04/10/2026
बिहार को लेकर पिछले दो दशकों की राजनीति पर सवाल उठाना जरूरी है। NDA के लंबे शासन में भी विकास, रोजगार और सामाजिक सौहार्द से जुड़े कई सवाल आज तक बने हुए हैं। वहीं, दूसरी ओर समाजवाद से परिवारवाद की ओर बढ़ी राजनीति ने जातीय समीकरणों को इतना महत्व दिया कि सामाजिक विभाजन और तनाव के सवाल भी उठते रहे।
सोचा, बांकीपुर का उदाहरण याद दिला दूँ। पटना का बांकीपुर ऐसा विधानसभा क्षेत्र रहा है, जहाँ मतदाताओं ने कई बार जाति और धर्म के पार जाकर उम्मीदवार और मुद्दों को महत्व देने का संदेश दिया। यानी लोकतंत्र में मतदाता को किसी तय राजनीतिक खांचे में रखकर नहीं देखा जा सकता—वह अपने विवेक से सत्ता और विपक्ष, दोनों को जवाब दे सकता है।
इसीलिए किसी पूरे समाज या मतदाता वर्ग को “अंधभक्त” कहकर खारिज करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि बांकीपुर जैसे उदाहरण बताते हैं कि जागरूक मतदाता राजनीतिक प्रचार से प्रभावित होने के बावजूद अंतिम निर्णय अपने विवेक से ले सकता है।
आज जब कोई “जंगलराज 2.0” की चर्चा करता है, तो थोड़ा आत्ममंथन भी जरूरी है।
आखिर चलनी जब सूप को दोष देने लगे, तो कहावत अपने आप याद आ जाती है। 🙂
लोकतंत्र का असली सवाल यही है—क्या बिहार की जनता जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और विकास के आधार पर अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगेगी? और क्या हर राजनीतिक दल जनता के सामने अपने शासन का ईमानदार हिसाब रखने को तैयार है?