25/11/2025
Jharkhand Mukti Vahini
झारखण्ड मुक्ति वाहिनी एक जन संगठन है.
25/11/2025
04/03/2024
डिमना बांध विस्थापितों के हक के लिए लड़ने वाले साथी दीपक बाबू को जन्म दिन मुबारक।।।
01/01/2024
ऐसी जगह, जहां अंग्रेजी साल के पहले दिन की शुरुआत होती है आंसुओं से, जानें आजाद भारत की सबसे पहली दर्दनाक घटना की अनकही कहानी
देश में एक ऐसी जगह भी है, जहां अंग्रेजी साल के पहले दिन की शुरुआत आंसुओं के साथ होती है। एक जनवरी 1948 को झाड़खंड के खरसावां में हर साल लाखों की संख्या में शहीद स्थल पहुँचते हैं, लेकिन इसका आयोजन किसी पर्व-त्योहार या खुशी के मौके पर नहीं होता, बल्कि यहां लाखों लोगों की भीड़ अपने पूर्वजों को याद करने के लिए जुटती हैं।
खरसावां और सरायकेला रियासत का ओड़िशा में विलय का विरोध
निहत्थे आदिवासियों, महिलाओं और बच्चों को बनाया निशाना
सरायकेला-खरसावां का ओड़िशा में विलय रुका
1 जनवरी 1948 खरसावां गोली कांड.......
खरसावांः अंग्रेजी 01 जनवरी 1948 को जब देश-दुनिया में लोग जश्न मनाते हैं, उस दिन खरसावां अपनों की कुर्बानी के लिए आंसू बहाता है। आज से 76 साल पहले खरसावां गोलीकांड में हजारों बेगुनाह लोगों की जान चली गई थी। खरसावां गोली ने एक बार फिर से जालियांवाला बाग हत्याकांड की याद दिला दी थी।
इस गोलीकांड में हजारों लोगों की खून से खरसावां का हाट मैदान लाल हो गया था। हालांकि आज तक इस गोलीकांड में हुई मौत का सही आंकड़ा नहीं पता चल सका। बताया जाता है कि मारे गए लोगों के शवों को खरसावां हाट मैदान स्थित कुएं, तालाब में भर कर मिट्टी से पाट दिया गया था। इस स्थल को अब शहीद बेदी और हाट मैदान शहीद पार्क से जाना जाता हैं।
खरसावां और सरायकेला रियासत का ओड़िशा में विलय का विरोध
दरअसल 1947 में आजादी के बाद पूरा देश राज्यों के पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था। उस वक्त अनौपचारिक रूप से 14-15 दिसंबर को ही खरसावां और सरायकेला रियासतों का ओड़िशा में विलय का समझौता हो चुका था।
यह फैसला रियासतों के राज परिवार की सहमति से लिया गया। लेकिन आसपास के सैकड़ों गांव के लोग इस फैसले का विरोध कर रहे थे। 1 जनवरी 1948 को यह समझौता लागू होना था। उस वक्त के सबसे बड़े आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा और सैकड़ों समाजसेवी लोगों ने इस फैसले का विरोध किया। खरसावां और सरायकेला के ओड़िसा में विलय के विरोध में जयपाल सिंह ने 1 जनवरी 1948 को ही खरसावां हाट मैदान में जनसभा का आह्वान किया था। वे खुद इस जनसभा में नहीं पहुंचे, लेकिन बड़ी संख्या में कोल्हान समेत कई इलाकों के हजारों की संख्या में लोग पैदल चलकर खरसावां हाट मैदान पहुंच गए थे।
निहत्थे आदिवासियों, महिलाओं और बच्चों को बनाया निशाना
रैली को लेकर पर्याप्त संख्या में पुलिस बल और अर्द्धसैन्य बलों की तैनाती की गई थी। इसी दौरान जनसभा में पहुंचे लोग और सुरक्षा बलों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। इसके बाद वहां पर गोलियां चलाई गई। इसमें पुलिस की गोलियों से हजारों लोगों की जान चली गई। उस वक्त के प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से कर डाली।
सरायकेला-खरसावां का ओड़िशा में विलय रुका
उन दिनों देश की राजनीति में बिहार के कई नेताओं का प्रभाव था। वे भी विलय नहीं चाहते थे। इस घटना के बाद सरायकेला-खरसावां का में विलय रोक दिया। दोनों रियासत क्षेत्र का विलय बिहार में कर दिया गया।
40 हजार लोगों के मारे जाने का जिक्र
खरसावां गोलीकांड में मारे गए लोगों की संख्या के बारे में आधिकारिक रूप से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन पूर्व सांसद और महाराजा पीके देव की किताब ‘मेमोयर ऑफ ए बायगॉन एरा’ में इस घटना में दो हजार लोगों के मारे जाने का जिक्र है। वहीं उस वक्त कोलकाता से प्रकाशित अंग्रेजी अखबार द स्टेट्समैन ने घटना के तीसरे दिन अपने 3 जनवरी के अंक में इस घटना से संबंधित एक खबर छापी, जिसका शीर्षक था- 35 आदिवासी किल्ड इन खरसावां’। इस अखबार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि खरसावां का ओडिशा में विलय का विरोध कर रहे करीब 30 हजार आदिवासियों पर पुलिस ने फायरिंग की। इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का भी गठन किया गया, पर उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ, इसकी जानकारी आज तक नहीं मिली। जबकि ओडिशा सरकार की ओर से आंकड़े में 32 और बिहार सरकार के आंकड़े में 48 लोगों की मौत बताई गई थी। लेकिन स्थानीय लोग मानते हैं कि करीब 30 हजार से ज्यादा लोगों की मौत खरसावां गोलीकांड में हुई।
ओडिशा सरकार की ओर से पुलिस भेजी गई
घटना के संबंध में स्थानीय लोग बताते है कि एक ओर खरसावां और सरायकेला के राजा के निर्णय के खिलाफ पूरा कोल्हान सुलग रहा था। दूसरी ओर सिंहभूम को ओडिशा में मिलाने के लिए वहां की सरकार प्रयासरत थी। ओडिशा सरकार ने कोल्हान को अपने राज्य में मिलाने के लिए शस्त्रबलों की तीन कंपनियों को पहले ही खरसावां पहुंचा दिया। लेकिन ओडिशा में विलय का विरोध कर रहे आदिवासी इन बातों से बेखबर थे और जनसभा को सफल बनाने के लिए खरसावां हाट मैदान में जमा हो गए। इस दौरान भीड़ में मौजूद लोगों ने ओडिशा के सीएम के खिलाफ नारेबाजी भी की। जबकि दूर-दूर से पारंपरिक हथियार और तीर-धनुष के साथ पहुंचे लोगों ने आजादी के गीत के साथ सभा की शुरुआत की। अचानक से पूरा माहौल बदल गया।
10/12/2023
विनोद रंजन की मृत्यु एक प्रबल आघात है।
हर जगह सक्रिय और उपस्थित व्यक्ति का स्थान रिक्त हो गया।दुखद।
हार्दिक स्मरण।
अंतिम जोहार
गांधी जी के सपनों का भारत बनाने के उद्देश्य से 1948 में अखिल भारत सर्व सेवा संघ की स्थापना हुई। 1960-61 में रेलवे से विधिवत जमीन खरीद कर करीब 13 एकड़ जमीन पर राजघाट वाराणसी में सर्व सेवा संघ की शाखा स्थापित हुई।
विगत साठ बासठ वर्षों से वाराणसी स्थित सर्व सेवा संघ ,प्रकाशन,शिक्षण एवं रचनात्मक कार्यों का सम्पादन करता आ रहा है। 2020 से केंद्र सरकार, उ प्रदेश सरकार और भारतीय रेल की वक्र दृष्टि इस परिसर पर लगी हुई है। मई 2023 में वाराणसी कमिश्नर ने परिसर स्थित गांधी विद्या संस्थान पर जबरन कब्जा कर लिया।
सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ हम लोग पिछले दो महीनों से अपने परिसर में सत्याग्रह कर रहे हैं। इसके साथ ही हमलोग अदालत की शरण में भी गये। मामला अभी विचाराधीन है। अदालत का कोई फैसला भी नहीं आया है।इसके बावजूद वाराणसी पुलिस आज 22 जुलाई 2023 को भारी संख्या में परिसर में घुस कर कार्यालय, कमरे आदि खाली कराने लगी। शांति पूर्ण ढंग से सत्याग्रह कर रहे गांधी जनों को जबरन हटाया गया। प्रतिरोध करने पर सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल, उ प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज, सर्व सेवा संघ के प्रकाशन विभाग के संयोजक अरविंद अंजुम (जमशेदपुर) सहित करीब दो दर्जन सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
झारखंड मुक्ति वाहिनी ने उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिसिया कार्रवाई की घोर निन्दा करते हुए, उससे मांग करता है कि गिरफ्तार नेताओं की अविलंब रिहाई हो। सर्व सेवा संघ से पुलिस को तत्काल हटाया जाए तथा अदालत के फैसले से पहले कोई दमनात्मक कार्रवाई न की जाए।
09/06/2022
वीर शहीद धरती आबा बिरसा मुंडा को उनके 122वां शहादत दिवस पर हुल जोहार।
राष्ट्रपति का बच्चा हो या अंतिम जन की संतान - सबको शिक्षा एक समान
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शिक्षा गांव के मजदूरों, किसानों एवं अन्य गरीब वर्ग की ताकत को जगाने और उनकी मुक्ति का एक अहम माध्यम है.
इन्हीं परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. लेकिन आज के समय में सरकारी स्कूलों की स्थिति काफी खराब हुई है. सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आयी है. शहरों या गांव क्षेत्र के कमजोर लोग भी अपना पेट काटकर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में महंगी फीस देकर पढ़ाने को मजबूर हैं . सरकारी स्कूलों की हालत यह है कि सरकारी स्कूल के शिक्षक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाते हैं. सरकारी स्कूल अब सिर्फ सर्टिफिकेट बांटने का केंद्र बनकर रह जानेवाले हैं.
एक बार जरा सोच कर देखिए सरकारी स्कूलों की हालत खराब होने, पढाई - लिखाई की गुणवत्ता घटने से किसको फायदा और किसका घाटा होगा?
सरकारी स्कूलों की हालत खराब होने से गरीब तबके को सबसे ज्यादा घाटा होगा. और फायदा प्राइवेट स्कूलों के मालिकों को होगा. सरकारी स्कूलों में किसी अफसर का बेटा-बेटी नहीं पढ़ रहा है. उनके बच्चे शहर के महंगी फीस वाले अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं. इसलिये सरकारी स्कूलों को सुधारने के लिए उनमें से कोई आगे नहीं आएगा. हम लोगों को ही सरकारी स्कूलों को सुधारने के मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना होगा.सरकारी स्कूलों को सुधारने , पूरी शिक्षा को सुधारने का काम अपने समाज एवं परिवार के बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने की जरूरी शर्त है.
शैक्षणिक सुधार के लिए हम लोग सरकार तथा आम जनता से निम्नलिखित अपील करते हैं
◆ सरकारी नौकरी करने वाले को सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाना कानूनी तौर पर अनिवार्य होनी चाहिए.
◆ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी में पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
◆ सभी विधायकों-सांसदों के लिए भी अपने बच्चों को सरकारी संस्थानों में ही पढ़ाने की कानूनी अनिवार्यता होनी चाहिए.
◆ सभी को 12 वीं तक गुणवत्ता - युक्त क्षमता आधारित अनिवार्य एवं निश्शुल्क शिक्षा दी जाए.
◆ शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में ना लगाया जाए.
गैर - शैक्षणिक सरकारी कार्यों के लिए लिए होमगार्ड जैसाअलग प्रशिक्षित बल बनाया जाए.
◆ मध्यान्ह भोजन को शिक्षण कार्य से अलग किया जाए.
◆ प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाए.
◆ सभी सरकारी स्कूलों की चारदीवारी बनायी जाय एवं गार्ड की व्यवस्था की जाय .
◆ महाविद्यालयों में मुख्य रूप से तकनीकी और पेशेवर शिक्षा दी जाए. आर्ट्स , साइंस एवं कॉमर्स आदि विषयों के लिए विशेष शिक्षा केंद्र बनाया जाए जहां शोध अनुसंधान एवं गंभीर अध्ययन की व्यवस्था हो.
◆ गरीब छात्रों को मुफ्त उच्च तकनीकी शिक्षा दी जाए.
◆ शिक्षण संस्थानों के लिए एकेडमिक कैलेंडर जारी किया जाए और न्यूनतम 270 दिनों की पढ़ाई सुनिश्चित हो.
◆ पड़ोसी स्कूल व्यवस्था (अपने घर के नजदीक स्कूल स्कूलों में ही अपने बच्चों को पढ़ाया जाने की व्यवस्था) लागू की जाए.
◆ छात्रवृत्ति का भुगतान नियमित रूप से किया जाए.
◆ विलय हुए सभी स्कूलों को फिर से चालू किया जाए.
◆ सभी पंचायतों-मोहल्लों में लाइब्रेरी एवं वाचनालय स्थापित किया जाए.
◆ खेल के क्षेत्र में छात्रों को बढ़ावा देने के लिए मोहल्ला एवं प्रखंड स्तर में खेल एकेडमी की स्थापना की जाए.
नोट : शैक्षणिक सुधार के लिए हमलोगों का छोटा सा मुहिम. आप सभी का सहयोग समर्थन चाहिए.
#झारखंड_जनतांत्रिक_महासभा
29/05/2020
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=615090622696279&id=318500755688602
JNU आदिवासी प्रोफेसर सोनाझरिया मिंज को सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय,दुमका,झारखंड की कुलपति बनने पर हार्दिक बधाई
The New Glasses फेसबुक पेज पर देखे
प्रो.सोनाझरिया मिंज के साथ ख़ास बातचीत
शनिवार , 30 मई, 2020 , शाम 6 बजे
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