29/09/2026
🔱 पितृपक्ष विशेष: पितर हमारे शुभचिन्तक सच्चे मार्गदर्शक 🔱
🔷️व्यावहारिक जीवन में मनुष्य एक--दूसरे की सहायता करते रहते हैं। इस सहकारी प्रवृत्ति के कारण ही मनुष्य बुद्दिमान बना और प्रकृति सम्पदा पर आधिपत्य कर सका है। सर्वथा एकाकी मनष्य तो निजी सामर्थ्य को देखते हए अन्यान्य प्राणियों से भी गया-बीता और दुर्बल-असमर्थ सिद्ध होता है। सहकार ही स्वभावगत वह वैभव है जिसका अभ्यास होने कें कारण मनुष्य क्रमशः अधिक ऊँचा उठता और आगे बढता चला गया है ।
🔶️मनुष्यों में से जो जितने घटिया हैं वे उतने ही संकीर्ण स्वार्थ-परता से ग्रसित देखे जाते हैं उन्हें अपने काम से काम एवं अपने मतलब से ही मतलब रहता है। दूसरों का दुख-दर्द समझने और उदार-सहकार देने जैसी भावना उठती ही नहीं, सूझ जगती ही नहीं ऐसे में कोई दुखी जरूरतमन्द है या नहीं, यह सोचने-देखने की उन्हे फुर्सत ही नहीं होती; किन्तू सभी ऐसे नहीं होते।
🔷️बौद्धिक पिछड़ेपन की तरह यह भावनात्मक अधःपतन पाया तो अनेकों में जाता है पर सब वैसे नहीं होते । अनेकों की प्रकति में मानवी गरिमा के अनरूप आत्मीयता एवं उदारता का भी बाहुल्य होता है और वे मिल-बाटकर खाने की नीति पर विश्वास करते हैं। औरों का दुख बँटा लेने और अपना सुख बाँट देने की ललक जगी रहने से 'वे सेवा-साधना के अवसर ढूँढते रहते हैं और जब भी, जहाँ भी सम्भव होता है अपनी उत्कष्टता क परिचय देते हैं। ️सेवा धर्म अपनाने वालों को देवता कहा जाता है। देवोपम अन्तःकरण प्राप्त कर लेना मन्ष्य का सर्वोपरि सौभाग्य माना गया है।
🔶️शरीर न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व अक्षुण्ण बना रहता है । मरण और जन्म के मध्य ऐसी ही स्थिति रहती है। इसमें प्रत्यक्ष पंच भौतिक कलेवर न रहने पर भी उनमें ऐसी क्षमता विद्यमान रहती है जिसके सहारे अपनी उदारता का परिचय दे सके और सेवा-साधना की दष्टि रखकर दसरों की सहायता कर सकें। ऐसी ही आत्माएँ देवता कहलाती हैं और वे अपनी स्थिति में रहते हए भी लोक-कल्याण के लिए कुछ न कुछ करती रहती हैं।
पितर आत्माएँ देव सत्ता का ही पर्याय कही जा सकती हैं। वे समय समय पर जीवित अवस्था की ही तरह सेवा सहायता कर अपन धर्म निबाहती रहती हैं। भले ही ऐसी परोक्ष सहायता को दैवी अन्दान नाम दे दिया जाय पर एक तथ्य तो अटल है ही कि वे श्रेष्ठ आत्माओ सुपात्रों को ही मिलते हैं।
🔷️पितृपक्ष का हिन्दू धर्म एवं संस्कति में विशेष माहात्म्य है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी. सच्चा देव संस्कति का अनुयायी नहीं माना जा सकता। शास्त्र मान्यतानुसार मृत्य होने पर मनुष्य की जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जात एवं ऊपर उठकर पितृलोक में पहँचती हैं । उन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहँचने की शक्ति प्रदान करने-शान्ति देने के निमित्त ही पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान किया गया है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है।
🔷️श्राद्ध से श्रद्ध जीवित रहती है। हमारे अदृश्य सहायक पितर गण गरुजनों एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के निमित्त मात्र श्राद्ध-तर्पण के रूप में ही बन पड़ता है। मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता के उन भावों कां स्थिर रहन हमारी संस्कति के अनुयाइयों ने वर्ष में 15 दिन का समय पृथक निकाल लिया है। पितभक्ति का इससे उज्ज्वल उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है ।
🔶️यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि पितरों को सच्ची श्रद्ध दी जाएगी, उन्हें तृप्त रखा जाएगा तो वे निश्चय ही शक्ति, प्रकाश प्रेरणा मार्गदर्शन, सहयोग व भावनात्मक अनुदान देंगे । पितरों के प्रति व्यक्त की गयी कतज्ञता उलटे लौटकर बहुगणित होकर स्वयं पर बरसती है। अपनी मोटी बुद्धि को तार्किक बनाते हुए हमें परोक्ष जगत् के अस्तित्व को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए तथा वहाँ विद्यमान सहायक आत्माओं से सम्पर्क स्थापित कर उनके अनुदानों से लाभान्वित होना चाहिए।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ठ श्रीराम शर्मा आचार्य जी 🙏
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