Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan

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Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan Harshnath Shiva Temple is located 21 Kms south from Sikar, built by Chauhan Rulers around 10th century, ancient carvings & statues are a treat to explore.

Wishing you a joyous and prosperous Diwali! May the festival of lights illuminate your path to success.🧨🎊🎉✨🎁 Warm regard...
12/11/2023

Wishing you a joyous and prosperous Diwali! May the festival of lights illuminate your path to success.

🧨🎊🎉✨🎁
Warm regards
Kripal Singh Shekhawat
Khama Ghani Holidays

Pleased to share my another Article, its written about Devgarh Fort & a beautiful trek to access it, which is near Harsh...
01/08/2023

Pleased to share my another Article, its written about Devgarh Fort & a beautiful trek to access it, which is near Harshnath, Sikar. It is Published today by Maruvedna Newspaper. Originally, it was written for an FB page created by me to Create Awareness about and to Promote Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan, as a tourist attraction. All of you are also requested to visit this page to know more about Devgarh & Harshnath Temple. Please also like & Share the page & posts thereon. Please also support newspaper, which, Mr. Devendra, is publishing from Jhunjhunu & circulating it all over India, as a voice of Rajasthan & Pravasi Rajasthanies. Thank you.

देवगढ़ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:

देवगढ़ सीकर से लगभग 10 किमी दूर हर्षनाथ रोड के बांयी और स्थित, एक किला/ दुर्ग/ गढ़ है। यह किला अपने रणनीतिक दृष्टि से ऊंची पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण लोकप्रिय है। इतिहासकारों के अनुसार सीकर के रावराजा देवीसिंह जी ने सन 1787, मे ऊंची पहाड़ी पर, इस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किले का निर्माण करवाया था, इसलिए इसका नाम देवगढ़ रखा गया। यह देखने लायक स्थान सीकर के इतिहास की धरोहर है और अतीत के भग्नावशेष होने के कारण अपने अनूठे तरीके से आकर्षक और जीवंत है। यही कारण है कि हर्षनाथ जैसे लोकप्रिय स्थान के समक्ष थोड़ा उपेक्षित होने के बाद भी यह पर्यटकों एवम ट्रेकर्स के बीच सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बनना शुरू हो गया है।

सीकर के नजदीक लगभग 14-15 किमी पर एक पहाड़ की चोटी पर स्थित प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर एवम रमणीक स्थान है हर्षनाथ, और वहां जाते हुए मुख्य सड़क पर सांवली पार करने के बाद, बांयी और पहाड़ी पर एक किला / दुर्ग दिखाई देना शुरू होता है, जो हर्ष के पहाड़ पर पहुंचने के बाद वहां से भी दिखाई देता है। इस किले का नाम है देवगढ़ का किला / दुर्ग, जिसे हमारे यहां की स्थानीय भाषा मे गढ़ भी कहते हैं। सीकर से लगभग 9-10 किमी पर एक छोटी सड़क हर्ष की मुख्य सड़क से बायीं और से देवगढ़ गांव के लिए निकलती है, जो हमे किले की पहाड़ी की तलहटी तक ले जाती है। वहां से शुरू होती देवगढ़ किले की ट्रेक। देवगढ़ की ट्रेक मध्यम कठिनाई वाली ट्रेक है और 45 मिनेट से एक घण्टे में चढ़ाई पूरी होती है। चढ़ाई समाप्ति पश्चात दिखाई देने वाले भूतकाल के ऐतिहासिक अवशेष, किले के भव्यता, आसपास की अरावली पहाड़ियां, नीला आसमान और सुदूर क्षितिज पर दृष्टिगोचर होते सीकर एवम आसपास के गांव के सुंदर दृश्य निश्चित रूप से मनमोहक एवम यादगार होते हैं।

हर्षनाथ अपने प्राचीन मंदिर के कलात्मक भग्नावशेष, शिव मन्दिर एवम प्राकृतिक अवलोकन स्थान के रूप में काफी प्रसिद्ध है। पर्यटक और सीकरवासी यहां घूमने और ट्रैकिंग के लिए जाते हैं, किन्तु सड़क के बांयी और ऊंची पहाड़ी से यह देवगढ़ किला अकेला बैठा मायूसी से ताकता रहता है। पर अब धीरे धीरे देवगढ़ की लोकप्रियता बढ़ रही है। तो आइए ले चलते हैं आप को भी, देवगढ़ की अनूठी ट्रेक पर।

पिछले जून में, सीकर से मैं और मेरा छोटा भाई और साथ मे हम दोनों के बच्चे, पहले दिन हर्ष का ट्रैक करने गए हुए थे, ताकि ट्रेक का आनंद लेने के साथ ही साथ हर्षनाथ के बारे में फेसबुक पेज पर कुछ नई तस्वीरें भी साझा कर सकूं। ऐसे में हर्ष के पहाड़ से देवगढ़ को निहारते हुए, और कुछ ट्रेकर्स से बात करते हुए अनायास ही अहसास हुआ कि इतनी बार हर्ष आये हैं, क्यों न इस बार देवगढ़ ट्रेक का भी तजुर्बा किया जाए। बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और मैंने और भाई ने अगले ही दिन सुबह देवगढ़ ट्रेक का प्रोग्राम बना लिया।

हमलोग सीकर से निकले और लगभग 9 किमी के बाद बांयी और देवगढ़ के लिए मुड़ने का बोर्ड दिखाई दिया, और मुख्य सड़क से अंदर लगभग 2-3 किमी पर पहाड़ की तलहटी में देवगढ़ गांव आया, फिर एक दो जगह बांए मुड़ते मुड़ते, ट्रेक यानी की चढ़ाई शुरू होने का स्थान आ गया। (यदि चाहें तो गूगल मैप में भी 'देवगढ़ फोर्ट सीकर' का डायरेक्शन लगा सकते हैं।) गांव में छोटी छोटी गलियों के बाद, एक बड़े से गोल पीपल के गट्टे के एक तरफ कार पार्क करके, वहीं बने एक छोटे मंदिर में दर्शन के बाद, बैकपैक्स में पानी और स्नैक्स रख कर चढ़ाई शुरू की हमने। आप भी जब जाएं तो अपने साथ पानी एवम स्नैक्स साथ ले जाना न भूलें, क्योंकि पर्यटन दृष्टि से विकसित न होने के कारण एक बार ट्रेक शुरू होने के बाद कुछ भी नही मिलेगा।

ट्रेक बहुत आसान तो नही किन्तु कठिनाई का स्तर मध्यम कह सकते हैं। हर्षनाथ का ट्रैक इससे काफी आसान है। लेकिन इस ट्रैक पर काफी समय से रख रखाव न होने एवम पर्यटकों की कम आवाजाही के कारण इस ट्रैक पर पत्थर उबड़ खाबड़ भी हैं, कुछ स्थानों पर उखड़ भी गए हैं, और कमजोर पत्थरों पर पॉंव रखने पर लुढ़कने फिसलने का खतरा तो है ही, खड़ी चढ़ाई एवम बीच बीच मे पगडंडियों पर अतिक्रमण करती हुई कंटीली झाड़ियां कठिनाई का स्तर एवम रोमांच दोनों को बढ़ा कर अगले स्तर पर पहुंचा देती हैं।

एक बार ट्रेक शुरू करने के बाद जैसे जैसे ऊपर चढ़ते हैं, और घुमावदार पगडंडियों को पार करने के बाद ज्यूँ ही किला दिखाई देना शुरू होता है तो रोमांच का स्तर बढ़ना शुरू होता है, और जब किले का झाड़ियों से आच्छादित और वक्त के हाथों धूल धूसरित मुख्यद्वार दिखाई देता है तो शायद वही अनुभूति होती है जो एडमंड हिलेरी को एवेरेस्ट पर पहुंच कर हुई होगी। इस दरवाजे में बनी तिबारी में कई वर्षों से जमी धुल की परतें, नमी, जाले, चमगादड़ों की गंध और भूतकाल की धरोहर को न संजो रख पाने की एक मिली जुली से अनुभूति महसूस होती है।....!!!

मुख्य द्वार एवम तिबारी से प्रवेश करते ही यह आभास होता है कि मंजिल पर पहुंच गए, लेकिन दरवाजों से किले के प्रांगण में घुसते ही पता लग जाता है कि अभी तो और सीढ़ियां और चढ़ाई दोनों बाकी है।

किले की विशाल दीवारें, जलाशय एवम बाहरी रिहायश के खंडहर इस किले की भव्यता की कहानियां सुनाते प्रतीत होते हैं। विशाल दीवारों और बुर्जों से चारों तरफ के गांव, खेत, हर्ष नाथ का पहाड़, अरावली पर्वतमाला और उत्तर दिशा में दिखाई देता सीकर शहर, कुल मिला कर बड़ा ही विहंगम दृश्य दिखाई देता है और ऊंचाई पर आती हुई हवा के झोंके जैसे पूरी थकान मिटा देते हैं।

किले के उत्तरी भाग में विशाल परकोटे की दीवारें और नीचे दुर्गम पहाड़ी ढलाने हैं, और दक्षिणी भाग में कुछ ऊंचाई पर सीढियां चढ़ने, पर एक बड़े दरवाजे के अंदर एक बड़ा दालान है जिसमे चारों तरफ कमरे बने हुए हैं, जिनमे शायद एक समय पर सैनिक, सेवक और अश्व रहा करते होंगे किन्तु अब जंगली घास और झाड़ियों का निवास है। दरवाजे के पास घोड़ों के चढ़ने उतरने का खुर्रा एवम सवारी में सहायता करने हेतु चबूतरा भी बना हुआ है।

और दालान के बाद आता है एक रंग बिरंगे और आलीशान महल के खंडहर। राजसी कमरे जिन में आज भी ताजा हवा आती रहती है, रंग बिरंगी दीवारों में स्थानीय भित्ति चित्र कला के अवशेष, झरोखे जिन से चारों तरफ के सुंदर नजारे दिखाई दें, छत पर जाने को सीढियां तथा राजसी / ठाकुर परिवार के लिए बने राजसी शौच एवम स्नान व्यवस्थाएं जैसे हम सब का इन खंडहरों के शाही भूतकाल से साक्षात्कार करवाती हैं। और हां, छतों पर उल्टे लटके चमगादड़ों से डरें नही, बस शोर मचा कर उनकी नींद में खलल नही डालें।

लेकिन देखते हुए बड़ा ही अफसोस हुआ यह देख कर कि इतने सुंदर महल की दीवारें, फर्श, छत और खंभे तक को, गड़े छुपे खजाने की तलाश करते लालची मनुष्यों ने जगह जगह से खोद डाला है, रौंद डाला है। किन्तु फिर भी इतना जख्मी होने पर भी इन का गौरवशाली अतीत मानो पर्यटकों के सामने मुस्करा देता है। ऐसा सुना है कि यह किला बिक चुका है और किसी की निजी संपत्ति है, किन्तु रखरखाव जैसी कोई चीज नजर नही आती है, परंतु इस किले का आकर्षण भी शायद यही है।

छत से किले की प्राचीर के ऊंचे दक्षिणी हिस्से में पहुंचते हैं। विशाल दीवारें, बुर्ज और मनमोहक दृश्य, किसी भी फोटोग्राफर के लिए नैसर्गिक एवम स्वर्गतुल्य स्थान है।

दिन चढ़ने के साथ बढ़ती धूप में राजस्थान की गर्मी का अहसास भी धीरे धीरे ज्वलंत होने लगता है, और ऐसे में वापिस लौटना भी पड़ता है। आपके साथ लौटेगा एक संस्मरण, अंचल के बाकी किलों से काफी अलग एवम कठिन ट्रेक का यह अनुभव शर्तिया जीवन भर एक याद बन कर रहेगा।

© Dr. CA. Sunil Sharma

Pleased to share my Article about Harshnath Temple near Sikar, Published today by Maruvedna Newspaper. Originally, it wa...
18/07/2023

Pleased to share my Article about Harshnath Temple near Sikar, Published today by Maruvedna Newspaper. Originally, it was written for this FB page, created by me to Create Awareness about & Promote Harshnath Ancient Temple - Sikar Rajasthan, as a tourist attraction. All of you are also requested to visit this page to know more about Harshnath Temple. Please also like & Share the page & posts thereon. Please also support newspaper, which, Mr. Devendra, is publishing from Jhunjhunu & circulating it all over India, as a voice of Rajasthan & Pravasi Rajasthanies. Thank you.
-Dr. CA. Sunil Sharma, Mumbai. (Originally from Sikar)

देवगढ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:(पार्ट -3 खंडहर, आंतरिक एवम बाह्य दृश्य)मुख्य द्वार एवम तिबारी से प्रवेश करते ही यह आभास होता...
10/07/2023

देवगढ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:
(पार्ट -3 खंडहर, आंतरिक एवम बाह्य दृश्य)

मुख्य द्वार एवम तिबारी से प्रवेश करते ही यह आभास होता है कि मंजिल पर पहुंच गए, लेकिन दरवाजों से किले के प्रांगण में घुसते ही पता लग जाता है कि अभी तो और सीढ़ियां और चढ़ाई दोनों बाकी है।

किले की विशाल दीवारें, जलाशय एवम बाहरी रिहायश के खंडहर इस किले की भव्यता की कहानियां सुनाते प्रतीत होते हैं। विशाल दीवारों और बुर्जों से चारों तरफ के गांव, खेत, हर्ष नाथ का पहाड़, अरावली पर्वतमाला और उत्तर दिशा में दिखाई देता सीकर शहर, कुल मिला कर बड़ा ही विहंगम दृश्य दिखाई देता है और ऊंचाई पर आती हुई हवा के झोंके जैसे पूरी थकान मिटा देते हैं।

किले के उत्तरी भाग में विशाल परकोटे की दीवारें और नीचे दुर्गम पहाड़ी ढलाने हैं, और दक्षिणी भाग में कुछ ऊंचाई पर सीढियां चढ़ने, पर एक बड़े दरवाजे के अंदर एक बड़ा दालान है जिसमे चारों तरफ कमरे बने हुए हैं, जिनमे शायद एक समय पर सैनिक, सेवक और अश्व रहा करते होंगे किन्तु अब जंगली घास और झाड़ियों का निवास है। दरवाजे के पास घोड़ों के चढ़ने उतरने का खुर्रा एवम सवारी में सहायता करने हेतु चबूतरा भी बना हुआ है।

और दालान के बाद आता है एक रंग बिरंगे और आलीशान महल के खंडहर। राजसी कमरे जिन में आज भी ताजा हवा आती रहती है, रंग बिरंगी दीवारों में स्थानीय भित्ति चित्र कला के अवशेष, झरोखे जिन से चारों तरफ के सुंदर नजारे दिखाई दें, छत पर जाने को सीढियां तथा राजसी / ठाकुर परिवार के लिए बने राजसी शौच एवम स्नान व्यवस्थाएं जैसे हम सब का इन खंडहरों के शाही भूतकाल से साक्षात्कार करवाती हैं। और हां, छतों पर उल्टे लटके चमगादड़ों से डरें नही, बस शोर मचा कर उनकी नींद में खलल नही डालें।

लेकिन देखते हुए बड़ा ही अफसोस हुआ यह देख कर कि इतने सुंदर महल की दीवारें, फर्श, छत और खंभे तक को, गड़े छुपे खजाने की तलाश करते लालची मनुष्यों ने जगह जगह से खोद डाला है, रौंद डाला है। किन्तु फिर भी इतना जख्मी होने पर भी इन का गौरवशाली अतीत मानो पर्यटकों के सामने मुस्करा देता है। ऐसा सुना है कि यह किला बिक चुका है और किसी की निजी संपत्ति है, किन्तु रखरखाव जैसी कोई चीज नजर नही आती है, परंतु इस किले का आकर्षण भी शायद यही है।

छत से किले की प्राचीर के ऊंचे दक्षिणी हिस्से में पहुंचते हैं। विशाल दीवारें, बुर्ज और मनमोहक दृश्य, किसी भी फोटोग्राफर के लिए नैसर्गिक एवम स्वर्गतुल्य स्थान है।

दिन चढ़ने के साथ बढ़ती धूप में राजस्थान की गर्मी का अहसास भी धीरे धीरे ज्वलंत होने लगता है, और ऐसे में वापिस लौटना भी पड़ता है। आपके साथ लौटेगा एक संस्मरण, अंचल के बाकी किलों से काफी अलग एवम कठिन ट्रेक का यह अनुभव शर्तिया जीवन भर एक याद बन कर रहेगा।

©Dr. CA. Sunil Sharma

देवगढ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:(पार्ट -2 ट्रैकिंग / हाईकिंग)देवगढ़ सीकर से लगभग 10 किमी दूर हर्षनाथ रोड के बांयी और स्थित एक...
10/07/2023

देवगढ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:
(पार्ट -2 ट्रैकिंग / हाईकिंग)
देवगढ़ सीकर से लगभग 10 किमी दूर हर्षनाथ रोड के बांयी और स्थित एक किला/ दुर्ग/ गढ़ है। यह किला अपने रणनीतिक दृष्टि से ऊंची पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण लोकप्रिय है। इतिहासकारों के अनुसार सीकर के राव राजा देवी सिंह जी ने सन 1787 में इसे बनवाया था। यह देखने लायक जगह है। यह स्थान सीकर के इतिहास की धरोहर और अतीत के भग्नावशेष होने के कारण अपने अनूठे तरीके से आकर्षक और जीवंत है। यही कारण है कि हर्षनाथ जैसे लोकप्रिय स्थान के समक्ष थोड़ा उपेक्षित होने के बाद भी यह पर्यटकों एवम ट्रेकर्स के बीच सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक बनना शुरू हो गया है।
सीकर से मैं और मेरा छोटा भाई और साथ मे हम दोनों के बच्चे, पहले दिन हर्ष का ट्रैक करने गए हुए थे, ताकि ट्रेक का आनंद लेने के साथ ही साथ इस हर्षनाथ के इस फेसबुक पेज पर कुछ नई तस्वीरें भी साझा कर सकूं। ऐसे में हर्ष के पहाड़ से देवगढ़ को निहारते हुए, और कुछ ट्रेकर्स से बात करते हुए अनायास ही अहसास हुआ कि इतनी बार हर्ष आये हैं, क्यों न इस बार देवगढ़ ट्रेक का भी तजुर्बा किया जाए। बच्चे तुरंत ही तैयार हो गए और मैंने और भाई ने अगले ही दिन सुबह देवगढ़ ट्रेक का प्रोग्राम बना लिया।
देवगढ़ ट्रेक के लिए सीकर से हर्ष की सड़क पर लगभग 9-10 किमी के बाद बांयी और देवगढ़ के लिए मुड़ने का बोर्ड दिखाई देता है, और मुख्य सड़क से अंदर लगभग 2-3 किमी पर पहाड़ की तलहटी में देवगढ़ गांव आया, और फिर एक दो जगह बांए मुड़ते मुड़ते, ट्रेक या की चढ़ाई शुरू होने का स्थान आ गया। यदि चाहें तो गूगल मैप में भी 'देवगढ़ फोर्ट सीकर' का डायरेक्शन लगा सकते हैं। गांव में छोटी छोटी गलियों के बाद एक बड़े से गोल पीपल के गट्टे के एक तरफ कार पार्क करके, वहीं बने एक छोटे मंदिर में दर्शन के बाद बैकपैक्स पानी और स्नैक्स रख कर चढ़ाई शुरू की हमने। आप भी जब जाएं तो अपने साथ पानी एवम स्नैक्स साथ ले जाना न भूलें, क्योंकि एक बार ट्रेक शुरू होने के बाद कुछ भी नही मिलेगा।

ट्रेक बहुत आसान तो नही किन्तु कठिनाई का स्तर मध्यम कह सकते हैं। हर्षनाथ का ट्रैक इससे काफी आसान है। इस ट्रैक पर काफी समय से रख रखाव न होने एवम पर्यटकों की कम आवाजाही के कारण इस ट्रैक पर पत्थर उबड़ खाबड़ भी हैं, कुछ स्थानों पर उखड़ भी गए हैं, और कमजोर पत्थरों पर पॉंव रखने पर लुढ़कने फिसलने का खतरा तो है ही, खड़ी चढ़ाई एवम बीच बीच मे पगडंडियों पर अतिक्रमण करती हुई कंटीली झाड़ियां कठिनाई का स्तर एवम रोमांच दोनों को बढ़ा कर अगले स्तर पर पहुंचा देती हैं।

एक बार ट्रेक शुरू करने के बाद जैसे जैसे ऊपर चढ़ते हैं, और घुमावदार पगडंडियों को पार करने के बाद ज्यूँ ही किला दिखाई देना शुरू होता है तो रोमांच का स्तर बढ़ना शुरू होता है, और जब किले का झाड़ियों से आच्छादित और वक्त के हाथों धूल धूसरित मुख्यद्वार दिखाई देता है तो शायद वही अनुभूति होती है जो एडमंड हिलेरी को एवेरेस्ट पर पहुंच कर हुई होगी। इस दरवाजे में बनी तिबारी में कई वर्षों से जमी धुल की परतें, नमी, जाले, चमगादड़ों की गंध और भूतकाल की धरोहर को न संजो रख पाने की एक मिली जुली से अनुभूति महसूस होती है।....!!!
(शेष, अगले पार्ट-3 में)
© Dr. CA. Sunil Sharma

देवगढ़ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:(पार्ट-1 परिचय)सीकर से हर्षनाथ जाते हुए हर्षनाथ से कुछ किमी पहले, बांयी और पहाड़ी पर एक किला /...
10/07/2023

देवगढ़ किला एवम देवगढ़ ट्रेक:
(पार्ट-1 परिचय)
सीकर से हर्षनाथ जाते हुए हर्षनाथ से कुछ किमी पहले, बांयी और पहाड़ी पर एक किला / दुर्ग दिखाई देना शुरू होता है, जो हर्ष के पहाड़ पर से भी दिखाई देता है। इस किले का नाम है देवगढ़ का किला / दुर्ग, जिसे हमारे यहां की स्थानीय भाषा मे गढ़ भी कहते हैं। इतिहासकारों के अनुसार सीकर के रावराजा देवीसिंह जी ने सन 1787, मे ऊंची पहाड़ी पर, इस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किले का निर्माण करवाया था, इसलिए इसका नाम देवगढ़ रखा गया।

सीकर से हर्ष जाने वाली सड़क पर, सीकर से लगभग 9-10 किमी पर एक छोटी सड़क देवगढ़ गांव के लिए निकलती है, जो हमे देवगढ़ किले के पहाड़ की तलहटी तक ले जाती है। वहां से शुरू होती देवगढ़ किले की ट्रेक। देवगढ़ की ट्रेक मध्यम कठिनाई वाली ट्रेक है और 45 मिनेट से एक घण्टे में चढ़ाई पूरी होती है। चढ़ाई समाप्ति पश्चात दिखाई देने वाले भूतकाल के ऐतिहासिक अवशेष, किले के भव्यता, आसपास की अरावली पहाड़ियां, नीला आसमान और सुदूर क्षितिज पर दृष्टिगोचर होते सीकर एवम आसपास के गांव के सुंदर दृश्य निश्चित रूप से मनमोहक एवम यादगार होते हैं।

हर्षनाथ अपने प्राचीन मंदिर के कलात्मक भग्नावशेष, शिव मन्दिर एवम प्राकृतिक अवलोकन स्थान के रूप में काफी प्रसिद्ध है। पर्यटक और सीकरवासी यहां घूमने और ट्रैकिंग के लिए जाते हैं, किन्तु सड़क के बांयी और ऊंची पहाड़ी से यह देवगढ़ किला अकेला बैठा मायूसी से ताकता रहता है। पर अब धीरे धीरे देवगढ़ की लोकप्रियता बढ़ रही है। तो आइए ले चलते हैं आप को भी, देवगढ़ की अनूठी ट्रेक पर। आने वाली पोस्ट में जानकारी और फ़ोटो, दोनों शेयर की जाएंगी।
© Dr. CA Sunil Sharma

Kya ye sahi Baat ha ??
25/05/2023

Kya ye sahi Baat ha ??

आइए, जानें हर्षनाथ के बारे में...!!!हर्ष पर्वत पर हम सब सीकर वाले लोग जाते रहते हैं, और सीकर आने वाले सैलानियों को भी ले...
21/09/2022

आइए, जानें हर्षनाथ के बारे में...!!!

हर्ष पर्वत पर हम सब सीकर वाले लोग जाते रहते हैं, और सीकर आने वाले सैलानियों को भी ले जाते रहते हैं। पर्यटन के लुत्फ के साथ मंदिर में शिवलिंग एवम पास ही स्थित भैरों जी की पूजन अर्चन भी कर आते हैं। लेकिन, शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इस पहाड़ी को हर्ष व यहां के शिव मंदिर को हर्षनाथ के नाम से क्यों पुकारा जाता है? यहां पर दो शिव मंदिरों का निर्माण क्यों हुआ तथा यह एतिहासिक मंदिर मुगल बादशाह औरंगजेब के निशाने पर कैसे आया?

मंदिर का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व एवम भगवान शिव के दुर्लभतम पंचमुखी व विश्व के एकमात्र लिंगोद्भव की मूर्ति की जानकारी भी बहुत कम लोगों को होगी। आज आपको हर्ष के इन महादेव मंदिरों का पूरा रहस्य उजागर करतें है। जो पूजा- पाठ, पुराण व पुरातत्व तीनों लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।

हर्ष में थी विश्व की एकमात्र लिंगोद्भव मूर्ति, और आज भी मौजूद है दुर्लभतम पंचमुखी शिव और अर्धनारीश्वर गणेश जी।

हर्ष एवम हर्षनाथ नामकरण के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है। शिवपुराण में जिक्र है कि त्रिपुर राक्षस ने इंद्र व अन्य देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। शिलालेख के अनुसार तब देवताओं ने इसी पहाड़ी पर शरण ली थी। इसके बाद जब भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस का अंत किया तो प्रसन्न हुए देवताओं ने इसी पहाड़ी पर भगवान शिव की स्तुति की थी। चूंकि देवताओं ने बहुत हर्ष के साथ यह स्तुति की थी। ऐसे में इस पहाड़ी का नाम हर्ष व यहां स्थापित शिव हर्षनाथ कहलाए।

रानोली के एक ब्राह्मण के आग्रह पर 1048 साल पहले बना था मंदिर। प्रागैतिहासिक काल का शिव मंदिर संवत एक हजार में अजमेर सांभर के चौहान वंश के शासक सिंहराज के क्षेत्राधिकार में था। जय हर्षनाथ- जय जीण भवानी पुस्तक के लेखक महावीर पुरोहित लिखते हैं कि इस काल में रानोली का नाम रणपल्लिका था। यहां के एक ब्राह्मण सुहास्तु रोजाना पैदल चलकर इस पर्वत पर शिव आराधना किया करते थे। इन्हीं सुहास्तु के कहने पर राजा सिंहराज से हर्ष पर हर्षनाथ मंदिर निर्माण व वहां तक पहुंचने के लिए सुगम रास्ते की मांग की। इस पर महाराज सिंहराज ने विक्रम संवत 1018 में हर्षनाथ मंदिर की नींव रखी और पहाड़ की गोद में एक नगर बसाया। जिसका नाम हर्षा नगरी रखा गया। यही आज हर्ष गांव कहलाता है। इतिहासकार डा. सत्यप्रकाश ने इसे अनन्ता नगरी भी कहा। यहां सदा बहने वाली चंद्रभागा नदी भी थी। मंदिर का निर्माण सुहास्तु के सलाहकार सांदीपिता के मार्गदर्शन में वास्तुकार वाराभद्र ने वैज्ञानिक ढंग से किया था।

हर्ष मंदिर में लिंगोद्भव की मूर्ति भी प्रतिष्ठित की गई थी। जो विश्व की एकमात्र मूर्ति थी। जो अब अजमेर के संग्रहालय में स्थित है। वहीं, हर्ष पर भगवान शिव की पंचमुखी मूर्ति अब भी विराजित है। जो भी दुर्लभतम मानी जाती है। संभवतया यह प्रदेश की एकमात्र व सबसे प्राचीन शिव प्रतिमा है। पुराणों में जिक्र है कि भगवान विष्णु के मनोहारी किशोर रूप को देखने के लिए भगवान शिव का यह रूप सामने आया था। इसी मंदिर प्रांगण मे, पास ही के भैरव मंदिर में अर्धनारीश्वर गणेश शायद विश्व की एकमात्र प्रतिमा है जो इस रूप में है।

इसलिए पंचाचन कहलाए शिव:
भगवान शिव के पांच मुंह पंचतत्व यानी जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति व जगत कल्याण की कामना से विभिन्न कल्पों में हुए उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार के प्रतीक माने जाते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु का मनोहारी किशोर रूप देखने के लिए भी भगवान शिव इस रूप में प्रकट हुए थे। पांच मुखों के कारण शिव 'पंचानन और 'पंचवक्त्र' कहलाते हैं।

मंदिर के प्रकाश ने खींचा औरंगजेब का ध्यान:
इतिहासकारों का कहना है कि प्राचीन शिव मंदिर पर एक विशाल दीपक जलता था। जिसे जंजीरों व चरखी के जरिये ऊपर चढ़ाया जाता था। इस दीपक का प्रकाश सैंकड़ों किलोमीटर दूर से देखा जा सकता था। इसी प्रकाश को औरंगजेब ने देखा था। जिसने खंडेला अभियान के दौरान संवत 1739 में इस पर आक्रमण कर खंडित कर दिया था।

राव शिवसिंह ने बनवाया दूसरा मंदिर:
औरंगजेब के आक्रमण के बाद संवत 1781 में हर्ष पर दूसरा शिव मंदिर बना। जिसे सीकर के शासक राव शिव सिंह ने महात्मा शिवपुरी के आदेश पर बनवाया था। कहा जाता है कि महात्मा शिवपुरी के आशिर्वाद से ही शिव सिंह का जन्म हुआ था।
देश- विदेश के म्यूजियम में हर्ष की मूर्तियां
हर्ष की मूर्तियों का महत्व देश- विदेश के कई संग्रहालयों में इनके संगहण से भी समझा जा सकता है। सीकर के श्रीहरदयाल म्यूजियम के अलावा दिल्ली के राजपूताना संग्रहालय, अमेरिका के क्लीव लैण्ड ऑफ आर्ट तथा नेल्सन एटकिन्स गैलेरी तथा फिलेडोल्फिया म्यूजियम ऑफ आर्ट पेरिस के रोवर्ट रूसो के निजी संग्रह में में हर्ष की मूर्तियां है।
लिंगोद्भव मूर्ति अजमेर के संग्रहालय में है। यहां के कसौटी पत्थर की मूर्ति विदेशी ले गए।

आज भी होता है अभिषेक:
पंचमुखी शिव की प्रतिमा की पूजा अर्चना अब भी लगातार जारी है। मंदिर के विजय पुजारी का कहना है कि जाट समाज में पूनियां गोत्र की धोक आज भी इसी मंदिर में लगती है। सावन व शिवरात्रि पर मूर्ति का अभिषेक भी किया जाता है। महाशिवरात्रि पर भक्तों की विशेष भीड़ के अलावा लगभग प्रतिदिन श्रद्धालु, प्रातः भ्रमणकर्ता एवम सैलानियों की भीड़ जुटती है।

यातायात, सड़क एवम ट्रेक मार्ग से पहुंचने की सुविधा:
हर्षनाथ मंदिर सीकर से लगभग 15 किमी पर स्थित है, और यहां सांवली होते हुए तलहटी तक और फिर पहाड़ी घाट की सड़क से भी पहुंच सकते हैं, किन्तु ज्यादा लोकप्रिय है तलहटी से ट्रैकिंग का रास्ता, और प्रत्येक सुबह लोग यहां सैर के लिए भी जाते हैं, किन्तु सप्ताहांत में ट्रेकर्स एवम सैलानियों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। ट्रेक की पगडंडी पत्थर जमा कर बनाई गई है और कुछ ज्यादा मुश्किल नही है। घुमावदार पगडंडी पर चढ़ते हुए आसपास के गांवों, पहाड़ों और सीकर शहर के दिलकश नजारे भी दिखाई देते हैं।

दृश्य, वातावरण एवम ऐतिहासिक पुरातन धरोहरें:
ट्रेक पूरा करके जैसे ही पहाड़ के ऊपर पहुंचते हैं तो समतल सी जगह पर काफी सारी पवनचक्कियां घूम घूम कर विद्युत निर्माण में व्यस्त मिलेंगी और काफी सारे काले मुंह के लंगूरों के झुंड आपसे कुछ खाद्य पदार्थ की आशा के भाव चेहरे पर लिए मासूम निगाहों से आपका स्वागत करते मिलेंगे, और आपकी मंजिल के रूप में लगभग 400 मीटर पर दिखाई देगा मंदिर का शिखरबन्ध।

नजदीक पहुंचने पर पुरातत्व विभाग के बोर्ड आपका स्वागत करते हैं, एक तरफ बड़ा से मंदिर जो नया बना हुआ है, सीढियां चढ़ कर वहां दर्शन एवम अभिषेक करते हुए ऊंचाई की हवा खाते हुए वहां से चारों तरफ के विहंगम दृश्य का आनंद उठा सकते हैं।

मंदिर के ही एक तरफ एक टूट फूटा सा खंडहर नुमा मंदिर दिखाई देता है, जो कि असली हर्षनाथ मंदिर है। इस मंदिर के खंभे, छत एवम सब तरफ बनी हुई शानदार मूर्तियां और नक्काशी, आततायियों के नष्ट करने के प्रयासों के बावजूद अब तक बच कर, बिना कुछ बोले ही इस जगह के आध्यत्मिक एवम ऐतीहासिक भूतकाल की कहानियां सुना रही है। प्रांगण में भी काफी सारी मूर्तियां और मंदिर के पुरातन अवशेष बिखरे पड़े हैं, जब कि काफी सारी मूर्तियां यहां से बाहर जाकर देश विदेश के विभिन्न संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही है। मुमकिन है कि भूतकाल की काफी सारी धरोहर मूर्तिचोरों ने भी चुरा कर बेच डाली हो। लेकिन फिर भी अतीत के झरोखों से झांक कर यहां गौरवशाली इतिहास हमे चारों तरफ नजर आता है।

इसी प्रांगण में एक प्राचीन जलाशय के साथ साथ एक और प्राचीन मंदिर है, भैरों जी का। वहां भी प्राचीन मूर्तियां, खंभे और कलाकृतियां बिखरी, और कच्ची पक्की दीवारों में चुनी पड़ी है। किंतु इस मंदिर में अर्धनारीश्वर गणेश की अनूठी प्राचीन मूर्ति है, जो संभवतः गणेश जी के इस स्वरूप की एकमात्र मूर्ति है। इसलिए कला एवम पुरातत्व की दृष्टि से इस मूर्ति का अलग ही महत्व है।

प्राकृतिक सौंदर्य एवम पर्यटन:
रोमांच एवम नैसर्गिक पर्यटन की दृष्टि से भी यह एक ऐसी ट्रेक है जो कहीं कहीं खड़ी चढ़ाई और उखड़ती पगडण्डी के पत्थरों के कारण कठिन हो जाती है, अन्यथा आसान सी है। पूरे वर्ष मंद मंद बयार बह कर ताजगी फैलाती रहती है। सूर्योदय एवम सूर्यास्त के रंग आसमान में फैलते हैं तो यहां के नजारे बड़े ही मनमोहक बन जाते हैं। वर्षा ऋतु में यह सुरम्य स्थान स्वर्ग से कम नही रहता, कभी कभी तो हल्की फुहारों में भीगने का अलग ही मजा और कभी ऐसा लगता है हम बादलों के लोक में ही विचरण कर रहे हैं। पहाड़ की वनस्पति पर चहचहाते नाना प्रकार के पक्षी एवम उछलते खेलते लंगूर यहां के प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं।

आध्यात्मिक, पौराणिक, धार्मिक, वास्तुकला, स्थापत्य, इतिहासिक एवम रोमांचकारी पर्यटन के अनूठे मिश्रण वाली इस धरोहर में आपका भी स्वागत है। आइए, इस स्थान का आनंद लें एवम आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संजो कर रखने के प्रयासों में सहभागी बने।

-डॉ सीए सुनील शर्मा, मुम्बई/सीकर

26/12/2021

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