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UPSC_2022 ESSAY PAPER
16/09/2022

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Happy Independence day 🙏
15/08/2022

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30/07/2022
अशोक के स्तंभ कारीगरी के अनोखे नमूने हैं। चालीस - पचास फीट ऊँचा एक ही पत्थर के बने हुए जिनकी चिकनाई से प्रत्येक युग के व...
16/07/2022

अशोक के स्तंभ कारीगरी के अनोखे नमूने हैं। चालीस - पचास फीट ऊँचा एक ही पत्थर के बने हुए जिनकी चिकनाई से प्रत्येक युग के वासी चकित होते आए हैं।

पत्थर के स्तंभों पर शानदार चमक है। ऐसी कि धातु के होने का भ्रम होता है।

पहला भ्रम अंग्रेज यात्री टाॅम कोरिएट को हुआ था। वे 17 वीं सदी के मुगल काल में भारत आए थे। टोपरा - दिल्ली स्तंभ देखा और लिखा कि पीतल की परत चढ़ा स्तंभ है।

पीतल का भ्रम विटेकर को भी हुआ था। चेपलिन फेरी को तो संगमरमर का भ्रम हुआ था।

19 वीं सदी के आरंभ में आए बिशप हैबर को भी भ्रम हुआ और लिखा कि यह ढली हुई धातु का है।

सारनाथ स्तंभ पर सिंहों की जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली हुई नसों में जैसी स्वाभाविकता है, वह न केवल इस देश के लिए बल्कि समस्त संसार के मूर्ति विन्यास में अप्रतिम है।

न केवल सिंह, बल्कि असोक कालीन बैल और हाथी से लेकर यक्ष - यक्षिणी की जो भी मूर्तियाँ मिलती हैं, वे अनुपम हैं।

बाईस सौ साल पहले का लिखा हुआ शिलालेख आज भी अपनी चमक बनाए हुए हैं।

सही अर्थों में सम्राट असोक प्रथम राष्ट्रीय शासक थे, जिन्होंने पूरे राष्ट्र को एक भाषा और लिपि देकर एकता के सूत्र में बाँध दिए।

स्वतंत्रत भारत ने सारनाथ स्तंभ के सिंह - शीर्ष को अपने राजचिह्न के रूप में ग्रहण कर मानवता के इस महान नायक के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है।

© राजेन्द्र प्रसाद सिंह

पुष्य नक्षत्र हवेली , जोधपुर जोधपुर नगर के परकोटे के भीतर फुलेराव की घाटी में स्थित है पुष्य नक्षत्र हवेली। इस हवेली का ...
15/07/2022

पुष्य नक्षत्र हवेली , जोधपुर

जोधपुर नगर के परकोटे के भीतर फुलेराव की घाटी में स्थित है पुष्य नक्षत्र हवेली। इस हवेली का निर्माण महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के कामदार रहे स्वर्गीय पुष्करणा रघूनाथमल जोशी ने करवाया था। इस हवेली की खासियत यह है की इस हवेली के पत्थरो की चुनाई का कार्य केवल पुष्य नक्षत्र के दौरान ही होता था इस कारण वर्ष में केवल मात्र तेरह दिवस ही चुनाई का कार्य चलता था यधपि पत्थरो की घड़ाई का कार्य वर्ष पर्यन्त चलता रहता था। सन 1890 के पुष्य नक्षत्र के दिन इस हवेली का कार्य प्रारम्भ हुवा और सन 1911 तक इस हवेली का कार्य चलता रहा। इस प्रकार 21 वर्ष तक कुल 273 दिवस तक इस हवेली का निर्माण कार्य चलता रहा किन्तु 1911 में हवेली के निर्माता पुष्करणा रघूनाथमल जोशी उर्फ़ भुरजी के स्वर्गवास होने के कारण हवेली का निर्माण अधूरा रह गया जो आज भी हवेली के सामने खड़े होने पर दिखाई दे जाता है। ये हवेली आज भी अधूरी निर्मित है।

हवेली का स्थापत्य अद्भुत है भारतीय और पाश्चात्य शैली का संगम है। हवेली का द्वार तथा निर्माण योजना तो पूर्ण रूप से भारतीय एवं स्थानीय है किन्तु हवेली में लगी महारानी और इंग्लैंड के अन्य राजपुरुषों की प्रतिमाये तथा खिड़कियों तथा अनेक निर्माण कार्यो में स्पष्ट रूप से पाश्चात्य शैली की छाप है जो हवेली के निर्माता पर तत्कालीन अंग्रेजी सभ्यता के प्रभाव का परिणाम प्रतीत होता है।

वर्तमान में पर्यटन की दृष्टि से हवेली की देश विदेश में काफी प्रसिद्धि है। हवेली के बाहर इसके इतिहास से सम्बंधित सूचनापट्ट लगाए जाने की तथा इस हवेली के देशी पर्यटकों में पर्याप्त प्रचार प्रसार किये जाने की आवश्यकता है।

@शरद व्यास जोधपुर

साहिब-दिल्ही आने तक के पैसे नही है कृपया पुरुस्कार डाक से भिजवा दो!हलधर नाग - जिसके नाम के आगे कभी श्री नही लगाया गया, 3...
15/07/2022

साहिब-दिल्ही आने तक के पैसे नही है कृपया पुरुस्कार डाक से भिजवा दो!

हलधर नाग - जिसके नाम के आगे कभी श्री नही लगाया गया, 3 जोड़ी कपड़े ,एक टूटी रबड़ की चप्पल एक बिन कमानी का चश्मा और जमा पूंजी 732 रुपया का मालिक आज पद्मश्री से उद्घोषित होता है ।।

ये हैं ओड़िशा के हलधर नाग ।
जो कोसली भाषा के प्रसिद्ध कवि हैं। ख़ास बात यह है कि उन्होंने जो भी कविताएं और 20 महाकाव्य अभी तक लिखे हैं, वे उन्हें ज़ुबानी याद हैं। अब संभलपुर विश्वविद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। सादा लिबास, सफेद धोती, गमछा और बनियान पहने, नाग नंगे पैर ही रहते हैं। ऐसे हीरे को चैनलवालों ने नहीं, मोदी सरकार ने पद्मश्री के लिए खोज के निकाला । उड़‍िया लोक-कवि हलधर नाग के बारे में जब आप जानेंगे तो प्रेरणा से ओतप्रोत हो जायेंगे। हलधर एक गरीब दलित परिवार से आते हैं।10 साल की आयु में मां बाप के देहांत के बाद उन्‍होंने तीसरी कक्षा में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। अनाथ की जिंदगी जीते हुये ढाबा में जूठे बर्तन साफ कर कई साल गुजारे। बाद में एक स्कूल में रसोई की देखरेख का काम मिला। कुछ वर्षों बाद बैंक से 1000रु कर्ज लेकर पेन-पेंसिल आदि की छोटी सी दुकान उसी स्कूल के सामने खोल ली जिसमें वे छुट्टी के समय पार्टटाईम बैठ जाते थे। यह तो थी उनकी अर्थ व्यवस्था। अब आते हैं उनकी साहित्यिक विशेषता पर। हलधर ने 1995 के आसपास स्थानीय उडिया भाषा में ''राम-शबरी '' जैसे कुछ धार्मिक प्रसंगों पर लिख लिख कर लोगों को सुनाना शुरू किया। भावनाओं से पूर्ण कवितायें लिख जबरन लोगों के बीच प्रस्तुत करते करते वो इतने लोकप्रिय हो गये कि इस साल राष्ट्रपति ने उन्हें साहित्य के लिये पद्मश्री प्रदान किया। इतना ही नहीं 5 शोधार्थी अब उनके साहित्य पर PHd कर रहे हैं जबकि स्वयं हलधर तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं।

आप किताबो में प्रकृति को चुनते है
पद्मश्री ने, प्रकृति से किताबे चुनी है।।

नमन है ऐसी विभूतियो को जिनका लक्ष्य धन अर्जन नहीं बल्कि ज्ञानार्जन हैं। नागजी ने काव्यों की रचना कर साहित्य जगत को समृद्ध किया।🙏🙏

भारत के राजचिह्न की खोजभारत के राजचिह्न की खोज फ्रेडरिक आॅस्कर ओरटेल ( 1862 - 1942 ) ने की थी। वे जर्मनी में हनोवर के थे...
15/07/2022

भारत के राजचिह्न की खोज

भारत के राजचिह्न की खोज फ्रेडरिक आॅस्कर ओरटेल ( 1862 - 1942 ) ने की थी। वे जर्मनी में हनोवर के थे।

ओरटेल सिविल इंजीनियर थे। तब बनारस में पोस्टिंग थी। उस समय सारनाथ खुदाई का केंद्र बना हुआ था।

ओरटेल को 1903 में सारनाथ की खुदाई करने की अनुमति मिली। कड़ाके की ठंड में दिसंबर 1904 में उन्होंने खुदाई शुरू की।

साल 1905 के मार्च महीने की वह 15 तारीख थी। धमेख स्तूप के निकट मिट्टी में गड़ा हुआ उन्हें सिंह चतुर्मुख का वह टुकड़ा मिला, जो आज भारत का राजचिह्न है।

तब ओरटेल सुपरिटेंडिंग इंजीनियर थे। साल 1921 में चीफ इंजीनियर से रिटायर होकर वे यूनाइटेड किंगडम चले गए।

वे यूनाइटेड किंगडम के टेडिंगटन में रहने लगे। उन्होंने अपने घर का नाम " सारनाथ " रखा था, जो उनके सारनाथ से प्रेम को दर्शाता है।




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