08/09/2026
लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली अर्थ है—सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार, गलत नीतियों का विरोध करने की स्वतंत्रता और अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाने का साहस।
लेकिन जब सत्ता बेलगाम होने लगे, जब सवाल पूछने वालों को दुश्मन समझा जाने लगे, जब आलोचना को अपराध और असहमति को देशद्रोह बताने की कोशिश होने लगे, तब चुप रहना लोकतंत्र की मदद नहीं करता।
ऐसे समय में आवाज़ें थोड़ी तेज़ करनी पड़ती हैं।
आवाज़ तेज़ करने का मतलब हिंसा या अराजकता नहीं है। इसका मतलब है—अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना, संविधान के मूल्यों के साथ खड़े रहना और सत्ता से लगातार जवाब मांगना।
सत्ता जनता ने दी है, इसलिए सत्ता जनता से ऊपर नहीं हो सकती। कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती, लेकिन संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएं और नागरिकों के अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं।
जब बेरोजगारी पर सवाल हो तो सवाल होना चाहिए।
जब महंगाई परेशान करे तो सवाल होना चाहिए।
जब शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर हो तो सवाल होना चाहिए।
जब किसी नागरिक के साथ अन्याय हो तो आवाज़ उठनी चाहिए।
और जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हों, तब समाज का जागरूक होना और भी जरूरी हो जाता है।
इतिहास गवाह है कि बड़े बदलाव हमेशा कुछ जागरूक लोगों की आवाज़ से शुरू हुए हैं। अगर हर व्यक्ति यह सोचकर चुप हो जाए कि “मेरी अकेली आवाज़ से क्या होगा?” तो अन्याय को मजबूत होने का अवसर मिल जाता है।
एक आवाज़ दूसरी आवाज़ से जुड़ती है, फिर वही आवाज़ जनआवाज़ बन जाती है।
इसलिए लोकतंत्र में नागरिक का काम केवल वोट डालना नहीं है। वोट देने के बाद भी सरकार से सवाल पूछना, नीतियों पर बहस करना और गलत को गलत कहना नागरिक जिम्मेदारी है।
सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे यह याद दिलाते रहना चाहिए कि अंतिम शक्ति जनता के पास है।
हमें किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि निरंकुशता के खिलाफ खड़ा होना है। हमें किसी पार्टी की अंधभक्ति नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा रखनी है।
क्योंकि जिस दिन जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, उसी दिन सत्ता जवाबदेही से दूर होने लगती है।
इसलिए—
जब सत्ता बेलगाम हो जाए,
तो आवाज़ें थोड़ी तेज़ करनी पड़ती हैं।
लेकिन हमारी आवाज़ में नफरत नहीं, तर्क होना चाहिए।
हमारे विरोध में हिंसा नहीं, लोकतांत्रिक साहस होना चाहिए।
हमारे संघर्ष में बदले की भावना नहीं, न्याय की मांग होनी चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे मजबूत हथियार किसी व्यक्ति की ताकत नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की निर्भीक आवाज़ होती है।
Ankesh Jata