सीजफायर का निर्णय: भारत की साख और सेना के मनोबल पर असर
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"बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की" — यह पुरानी कहावत आज भारत की वैश्विक साख पर सटीक बैठती है। हाल के घटनाक्रमों ने देश के भीतर और विश्व मंच पर भारत की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है। विपक्षी दलों से लेकर आम जनता तक, सभी ने सरकार के युद्ध के संकेतों का दिल से समर्थन किया था। पूरा देश एकजुट था, और भारतीय सेना का शौर्य व जोश चरम पर था। सेना, अपने अनुशासन और बलिदान के लिए विश्वविख्यात, हर चुनौती के लिए तैयार थी। लेकिन अचानक डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश ने सब कुछ बदल दिया। यह विदेशी हस्तक्षेप न केवल अपमानजनक था, बल्कि उस गौरवशाली साख को भी धूमिल कर गया, जिसे भारत ने वर्षों की मेहनत और कूटनीतिक कुशलता से अर्जित किया था।
युद्ध या सीजफायर का निर्णय सरकार के हाथ में होता है, मगर जब सेना युद्ध के लिए पूर्ण रूप से तत्पर हो, तो सवाल उठता है: क्या सेना सीजफायर के निर्णय से सहमत थी, या उसे उकसाकर उसके उत्साह को कम करने का प्रयास हुआ? क्या इस फैसले ने सेना के मन में सरकार की निर्णय क्षमता पर संदेह पैदा किया? यदि सेना का सरकार पर विश्वास डगमगाता है, तो क्या भविष्य में सरकारी निर्देशों के पालन में उसकी तत्परता प्रभावित होगी? एक सैनिक का अपने सैन्य तंत्र और नेतृत्व पर अटूट भरोसा होता है। यदि यह भरोसा कमजोर होता है, तो क्या सैन्य तंत्र सरकार के निर्देशों को पूर्ण निष्ठा से लागू करेगा, या अपने विवेक से निर्णय लेगा? जल्दबाजी में लिया गया यह निर्णय क्या एक ऐसी भूल साबित होगा, जिसका जोखिम भारत को वैश्विक मंच पर उठाना पड़े?
विश्व समुदाय देख रहा है कि भारत के महत्वपूर्ण फैसले अब कोई विदेशी नेता ले रहा है, जो भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़े करता है। यदि सेना और सरकार के बीच विश्वास की डोर कमजोर पड़ती है, तो इसका असर भारत के वैश्विक संबंधों पर पड़ सकता है। क्या इस फैसले का जोखिम यह होगा कि भारत के सहयोगी देश उसकी रणनीतिक दृढ़ता पर संदेह करें? ऐसे कदमों का भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। वह प्रतिष्ठा, जो भारत ने आर्थिक प्रगति, सैन्य शक्ति और वैश्विक कूटनीति से हासिल की, अब संकट के कगार पर खड़ी है। यह सवाल हर भारतीय के मन में कौंध रहा है कि क्या यह भूल भारत की वैश्विक छवि को और कमजोर करेगी?
7 मई को पाकिस्तान की सीजफायर अपील एक सुनहरा अवसर था। यदि भारत ने अपनी शर्तों पर इसे स्वीकार किया होता, तो वह क्षेत्रीय शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और वैश्विक मंच पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करता। सैन्य शक्ति और कूटनीतिक चतुराई से पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया जा सकता था। आतंकी ठिकानों पर सटीक कार्रवाई के बाद सीजफायर की घोषणा से भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी दृढ़ता और शांति के प्रति तत्परता साबित करता। भारत मांग कर सकता था कि पाकिस्तान आतंकी फैक्ट्रियों की सूची सौंपे, उन्हें नष्ट करने की समय-सीमा तय करे, और विश्व मीडिया में भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को रोकने का ऐलान करे। ऐसी शर्तों के साथ सीजफायर से भारत पाकिस्तान को बेनकाब करता और अपनी वैश्विक स्थिति को सशक्त करता। लेकिन क्या यह अवसर विदेशी दबाव के आगे झुकने की जल्दबाजी में गंवाया गया?
आज भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की आवश्यकता है। सैन्य और कूटनीतिक ताकत का उपयोग ऐसा हो जो सीमाओं की रक्षा करे और वैश्विक मंच पर भारत का गौरव बढ़ाए। नीतियों में स्पष्टता और फैसलों में अटल संकल्प के साथ विश्व को यह संदेश देना होगा कि भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय व वैश्विक शांति में सशक्त योगदान दे सकता है। सेना का मनोबल ऊंचा रखना और जनता का भरोसा अटल रखना अनिवार्य है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सेना और शासन के बीच विश्वास का सेतु कभी कमजोर न पड़े, क्योंकि इसका जोखिम भारत की रणनीतिक एकता और वैश्विक संबंधों पर गहरा असर डाल सकता है। यही मार्ग हमारी खोई साख को पुनः प्राप्त कराएगा और जनता, सेना व नेतृत्व की एकजुटता को और सशक्त बनाएगा।
✍️सौरभ झा
Saurabh Jha
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27/12/2024
कबीरा जब हम पैदा हुए,
जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो,
हम हँसे जग रोये !
अलविदा मनमोहन सिंह जी !
27/10/2024
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) की राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय रेणु जोगी जी को जन्मदिन पर सादर प्रणाम! ईश्वर से प्रार्थना करता हूं आपको हमेशा स्वस्थ्य रखें, दीर्घायु रखें ताकि हमें आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमेशा प्राप्त होता रहे!
11/10/2024
बलौदा बाजार घटना मामले में अमित जोगी जी की टीम सभी पीड़ित परिवार से मुलाकात कर रही है।
अमित जी ने कल बलौदा बाजार जेल में जाकर पीड़ितों से मुलाकात करते हुए उनकी समस्याएं और घटना के दिन की सारी जानकारियां इकट्ठा की।
पीड़ितों के वकीलों को बुलाकर उनसे भी बात किया और केस के संदर्भ में जरूरी दिशा निर्देश भी दिया।
अमित जोगी जी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात करते हुए बताया कि निर्दोषों को न्याय दिलाने के लिए खुद कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होंगे यानी कानूनी लड़ाई भी खुद लड़ेंगे।
Amit Jogi
25/09/2024
*कबीरधाम से क्राईम, करप्शन और कम्युनल-धाम बनने तक का सफर: आर.एस.एस. की साम्प्रदायिक्ता की प्रयोगशाला की शारीरिकी (Anatomy)*
मेरे पिता जी, छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्य मंत्री और छत्तीसगढ़ के प्रथम और एकमात्र क्षेत्रीय दल जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के संस्थापक स्वर्गीय श्री अजीत जोगी ने कबीरपंथियों के गुरु श्रद्धेय प्रकाश मुनि नान साहेब के अनुरोध पर 2001 में कवर्धा जिला का नाम कबीरधाम जिला रखा।सद्गुरू कबीर साहेब के सपने साकार हों, इसलिए उन्होंने 2002 में 11 महीनों के रिकॉर्ड समय सीमा में राम्हेपुर में छत्तीसगढ़ का प्रथम शक्कर कारखाना बनाया, जिसके परिणामस्वरूप विगत 22 वर्षों में इस जिले के किसानों के जीवनस्तर (वार्षिक आय) में औसतन 10 गुना फायदा हो चुका है।
2003 और 2008 के विधान सभा चुनाव और 2009 के लोक सभा उपचुनाव में कबीरधाम जिला के मतदाताओं का जोगी जी के प्रति अपार स्नेह के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री ने परिसीमन के दौरान अपने गृह जिला कबीरधाम की चार सीटों (कवर्धा, लोरमी-पंडरिया; वीरेंद्रनगर का गंडई और रेंगाखार क्षेत्र और मुंगेली का कुंडा क्षेत्र) में परिवर्तन करके उसे केवल दो सीटों तक सीमित कर दिया और मुख्यमंत्री रहते हुए, अपना गृह जिला कबीरधाम छोड़कर खुद पड़ोसी जिले राजनांदगाँव के डोंगरगांव विधान सभा से 2004 का उपचुनाव और 2008 में राजनांदगाँव विधान सभा का चुनाव लड़ने के लिए विवश हो गए थे।
स्वर्गीय श्री अजीत जोगी जी के प्रति कबीरधाम जिले के आम नागरिकों के इस आत्मीय लगाव को ध्यान में रखते हुए, 2003 के बाद लगातार मुख्यमंत्री (2003-18), मंत्री (2018-23) और उपमुख्यमंत्री (2023 से)- के विगत 21 वर्षों के कार्यकाल में इस जिले की विकास-दर में न केवल भारी पतन हुआ है बल्कि कबीरधाम, छत्तीसगढ़ का "क्राईम-धाम" (अपराधों का धाम), "कम्युनल-धाम" (सांप्रदायिकता का धाम) और "करप्शन- धाम" (भ्रष्टाचार का धाम) भी बन चुका है।
कबीरधाम में बढ़ते सांप्रदायिक और सामाजिक अपराध केवल एक नासूर का लक्षण है। मूल कारण तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के द्वारा सद्गुरू कबीर साहेब की इस पवित्र धर्मभूमि को उनकी संकीर्ण साम्प्रदायिकता की अपवित्र प्रयोगशाला बनाना है। इसका सबसे पुख्ता प्रमाण 3 अक्टूबर 2021 की कवर्धा की घटना (“झंडा-दंगा कांड” जिसमें एक झंडे को लेकर हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए) के पहले और उसके बाद की हाई-प्रोफाइल अपराधों की संख्या में लगभग 13 गुना (12.70%) वृद्धि होना है। इसका बखान मैं नहीं बल्कि NCRB के सरकारी आंकड़े कर रहे हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल ने इस बात पर सरकार से आज तक एक भी प्रश्न क्यों नहीं किया?
'वसुधैव कुटुंबकम्' विचारधारा में हज़ारों सालों से आपसी सद्भाव में रहने वाले सवा 3 करोड़ छत्तीसगढ़ियों के बीच में पहली बार आर.एस.एस और उससे जुड़े संगठनों ने 3 अक्टूबर 2021 को कवर्धा शहर में अंततः साम्प्रदायिकता का बीज बोने में सफलता हासिल की, शायद इसलिए क्योंकि यह शहर एक जमाने में 'राम राज्य परिषद' का गढ़ हुआ करता था। पिछले 3 वर्षों में उस बीज ने एक विशाल दानव-रूपी वृक्ष का स्वरूप धारण कर लिया है, जिसका खामियाजा न केवल इस जिले के अल्पसंख्यक-मुस्लिम समुदाय को बल्कि धरमपुरा की 27 नवंबर 2020 की निंदनीय घटना- जिसमें वहाँ के जैतखंब को जला और गुरुद्वारा को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया- के बाद, बाबा गुरु घासीदास के 'मनखे-मनखे एक समान' विचारधारा में आस्था रखने वाले सतनामी समाज को भी लगातार भुगतना पड़ रहा है।
लेकिन असली विडंबना तो यह थी कि ‘गौठान’ और ‘राम वन गमन’ पथ बनाकर खुद को भाजपा से भी अधिक कट्टर हिंदुत्ववादी' दर्शाने के चक्कर में इन 3 में से 2 सालों तक सत्तासीन भूपेश सरकार, इन दोनों समुदायों पर बढ़ते आक्रमण के बावजूद हाथ पर हाथ धरकर, मूक दर्शक बन कर बैठी रही। यही कारण है कि जब अप्रैल 2024 में स्वयं भूपेश बघेल जी इस क्षेत्र से लोक सभा चुनाव लड़ने गए, तो उन्होंने राजनांदगांव के खुद की पार्टी के जिलाध्यक्ष और कवर्धा और पंडरिया के भूतपूर्व विधायक और उनके मंत्रिमंडल के महत्वपूर्ण सदस्य को मात्र इसलिए किनारे कर दिया क्योंकि वे दोनों मुस्लिम धर्म को मानने वाले हैं। यह कदापि बापू, नेहरू और इंदिरा जी की कांग्रेस की विचारधारा नहीं हो सकती।
दिसंबर 2023 में सत्तासीन होने के बाद भाजपा ने सांप्रदायिक्ता की इस प्रयोगशाला से उत्पन्न, कवर्धा से पहली बार चुनाव लड़े व्यक्ति, जिसका दंगे करवाने के अलावा रत्ती भर प्रशासनिक अनुभव नहीं था, को प्रदेश का न केवल उप-मुख्यमंत्री बनाया बल्कि उन्हें गृह मंत्रालय जैसे अति-संवेदनशील विभाग की कमान सौंप कर कबीरधाम के अपने सफल सांप्रदायिक प्रयोग को पूरे प्रदेश में लागू करने के लक्ष्य से विधिवत जवाबदारी सौंप डाली। जहाँ एक तरफ़ उनकी प्रशासनिक अनुभवहीनता और अक्षमता के कारण गृह मंत्री अपने ही गृह क्षेत्र में कानून व्यवस्था बरकरार रख पाने में अभूतपूर्व और अप्रत्याशित रूप से विफल सिद्ध हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनकी दंगा भड़काने में दक्षता के कारण उन्होंने बहुत ही कम समय में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में अभूतपूर्व सफलता हासिल कर ली है।
सांप्रदायिक नफरत की आग अब केवल मुसलमान और सतनामी समाज तक सीमित नही रही बल्कि भाजपा सरकार के पिछले 9 महिनों में छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई समाज, समुदाय या संगठन नहीं बचा जो इसकी चपेट में जल नहीं रहा हो। जब गृह मंत्री अपने ही विधान सभा क्षेत्र में अपने प्रमुख विरोधी दल के लोगों को अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ता को सरेआम जिंदा जला देने से नहीं रोक पाए, तो भला कौन भाजपाई छत्तीसगढ़ में सुरक्षित हो सकता है?
4 माह पहले इस आग के कारण कुछ मुस्लिम युवकों पर स्वर्गीय कन्हैया यादव की तथाकथित हत्या का आरोप लगाया गया और माननीय सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में दिए निर्देशों के विपरीत, जिस प्रकार भूपेश सरकार ने धरमपुरा में सतनामी समाज के गुरूद्वारे पर बुल्डोजर चलवाया था, ठीक उसी प्रकार प्रदेश की भाजपा सरकार ने उपरोक्त मुस्लिम आरोपियों के घरों पर बुल्डोजर चला दिया। इसी क्रम में 3 माह पहले स्वर्गीय कोमल साहू की बेहद संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु हुई, जिसको पहले तो सरकार ने आत्महत्या बताकर लीपापोती करने की पूरी कोशिश की, परन्तु जनता के बढ़ते दबाव के कारण एस.आई.टी. के गठन की घोषणा की। आज तक एस.आई.टी. ने इस मामले में कोई भी कार्यवाही नहीं की है। लगभग 7 दिन पहले कोमल साहू घटना की पुनरावृति हुई जब इसी समाज के स्वर्गीय शिवप्रसाद साहू की भी बेहद संदेहास्पद परिस्थिति में लाश मिली। इसको भी सरकार ने आत्महत्या बताकर लीपापोती करने का भरपूर प्रयास किया, जिसके विरोध में कुछ लोगों ने सरपंच के घर में आग लगा दी और उनके पति स्वर्गीय रघुनाथ साहू को जिंदा जला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैधानिक करार दिए ‘सलवा जुडुम’ की तर्ज पर दंतेवाड़ा में पुलिस बल के माध्यम से 'लोन वर्रटू' (जबरिया फर्जी तरीके से पैसे और नौकरी देने की शर्त पर तथाकथित नक्सलियों की घर वापसी) अभियान चलाने वाले पूर्व एस.पी., जो कबीरधाम जिले के तत्कालीन एस.पी. पदस्थ थे, ने शायद वहाँ के नक्सलियों से सीख लेते हुए पूरे गांव के सामने एक क्रूर 'कैंगरू-कोर्ट' (गैर-कानूनी जन-अदालत) का आयोजन किया और खुद ही 'जज, जूरी और जल्लाद' बन बैठेः जज की हैसियत से दो नाबालिग लड़कियों की बेरहमी से पिटाई करवाई, उनकी इज्जत की खुलेआम धज्जियां उड़ाई, स्वर्गीय प्रशांत साहू को दोषी करार दिया और उनकी माँ के कपड़े तक उतरवाए; खुद ही जूरी बनकर प्रशांत साहू को व जेल की सलाखों के पीछे बंद करवा दिया; और खुद ही जल्लाद बनकर उनकी जेल में हत्या भी करवा दी।
नक्सलियों और उपमुख्यमंत्री और उनके एस.पी. (पुलिस अधीक्षक) के 'कैंगरू-कोर्ट' में केवल दो अंतर मुझे नज़र आते हैं। पहला, जहाँ एक तरफ़ नक्सली दूरस्थ दुर्गम जंगलों में छुपकर, रात के अंधेरे में ग्रामीणों की हत्या करवाते हैं; वहीं दूसरी तरफ माननीय उपमुख्यमंत्री के इशारों पर मौत का यह तांडव छत्तीसगढ़ की धर्म नगरी कबीरधाम के हृदयस्थली में खुलेआम खेला जा रहा है। दूसरा, दिसंबर 2023 के पहले जहाँ साम्प्रदायिकता की यह आग मुस्लिम और सतनामी समाज तक सीमित दिखती थी, वहीं दिसंबर 2023 के बाद भाजपा के राज में अब यादव और साहू समाज जैसे पिछड़ा वर्ग के लोग भी इस आग की चपेट में सरेआम जलने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कबीरधाम आज जल रहा है और उपमुख्यमंत्री, रोम साम्राज्य के सम्राट नीरो की तरह, बांसुरी बजा रहे हैं!
दक्ष प्रश्न है कि इतना सब कुछ कबीरधाम में ही क्यों हो रहा है? क्या सांप्रदायिकता की इस प्रयोगशाला में अब भी कुछ काम बाक़ी है? इसका उत्तर एक ही है: आर.एस.एस का उद्देश्य हिंदू को एक संकीर्ण परिभाषा में कैद करना है- वीर सावरकर के शब्दों में कहें तो वही हिंदू कहलाने का अधिकार रखता है जिसकी मातृभूमि और धर्मभूमि 'अखंड भारत' में है- ताकि भारत, जिसमें सहस्त्राब्दियों से "आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:"- ऋग्वेद 1-89-1: के आधार पर सम्पूर्ण मानवता के लोगों के गुणों को भारतीय समाज और संस्कृति में समाहित करने की ऋग्वेद के प्रथम उच्चारण से निरंतर परंपरा चली आ रही है- को विशुद्ध रूप से एक "हिंदुत्ववादी राष्ट्र" में परिवर्तित किया जा सके। सावरकर की इसी विचारधारा को अपनाते हुए आर.एस.एस के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवालकर ने, महात्मा गांधी ही हत्या के बाद लिखी एक पुस्तक में संघ परिवार का लक्ष्य निर्धारित कर दियाः 'हिंदू समाज में एक संगठन नहीं है बल्कि पूरे समाज का संगठन है'।
यह लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब भारत की बहुविविधता को समाप्त करने के उद्देश्य से सभी धार्मिक और सामाजिक वर्ग- जैसे मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी (जिनकी धर्मभूमि उनकी मातृभूमि नहीं है और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते); जैन, बौद्ध, सिख, सतनामी और कबीरपंथी (जो निर्गुण भगवान के प्रति आस्था रखते हैं और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते), ज्योतिबा फुले, राजा राम मोहन रॉय, पेरियार, राम कृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, सांई बाबा और बाबा साहब अंबेडकर जैसे अनगिनत समाज-सुधारकों के करोड़ों अनुयायी (जो मनुवादी वर्ण-व्यवस्था को विशुद्ध रूप से नकारते हैं और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते); मूल आदिवासी (जो 'हिंदुत्व' द्वारा अपनाए वैष्णव परंपरायें और रीति-रिवाज जैसे शाकाहार का पालन, प्याज-लहसुन और पशु बलि पर प्रतिबंध इत्यादि का अनुसरण नहीं करते); सूफी और भक्ति पंथ के अनुयायी (जिनके लिए हिंदुत्व, इस्लाम या अन्य किसी भी धर्म और पंथ की बंदिशें की जगह एक अद्वैत, निर्गुण और सबके प्रति निःस्वार्थ प्रेम करने वाला सृजक है, जो किसी में फ़र्क़ नहीं करता) को अपनी-अपनी मूल धारणाओं को नकार कर आर.एस.एस के संस्थापकों और अनुयायियों द्वारा हिंदुत्व- जिसे वे हिंदू धर्म का पर्याय समझने की भूल कर रहे हैं- को अपनाना पड़ेगा।
आर.एस.एस और उससे जुड़े संगठनों को लगता है इनमें से किसी भी एक वर्ग को धर्मविरोधी का रूप देकर बाक़ी सबको उनके हिंदुत्व के धागे में पिरोकर एक किया जा सकता है किंतु वे कितना भी प्रयास और परिश्रम कर ले, एक अरब जनसंख्या के ‘अनेकता में एकता’ वाले भारत में 'एक राष्ट्र, एक धर्म, एक नेता' को चरितार्थ करना असंभव है।
छत्तीसगढ़ के एक नागरिक एवं प्रदेश की एक मात्र क्षेत्रीय दल का प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते ये मांग करता हूँ कि
1. बाँसुरी बजाने वाले उपमुख्यमंत्री और कैंगरू कोर्ट लगाने वाले एसपी को तत्काल उनके पद से बर्खास्त किया जाए।
2. सभी पीढ़ित परिवारों को कम से कम ₹१ करोड़ मुआवजा एवं योग्यता अनुसार सरकारी नौकरी दी जाए।
3. उपरोक्त घटनाक्रम के मूल कारणों की जांच, माननीय हाई कोर्ट के एक पदेन जज की अध्यक्षता में सभी प्रभावित समुदायों- विशेषकर मुस्लिम, सतनामी, यादव, साहू, कुर्मी और आदिवासी- के कम से कम एक-एक प्रतिनिधियों को सम्मिलित करके, एक 11-सदस्यों की हाई-पॉवर कमेटी का गठन किया जाए जो 100 दिन के भीतर उपरोक्त बिंदुओं पर अपनी जांच रिर्पोट और सिफारिशें सार्वजनिक करे।
अमित जोगी
लेखक जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के प्रदेश अध्यक्ष हैं। यह उनके निजी विचार हैं।
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