10/10/2026
7,347 का मानदेय… और कुर्सी के लिए लाखों की होड़!
“मानदेय है थोड़ा, मगर रुतबा है भारी,
कुर्सी के आगे फीकी पड़ जाए नौकरी सारी।
सात हजार में महीने का गुजारा मुश्किल है जनाब,
फिर सरपंच बनने को क्यों मचता है इतना हिसाब?”
राजस्थान में ग्राम पंचायत के सरपंच को 1 अप्रैल 2026 से ₹7,347 प्रतिमाह मानदेय मिल रहा है। यानी सालभर में कुल ₹88,164।
30 दिन के हिसाब से देखें तो करीब ₹245 प्रतिदिन।
अब जरा ठहरकर सोचिए...
इतने में आजकल शहर में ढंग की एक प्लेट खाना भी मुश्किल है, लेकिन गांव में सरपंच की कुर्सी के लिए ऐसा उत्साह कि चुनाव आते ही लगता है जैसे सरकार ने पद के साथ कोई “गुप्त खजाने की चाबी” भी बांटने का ऐलान कर दिया हो!
सवाल सीधा है—
जब मानदेय ₹7,347 है, तो फिर सरपंच बनने की इतनी मारामारी आखिर क्यों?
गांव की चौपाल से लेकर चाय की थड़ी तक चर्चा शुरू।
कौन खड़ा होगा?
किसके कितने वोट हैं?
कौन किसके साथ है?
किसका परिवार कितना मजबूत है?
किसके रिश्तेदार कितने गांवों में सक्रिय हैं?
और कौन किसके घर जाकर अभी से “राम-राम सा” कर रहा है?
चुनाव की तारीख दूर होती है, लेकिन सरपंच की कुर्सी के सपने बहुत पहले से गर्म होने लगते हैं।
कहीं चाय पर रणनीति बनती है, कहीं चौपाल पर समीकरण बैठते हैं, कहीं रिश्तेदारों की बैठक होती है और कहीं आधी रात तक मोबाइल पर “गोपनीय राजनीतिक चर्चा” चलती है।
मानदेय देखकर तो लगता है—यह पद कमाई का नहीं, सेवा का है।
लेकिन चुनावी जुनून देखकर कभी-कभी लगता है—
सेवा तो बहाना है साहब… कुर्सी का आकर्षण कुछ ज्यादा ही पुराना है!
क्योंकि सरपंच बनते ही गांव में सिर्फ नाम के आगे “सरपंच” नहीं जुड़ता, बल्कि उसके साथ जुड़ता है सामाजिक रसूख, पहचान, प्रभाव और गांव के कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका।
यही वह “अदृश्य पैकेज” है, जिसका कोई सरकारी विज्ञापन नहीं निकलता, लेकिन चुनावी मैदान में उसकी कीमत खूब दिखाई देती है।
व्यंग्य में कहें तो—
सरकार देती है ₹7,347,
लेकिन गांव की राजनीति में सरपंच की कुर्सी का ‘भाव’ कई बार लाखों में आंका जाता है!
और यही तो हमारे गांव की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
एक तरफ कहा जाता है—
“सरपंच तो गांव की सेवा करने के लिए बनना चाहिए।”
दूसरी तरफ चुनाव आते ही सवाल उठने लगता है—
“कौन कितना खर्च करेगा?”
“किसके पास कितने समर्थक हैं?”
“किसका प्रभाव ज्यादा है?”
“किसके पक्ष में कौन सा गुट है?”
सेवा की बात पीछे छूट जाती है और समीकरण आगे आ जाते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि हर उम्मीदवार को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं। बहुत से लोग वास्तव में गांव के विकास, ग्रामीणों की समस्याओं और सार्वजनिक हित के लिए चुनाव लड़ते हैं।
लेकिन सवाल उन लोगों से जरूर है, जिनके लिए सरपंची सेवा नहीं, प्रतिष्ठा का तमगा बन जाती है।
क्योंकि सरपंच का पद कोई आरामकुर्सी नहीं है।
गांव की सड़क से लेकर नाली तक, पानी से लेकर सफाई तक, विकास कार्यों से लेकर सरकारी योजनाओं तक और ग्रामीणों की छोटी-बड़ी समस्याओं से लेकर प्रशासनिक समन्वय तक—जिम्मेदारियां कम नहीं हैं।
मानदेय जेब में ₹7,347,लेकिन जिम्मेदारियां हजारों लोगों की!
फिर भी चुनावी मौसम में दावेदारों की संख्या देखकर लगता है जैसे सरकार ने घोषणा कर दी हो—
“आइए, सरपंच बनिए और जीवन बदल डालिए!”
कोई गांव बदलने का सपना लेकर आता है।
कोई विकास का संकल्प लेकर।
कोई सेवा की भावना लेकर।
और कोई शायद मन ही मन कहता है—
“पहले कुर्सी तो मिले… बाकी हिसाब बाद में देखेंगे!”
असल बात यह है कि ₹88,164 सालाना मानदेय को देखकर सरपंच पद को बड़ी आर्थिक कमाई का जरिया समझना तर्कसंगत नहीं है।
लेकिन इसकी सामाजिक हैसियत, स्थानीय प्रभाव और निर्णयों में भूमिका इसे गांव की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण बना देती है।
और शायद यही कारण है कि—
मानदेय छोटा है, मगर कुर्सी का आकर्षण बड़ा है।
आखिर—
“सात हजार का मानदेय किसे लुभाएगा,
कुर्सी का रुतबा ही तो गांव में रंग जमाएगा।
जेब में कम आए, कोई बात नहीं जनाब,
नाम के आगे ‘सरपंच’ लग जाए—तो बात ही कुछ और है साहब!”
तो सवाल आज भी वहीं खड़ा है—
आखिर सरपंच बनने की होड़ ₹7,347 के लिए है… या उस कुर्सी से मिलने वाले रुतबे, प्रभाव और पहचान के लिए?
क्योंकि...
₹7,347 महीने की बात है साहब,
लेकिन सरपंच की कुर्सी की बात आते ही
गांव में कई दिल एक ही आवाज लगाते हैं—
“मानदेय रहने दो… पहले कुर्सी दिखाओ!”
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