अहंकार के बंधन डोले पड़ने लगते है। सदूरु की कृपा, सत्संग और साधना से जब भीतर कृष्ण चेतना का प्रस्फुटन होता है. तभी वास्तविक जन्माष्टमी परती है।

भगवान कृष्ण की नेतृत्व और प्रबंधन की सीख आज भी पहले जितनी ही प्रासंगिक है। निष्पक्षता. कर्तव्य, संवाद, लचीलापन और दूरदृष्टि जैसे उनके सिद्धांत आज के जटिल संघों को सुलझाने में मदद कर सकते हैं। भारतीय दर्शन और कूटनीति दुनिया में शांति का रास्ता दिखा सकती है. बशर्ते इन्हें व्यवहार में उतारने की इच्छाशक्ति हो। आज की अशांत दुनिया में कृष्ण का संदेश यही सिखाता है कि स्थायी जीत का रास्ता शांति, न्याय और संवाद से होकर जाता है।

एकात्म मानवदर्शनकेवल भौतिक साधन से, मानव का कल्याण नहीं,अर्थ और काम ही केवल, जीवन का प्रतिमान नहीं।धर्म, अर्थ, काम और मो...
03/09/2026

एकात्म मानवदर्शन

केवल भौतिक साधन से, मानव का कल्याण नहीं,
अर्थ और काम ही केवल, जीवन का प्रतिमान नहीं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का, सुंदर एक समन्वय हो,
अंत्योदय से उदय जगत का, ऐसा पावन समय हो।
व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी, चारों का मेल रहे,
शोषण और संघर्ष मिटे, बस प्रेम का पावन खेल रहे।
अंतिम छोर पर खड़ा जो मानव, पहले उसका मान करें,
दीनदयाल के इस दर्शन का, आओ हम सम्मान करें।...

भारत की सनातन परंपरा ने तर्क, अनुभव व प्रयोग- तीनों कसौटियों पर परखकर इस प्रश्न का उत्तर दिया है। संपूर्ण अस्तित्व की एकता व जीवन की समग्रता के सत्य को जानना और उसको निरंतर मन, वचन, कर्म में प्रतिष्ठित करके, जीवन की सारी व्यवस्थाओं व शैलियों को उस सत्य पर ही अधिष्ठित करके विकसित करने से सभी को अमिश्रित, संपूर्ण व शाश्वत सुख की प्राप्ति होना संभव है। इस दृष्टि पर आधारित जीवन व्यवस्था से उत्पन्न सर्वसंपन्न, स्थिर व शांतिपूर्ण, सामूहिक जीवन हमने पूर्व काल में युगों तक चलाकर दिखाया है। परंतु वर्तमान जगत् को उसी दृष्टि के आधार पर नई राह दिखलानी है तो उस सनातन दृष्टि की युगानुकूल परिभाषा क्या होगी? विज्ञान व तकनीकी की प्रगति संपन्न आधुनिक अवस्था में, उस एकात्म व समग्र दृष्टि की दिशा क्या होगी? व्यवस्था कैसी बनेगी? मनुष्य के जीवन की सुसंगतता व सामंजस्य मानव समूह तथा सृष्टि के साथ कैसे स्थापित होगा और जीवन से दुख, अभाव, शोषण व विषमता को हटाकर सुख, समृद्धि, सामरस्य व सेवा भाव लाने वाली नीतियाँ क्या होंगी? इन सारे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास है- एकात्म मानवदर्शन !

"सिर्फ श्लोक नहीं है वंदे मातरम"सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं। इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे, पिघले हुए अनल क...
21/08/2026

"सिर्फ श्लोक नहीं है वंदे मातरम"

सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;
फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ। ....दिनकर जी

वंदे मातरम केवल श्लोक मात्र नहीं, बल्कि वह महामंत्र है, जिसने सदियों से बिखरी हुई जनता को एकता के सुदृढ़ और अभेद्य सूत्र में बांधा।
वंदे मातरम केवल छह अक्षरों या दो शब्दों का साधारण ध्वनि-समूह अथवा गीतिमय श्लोक मात्र नहीं, अपितु समस्त भारतवर्ष की आत्मा, उसकी सुप्त राष्ट्रीय चेतना व हमारी अस्मिता को जगाने वाला दिव्य महामंत्र है, जिसकी गूंज से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल उठी। जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने अमर उपन्यास आनंदमठ में इस पावन श्लोक की रचना की थी, तब शायद किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यही शब्द भारत माता के करोड़ों बंदियों और पददलित पुत्रों के कंठ का एकमात्र स्वर तथा स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान शक्ति बन जाएंगे। जब हम पूर्ण भक्ति भाव से 'वंदे मातरम' का उच्चारण करते हैं, तब केवल अपनी इस मिट्टी को नमन ही नहीं कर रहे होते,, बल्कि अपनी पौराणिक संस्कृति, भव्य इतिहास, गौरवशाली परंपराओं और उस भारत माता का प्रत्यक्ष आह्वान कर रहे होते हैं, जो अपनी संतानों से धर्म, सत्य और स्वतंत्रता की रक्षा हेतु सर्वस्व न्योछावर कर देने का संकल्प मांगती है। स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा का हमारा यह संपूर्ण त्रिमुखी आंदोलन वास्तव में वंदे मातरम के इसी महान और पावन दर्शन पर पूरी तरह आधारित है, क्योंकि यदि मन में मातृभूमि के प्रति ऐसा अगाध और निस्वार्थ प्रेम न हो, तो राष्ट्रहित के लिए अपनी स्वार्थ-भावनाओं का त्याग कर पाना कभी संभव ही नहीं हो सकता। इस पवित्र महामंत्र ने देश के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक फैली भाषा, धर्म और जातियों की तमाम कृत्रिम सीमाओं को एक झटके में ध्वस्त कर दिया है तथा सदियों से बिखरी हुई जनता को एकता के सुदृढ़ और अभेद्य सूत्र में पिरो दिया है।

वंदे मातरम् आज भी विकसित भारत 2047 के हमारे संकल्प को प्रेरणा दे रहा है। यह भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक है। अब इस भावना को आत्मनिर्भर और श्रेष्ठ भारत में परिवर्तित करना हमारी जिम्मेदारी है। वंदे मातरम् स्वतंत्रता का गीत है, अटूट संकल्प की भावना है और भारत के जागरण का प्रथम मंत्र है।

राष्ट्र के आत्मा से जन्मे शब्द कभी समाप्त नहीं होते, वे सदैव जीवित रहते हैं, पीढ़ियों तक गूंजते रहते हैं। यह जयघोष युगों और पीढ़ियों में अनंत काल तक प्रतिध्वनित होता रहेगा। समय आ गया है कि हम अपने समृद्ध इतिहास, अपनी संस्कृति, अपनी मान्यताओं और अपनी परंपराओं को भारतीयता की दृष्टि से देखें!

स्वतंत्रता अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भीले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार करकेसरी बाना सजायें वीर का श्रृंगार कर ॥डर नह...
18/08/2026

स्वतंत्रता अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी

ले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार कर
केसरी बाना सजायें वीर का श्रृंगार कर ॥

डर नही तूफ़ान बादल का अँधेरी रात का
डर नही है धूर्त दुनिया के कपट के घात का
नयन में ध्रुव ध्येय के अनुरूप ही दृढ़ भाव भर ॥

है भरा मन में तपस्वी मुनिवरों का त्याग है
और हृदयों में हमारे वीरता की आग है
हाथ है उद्योग में रत राष्ट्र सेवा धार कर ॥

सिन्धु से आसाम तक योगी शिला से मानसर
गूंजते हैं विश्व जननी प्रार्थना के उच्च स्वर
सुप्त भावों को जगा उत्साह का संचार कर ॥

स्वार्थ का लवलेश सत्ता की हमें चिंता नही
प्रान्त भाषा वर्ग का कटु भेद भी छूता नही
एक हैं हम एक आशा योजना साकार कर ॥

शपथ लेकर पूर्वजों की आशा हम पूरी करें
मस्त हो कर कार्य रत हो ध्येयमय जीवन धरें
दे रहे युग की चुनौती आज हम ललकार कर ॥.....

स्वतंत्रता अपने साथ केवल अधिकार नहीं बल्कि उतने ही बड़े उत्तरदायित्व भी लेकर आती है। भारत की स्वतंत्रता केवल एक राष्ट्र को मुक्ति नहीं दुनियाभर के उत्पीडित और वंचित लोगों के लिए आशा का प्रतीक है। लेकिन काम अभी समाप्त नहीं हुआ है. यह तो केवल शुरुआत है। क्योंकि किसी राष्ट्र की कक्षा केवल उसको एकतिक उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सामान्य नागरिक को कितना सन्धान, प्यार, रीति और बुद्धि देता है। भारत की प्रगति का सही अर्थ भी तब सामने आएगा जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति अपने जीवन में स्वतंत्रता के लाभ को महसूस कर सके। हये देखना होगा कि आम भारतीय बौद्धिक, राजनीतिक, साहित्यिक और कलात्मक जीवन में कितना आगे बढ़ रहा है! किसी देश का भविष्य उसके करोड़ों सामान्य नागरिक, विचारकों के विचारों, कर्मों और सपनों से ही निर्मित होता है।

मातृभूमि हेतु जिस देश के नागरिक सुख-दुख को सहन करने की क्षमता से परिपूर्ण होते हैं वह राष्ट्र सदैव स्वावलंबन के पथ अग्रसर होता रहता है। आलस्य, प्रमाद, पुरुषार्थ हीनता पराधीनता के प्रतीक हैं। वीरता, कार्य कुशलता, आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान में अनुरक्ति तथा सदैव निःस्वार्थ भावना से समाज के परोपकार हेतु तत्पर रहना-इन सभी दिव्य गुणों में ही राष्ट्र की स्वाधीनता कां स्वर्णिम संदेश निहित है।

जिस राष्ट्र के चरित्र में ये दिव्य गुण समाहित होते हैं वही राष्ट्र अपनी स्वर्णिम स्वाधीनता को स्थायीत्व प्रदान कर सकता है.

*स्वतंत्रता दिवस की मंगल कामनाएँ* हमने आँखे खोलकर, जब देखा आकाश।आजादी के हैं मिले, खिलते हुए पलाश।हम किस्मत के हैं धनी, ...
15/08/2026

*स्वतंत्रता दिवस की मंगल कामनाएँ*

हमने आँखे खोलकर, जब देखा आकाश।
आजादी के हैं मिले, खिलते हुए पलाश।
हम किस्मत के हैं धनी, देश मिला आजाद।
बाहों में संकल्प हैं, सपने हैं आबाद।
नये पखेरू देश के, ऐसी भरें उड़ान।
दुनिया बोले देखकर, जय–जय हिंदुस्तान। ....चौ.मदन मोहन समर साहब

हमारा कर्तव्य, हमारा लक्ष्य केवल भारत के ही सच्चे राष्ट्रीय पुनरुत्थान का एक कार्यक्रम नहीं है, अपितु संसार की एकता एव मानव-कल्याण के स्वप्न को चरितार्थ करने की अनिवार्य पूर्व भूमिका भी है। जैसा कि हम देख चुके हैं, ससार की एकता का सपादन करनेवाला यह केवल हिदुओं का ही महान विचार है, जो मानव भ्रातृत्व के लिए स्थायी आधार प्रदान कर सकता है। अंतरात्मा का यह ज्ञान मनुष्य मात्र के सुख के लिए परिश्रम करने की दिव्य प्रेरणा से मानव-मस्तिष्क को प्रेरित करते हुए भूतल की प्रत्येक छोटी से छोटी जीवन-विशिष्टता को अपनी पूर्ण क्षमता- पर्यंत विकास के लिए पूर्ण एव स्वतंत्र अवसर प्रदान करेगा।

ले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार करकेसरी बाना सजायें वीर का श्रृंगार कर ॥डर नही तूफ़ान बादल का अँधेरी रात काडर नही ...
11/08/2026

ले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार कर
केसरी बाना सजायें वीर का श्रृंगार कर ॥

डर नही तूफ़ान बादल का अँधेरी रात का
डर नही है धूर्त दुनिया के कपट के घात का
नयन में ध्रुव ध्येय के अनुरूप ही दृढ़ भाव भर ॥

है भरा मन में तपस्वी मुनिवरों का त्याग है
और हृदयों में हमारे वीरता की आग है
हाथ है उद्योग में रत राष्ट्र सेवा धार कर ॥

सिन्धु से आसाम तक योगी शिला से मानसर
गूंजते हैं विश्व जननी प्रार्थना के उच्च स्वर
सुप्त भावों को जगा उत्साह का संचार कर ॥

स्वार्थ का लवलेश सत्ता की हमें चिंता नही
प्रान्त भाषा वर्ग का कटु भेद भी छूता नही
एक हैं हम एक आशा योजना साकार कर ॥

शपथ लेकर पूर्वजों की आशा हम पूरी करें
मस्त हो कर कार्य रत हो ध्येयमय जीवन धरें
दे रहे युग की चुनौती आज हम ललकार कर ॥

हमारा कर्तव्य, हमारा लक्ष्य केवल भारत के ही सच्चे राष्ट्रीय पुनरुत्थान का एक कार्यक्रम नहीं है, अपितु ससार की एकता एव मानव-कल्याण के स्वप्न को चरितार्थ करने की अनिवार्य पूर्व भूमिका भी है। जैसा कि हम देख चुके हैं, ससार की एकता का सपादन करनेवाला यह केवल हिदुओं का ही महान विचार है, जो मानव भ्रातृत्व के लिए स्थायी आधार प्रदान कर सकता है। अतरात्मा का यह ज्ञान मनुष्य मात्र के सुख के लिए परिश्रम करने की दिव्य प्रेरणा से मानव-मस्तिष्क को प्रेरित करते हुए भूतल की प्रत्येक छोटी से छोटी जीवन-विशिष्टता को अपनी पूर्ण क्षमता-पर्यत विकास के लिए पूर्ण एव स्वतत्र अवसर प्रदान करेगा।

यह ज्ञान केवल हिदुओं के ही पास सुरक्षित है। हम कह सकते हैं कि यह देवी धरोहर है, जिसका भार नियति ने हिदुओं को सौंप रखा है। जब किसी व्यक्ति के पास कोई अमूल्य निधि होती है तो उसकी रक्षा कर दूसरों के कल्याण के लिए उसे उपलब्ध बनाए रखना उसका कर्तव्य हो जाता है। यदि व्यक्ति अपने इस परम कर्तव्य के पालन में असफल होता है तो वह अपना ही नहीं, दूसरों का भी विनाश करता है। अतएव हिदू-समाज को स्वस्थ दशा में सुरक्षित रखने के पवित्र कर्तव्य का दायित्व हम पर है।

गति प्रबल पैरों में भरी फिर क्यों रहूं दर- दर खड़ा जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पडा जब तक न मंजिल पा सकूँ, तब तक मुझे...
04/06/2026

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर- दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है। .....शिवमंगल सिंह सुमन जी

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु निराशा नहीं है। वास्तविक खतरा तो तब पैदा होता है जब हम अपनी सम्भावनाओं को भूलने लगते हैं। निराशा एक बादल की तरह होती है; वह आती है और कुछ समय के लिए आकाश को ढक लेती है और फिर छंट जाती है। लेकिन यदि हम यही मान बैठें कि आकाश का कोई अस्तित्व ही नहीं तब समस्या गंभीर हो जाती है। जब मनुष्य अपनी क्षमताओं, रचनात्मक शक्ति और अपने भीतर छिपी सम्भावनाओं को भूल जाता है तब वह अपने जीवन की क्षितिज को सीमित कर देता है।
एक बीज कभी हथेली पर रखकर देखे तो लगता है कि वह कुछ नहीं लेकिन इसी छोटे से बीज में एक विशाल वृक्ष छिपा होता है। वृक्ष पहले से ही उसमें मौजूद है केवल प्रकट होना बाकी है। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है; उसके भीतर साहस, करुणा, बुद्धि, कल्पना और प्रेम की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

निराशा का अंधेरा हमारी सम्भावनाओं के सूर्य को कभी अस्त नहीं कर सकता। असफलताएं, कठिनाइयाँ और बाधाएं परीक्षा हैं पहचान नहीं। जो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखता है वह हर फिसलन को नई उड़ान बना लेता है।

अंतर्मन में भरी हो ऊर्जा, नई शक्ति का हो संचार,
डटकर, चुनौतियों से लड़कर, जीतेंगे सारा संसार।

लें संकल्प सृजन का मन में, उम्मीदों से हो भरपूर,
धुन के पक्के उस राही से, मंज़िल है फिर कितनी दूर।

जगें ज्ञान और प्रेम धरा पर, गूंजे कुछ ऐसा सन्देश,
नई चेतना से जागृत हो, सुप्त पड़ा यह मेरा देश।......निशांत जैन जी

जीत संकल्प कीबन्द पलकों के पीछेचमकता उम्मीद का जुगनू। एक अलसाये ख्वाब की अंगड़ाई,जागती आँखों से बुनेइसी सपने के हाथ पैर।...
26/05/2026

जीत संकल्प की

बन्द पलकों के पीछे
चमकता उम्मीद
का जुगनू।
एक अलसाये
ख्वाब की अंगड़ाई,
जागती आँखों से बुने
इसी सपने के हाथ पैर।
हौसले की आग में
तपा संकल्प का सोना
और मिल गई मंजिल।

कोई कोमल विचार
कही किसी मोड़
पर उगा एक इरादा;
सोच समझ कर
की गई मेहनत
हर मुश्किल छटती है तब;
निगाह के येन सामने
खिल उठता है
कामयाबी का सबेरा।

दृढ़ इच्छा शक्ति
लग्न सकारात्मकता
और सच्चाई की ताकत
इनसे मिलकर कोई
संकल्प, आत्मा में
अखुआता है।
मन मस्तिस्क में
परवान चढ़ता है
स्वप्न शहर से चलकर
यथार्थ धरा पर।
सवार होकर
बदल देता है
जिंदगी के सब नक्श॥ ........

मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी शक्ति उसके भीतर छुपी हुई वह अदृश्य ऊर्जा है, जिसे हम आत्मविश्वास, सकारात्मक दृष्टि एवं दृढ संकल्प के रूप में पहचानते हैं। सफलता कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि विचारों, प्रयासों और विश्वास की सतत यात्रा का परिणाम होती है। जब व्यक्ति भय, और संदेह के बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ता है, तभी वह अपनी वास्तविक सामर्थ्य को पहचान पाता है। हमारे जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब परिस्थियाँ हमें डराने लगती हैं और मन में असफलता की आशंका घर कर लेती है। यही भय और संदेह ही हनारे पथ के सबसे बड़े अवरोध बन जाते हैं। जो व्यक्ति इन मानसिक जंजीरों को तोड़ देता है वह अपने भीतर छिपी हुई संभावनाओं के द्वार खोल देता है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बनता जाता है यह केवल एक कथन नहीं जीवन का शाश्वत सत्य है। यदि हमारे विचार कमजोर और नकारात्मक होंगे, तो हमारे कर्म भी उसी दिशा में ढल जायेंगे, परन्तु यदि हमारे भीतर आशा, साहस, और श्रेष्ठ लक्ष्य की भावना होगी तो हमारी दिशा स्वतः की उज्जवल हो जाएगी।

सकारत्मक दृष्टिकोण जीवन का वह प्रकाश है जो अंधकारमय परिस्थितियों में भी मार्ग दिखाता है। जब हम हर परिस्थिति में अच्छाई खोजने का प्रयास करते है तब हमारे भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है वह ऊर्जा हमें गिरकर भी उठने का साहस और बार-बार प्रयास करने की प्रेरणा प्रदान करती है। दृढ संकल्प वह शक्ति है जो हमारे सपनो को वास्तविकता में बदलती है। केवल बड़े सपने देखना पर्याप्त नहीं, उसे पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास और अटूट आस्था आवश्यक है। जब हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं तो हमारी आंतरिक शक्ति हमें हर चुनौती से लड़ने का साहस देती है। यही आंतरिक शक्ति हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है जब मन, विचार और कर्म एक दिशा में संगठित हो जाते हैं तब सफलता हमारे कदम अवश्य चूमती है।
संकल्प वह अटूट मानसिक शक्ति है, जो किसी भी साधारण मनुष्य को असाधारण बना सकती है। यह केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया गया आंतरिक प्रण है, जिसके बिना कोई भी कार्य या साधना पूर्ण नहीं हो सकती।

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