02/07/2026
"भरत तिवारी एनकाउंटर के बहाने बिछी सियासी बिसात"
जाति ग्रंथि से ग्रसित लोग आज एक ऐसे व्यक्ति को महिमामंडित कर रहे हैं, जो अवैध हथियार (पिस्तौल) लेकर घूम रहा था और जिसने अवैध हथियार लहराया, अपशब्दों का प्रयोग किया और पुलिस पर फायरिंग की। उद्देश्य भले कुछ भी हों, उसके तरीके को सही ठहराना समाज को गर्त में डालने जैसा कदम होगा।
किसी भी सभ्य समाज में कानून व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए हिंसा और अवैध हथियारों का विरोध करना अत्यंत आवश्यक है। वैचारिक मतभेद या उद्देश्य चाहे जो भी हों, कानून को हाथ में लेने या हिंसा का सहारा लेने वाले तरीकों को सही नहीं ठहराया जा सकता...
अवैध गतिविधियों से जुड़े व्यक्तियों का महिमामंडन वास्तव में एक जटिल सामाजिक समस्या है। जब जाति आधारित और अन्य गहरी सामाजिक दरारें मौजूद होती हैं, तो ऐसे पूर्वाग्रह "कानून के शासन" (rule of law) को कमजोर कर सकते हैं।
इस विषय को गहराई से समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करना महत्वपूर्ण है:
• अपराधियों या हिंसक तरीकों का महिमामंडन करने से युवा पीढ़ी के बीच गलत आदर्श स्थापित होते हैं।
• जातीय या सामाजिक आधार पर ऐसी घटनाओं का पक्ष लेने से समुदायों के बीच आपसी अविश्वास और कटुता बढ़ती है।
• न्याय और सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस और अदालतों की है। व्यक्तिगत स्तर पर हथियार उठाना इस व्यवस्था को कमजोर करता है।
• कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे उनकी सामाजिक या जातीय पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
• समाज के प्रबुद्ध वर्ग की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे भावनाओं या ग्रन्थियों से ऊपर उठकर सही और गलत का मूल्यांकन स्थापित मानदंडों के आधार पर करें।
• कानून के शासन और स्थापित कानूनी मानदंडों का पालन करना लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था का मूलभूत आधार है। यह सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक को प्राप्त अधिकारों का पालन हो, जिनमें अपराध के संदिग्ध भी शामिल हैं, जिससे अंततः न्याय व्यवस्था की अखंडता और विश्वसनीयता बनी रहती है।
• भारत में, संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसका अर्थ है कि किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को भी कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही इन अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।
बिहार में उद्योग लगाने की दिशा में "अपराध और भ्रष्टाचार" दो सबसे गंभीर बाधाएं हैं, जो निवेशकों के भरोसे को कमजोर करती हैं। ये दोनों समस्याएं उद्यमियों का विश्वास तोड़ती हैं, परिचालन लागत (operational cost) को बढ़ाती हैं और राज्य में निवेश का माहौल खराब करती हैं...
िवारी एनकाउंटर एक राजनीतिक हथियार बन गया है। राजनीति में विपक्ष वाले तो सामने से दिखते हैं, लेकिन राजनीतिक शत्रु "दोस्त की शक्ल" में भी हो सकते हैं। ऐसी ही स्थिति बिहार के माननीय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ हो रहा है, जहां भाजपा के ही इनके दोस्त शत्रु बने हुये हैं... सम्राट चौधरी भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी और उनके पैर खींचने की कोशिश कर रहे 'अपने ही दोस्त' रूपी शत्रुओं से जूझ रहे हैं ,जो उनकी स्थिति को लगातार कमजोर करने की कोशिशों में लगे हैं।
अगर भरत तिवारी के बजाय एक "मुसलमान का Encounter" किया गया होता, तो क्या उसे तुरंत और लक्षित रूप से #आतंकवादी के रूप में लेबल नहीं किया गया होता ?
आपराधिक घटनाओं और पुलिस मुठभेड़ों (एनकाउंटर) को धर्म, जाति और विचारधारा के चश्मे से देखना भारतीय समाज में एक बहुत ही संवेदनशील और ध्रुवीकरण वाला विषय रहा है...