Nourat mal verma

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YouTuber, blogger, reporter

संस्थापक:-मानव मित्र मण्डल सेवा संस्थान मालपुरा

एडवोकेट नोरत मल वर्मा:- अपर जिला एवं सेशन न्यायालय मालपुरा
संस्थापक/अध्यक्ष:- मानव मित्र मण्डल सेवा संस्थान मालपुरा
जिला मंत्री भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा टोंक
जिला उपाध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ अखिल भारतीय रेगर महासभा टोंक
निवास:-लाम्बाहरिसिंह मालपुरा टोंक

10/10/2026

7,347 का मानदेय… और कुर्सी के लिए लाखों की होड़!

“मानदेय है थोड़ा, मगर रुतबा है भारी,
कुर्सी के आगे फीकी पड़ जाए नौकरी सारी।
सात हजार में महीने का गुजारा मुश्किल है जनाब,
फिर सरपंच बनने को क्यों मचता है इतना हिसाब?”

राजस्थान में ग्राम पंचायत के सरपंच को 1 अप्रैल 2026 से ₹7,347 प्रतिमाह मानदेय मिल रहा है। यानी सालभर में कुल ₹88,164।

30 दिन के हिसाब से देखें तो करीब ₹245 प्रतिदिन।

अब जरा ठहरकर सोचिए...
इतने में आजकल शहर में ढंग की एक प्लेट खाना भी मुश्किल है, लेकिन गांव में सरपंच की कुर्सी के लिए ऐसा उत्साह कि चुनाव आते ही लगता है जैसे सरकार ने पद के साथ कोई “गुप्त खजाने की चाबी” भी बांटने का ऐलान कर दिया हो!

सवाल सीधा है—
जब मानदेय ₹7,347 है, तो फिर सरपंच बनने की इतनी मारामारी आखिर क्यों?
गांव की चौपाल से लेकर चाय की थड़ी तक चर्चा शुरू।
कौन खड़ा होगा?
किसके कितने वोट हैं?
कौन किसके साथ है?
किसका परिवार कितना मजबूत है?
किसके रिश्तेदार कितने गांवों में सक्रिय हैं?
और कौन किसके घर जाकर अभी से “राम-राम सा” कर रहा है?
चुनाव की तारीख दूर होती है, लेकिन सरपंच की कुर्सी के सपने बहुत पहले से गर्म होने लगते हैं।

कहीं चाय पर रणनीति बनती है, कहीं चौपाल पर समीकरण बैठते हैं, कहीं रिश्तेदारों की बैठक होती है और कहीं आधी रात तक मोबाइल पर “गोपनीय राजनीतिक चर्चा” चलती है।
मानदेय देखकर तो लगता है—यह पद कमाई का नहीं, सेवा का है।
लेकिन चुनावी जुनून देखकर कभी-कभी लगता है—
सेवा तो बहाना है साहब… कुर्सी का आकर्षण कुछ ज्यादा ही पुराना है!

क्योंकि सरपंच बनते ही गांव में सिर्फ नाम के आगे “सरपंच” नहीं जुड़ता, बल्कि उसके साथ जुड़ता है सामाजिक रसूख, पहचान, प्रभाव और गांव के कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका।
यही वह “अदृश्य पैकेज” है, जिसका कोई सरकारी विज्ञापन नहीं निकलता, लेकिन चुनावी मैदान में उसकी कीमत खूब दिखाई देती है।
व्यंग्य में कहें तो—
सरकार देती है ₹7,347,
लेकिन गांव की राजनीति में सरपंच की कुर्सी का ‘भाव’ कई बार लाखों में आंका जाता है!
और यही तो हमारे गांव की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

एक तरफ कहा जाता है—
“सरपंच तो गांव की सेवा करने के लिए बनना चाहिए।”
दूसरी तरफ चुनाव आते ही सवाल उठने लगता है—
“कौन कितना खर्च करेगा?”
“किसके पास कितने समर्थक हैं?”
“किसका प्रभाव ज्यादा है?”
“किसके पक्ष में कौन सा गुट है?”
सेवा की बात पीछे छूट जाती है और समीकरण आगे आ जाते हैं।

हालांकि यह भी सच है कि हर उम्मीदवार को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं। बहुत से लोग वास्तव में गांव के विकास, ग्रामीणों की समस्याओं और सार्वजनिक हित के लिए चुनाव लड़ते हैं।

लेकिन सवाल उन लोगों से जरूर है, जिनके लिए सरपंची सेवा नहीं, प्रतिष्ठा का तमगा बन जाती है।

क्योंकि सरपंच का पद कोई आरामकुर्सी नहीं है।

गांव की सड़क से लेकर नाली तक, पानी से लेकर सफाई तक, विकास कार्यों से लेकर सरकारी योजनाओं तक और ग्रामीणों की छोटी-बड़ी समस्याओं से लेकर प्रशासनिक समन्वय तक—जिम्मेदारियां कम नहीं हैं।

मानदेय जेब में ₹7,347,लेकिन जिम्मेदारियां हजारों लोगों की!

फिर भी चुनावी मौसम में दावेदारों की संख्या देखकर लगता है जैसे सरकार ने घोषणा कर दी हो—

“आइए, सरपंच बनिए और जीवन बदल डालिए!”
कोई गांव बदलने का सपना लेकर आता है।
कोई विकास का संकल्प लेकर।
कोई सेवा की भावना लेकर।
और कोई शायद मन ही मन कहता है—

“पहले कुर्सी तो मिले… बाकी हिसाब बाद में देखेंगे!”

असल बात यह है कि ₹88,164 सालाना मानदेय को देखकर सरपंच पद को बड़ी आर्थिक कमाई का जरिया समझना तर्कसंगत नहीं है।
लेकिन इसकी सामाजिक हैसियत, स्थानीय प्रभाव और निर्णयों में भूमिका इसे गांव की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण बना देती है।
और शायद यही कारण है कि—
मानदेय छोटा है, मगर कुर्सी का आकर्षण बड़ा है।

आखिर—

“सात हजार का मानदेय किसे लुभाएगा,
कुर्सी का रुतबा ही तो गांव में रंग जमाएगा।
जेब में कम आए, कोई बात नहीं जनाब,
नाम के आगे ‘सरपंच’ लग जाए—तो बात ही कुछ और है साहब!”

तो सवाल आज भी वहीं खड़ा है—
आखिर सरपंच बनने की होड़ ₹7,347 के लिए है… या उस कुर्सी से मिलने वाले रुतबे, प्रभाव और पहचान के लिए?

क्योंकि...
₹7,347 महीने की बात है साहब,
लेकिन सरपंच की कुर्सी की बात आते ही
गांव में कई दिल एक ही आवाज लगाते हैं—

“मानदेय रहने दो… पहले कुर्सी दिखाओ!”
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मेरे अकेले के प्रयास से समाज नहीं बदल सकता, लेकिन मैं कोशिश इसलिए करता हूँ, क्योंकि पानी में हलचल मचाने के लिए एक पत्थर ...
09/10/2026

मेरे अकेले के प्रयास से समाज नहीं बदल सकता, लेकिन मैं कोशिश इसलिए करता हूँ, क्योंकि पानी में हलचल मचाने के लिए एक पत्थर ही काफी है। ✊💙

🙏 दलित, शोषित, वंचित एवं पिछड़े समाज के हक़, सम्मान और स्वाभिमान की आवाज़, बहुजन आंदोलन के महानायक मान्यवर श्री कांशीराम जी की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि एवं कोटि-कोटि नमन।💐

आपके विचार, आपका संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन का आपका संकल्प सदैव बहुजन समाज को जागरूक, संगठित और संघर्षशील रहने की प्रेरणा देता रहेगा।

💙 **मान्यवर कांशीराम जी अमर रहें!** 💙

💐💐🙏
#नोरत_मल_वर्मा_लाम्बाहरिसिंह #
#मान्यवर_कांसीराम_साहेब
#बहुजन_नायक

06/10/2026

“कुर्सी की चाह में रिश्ते न तोड़ना,
गाँव की खातिर अपना जमीर न छोड़ना।
वोट तो पाँच साल में एक बार आएगा,
पर चुना हुआ सरपंच पूरे पाँच साल याद आएगा।”

सरपंच का चुनाव सिर्फ एक कुर्सी का चुनाव नहीं, बल्कि गाँव के भविष्य का फैसला है। चुनाव के समय मीठे वादे, हाथ जोड़कर सलाम और बड़े-बड़े दावे करना आसान है, लेकिन असली परीक्षा चुनाव जीतने के बाद होती है।

गाँव को ऐसा सरपंच चाहिए जो जाति, धर्म और निजी रिश्तों से ऊपर उठकर हर परिवार की आवाज सुने। जो सरकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचाए, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार को जगह न दे और पंचायत को अपनी निजी जागीर न समझे।

मतदाताओं को भी इस बार भावनाओं में नहीं, बल्कि काम, ईमानदारी और क्षमता के आधार पर वोट करना होगा। याद रखिए—गलत व्यक्ति को दिया गया एक वोट पाँच साल की परेशानी बन सकता है।

सरपंच चुनिए चेहरा देखकर नहीं, चरित्र देखकर;
वादा सुनकर नहीं, पिछला काम देखकर।

🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳

#गाँव_का_विकास #सरपंच_चुनाव #पंचायत_चुनाव #जागरूक_मतदाता #सही_सरपंच #ईमानदार_नेतृत्व #गाँव_का_भविष्य #वोट_की_ताकत #मतदाता_जागरूकता #लोकतंत्र #गाँव_की_आवाज़ #विकास_की_सोच #ईमानदारी #जनहित #पंचायत_विकास #मेरा_वोट_मेरी_आवाज़ िन्द

 #लाम्बाहरिसिंह की राजनीति के शिखर पुरुष,हम सब के आदरणीय,पूर्व सरपंच  #रामलाल_जी_लड्ढा साहब बाऊजी को जन्मदिन की हार्दिक ...
06/10/2026

#लाम्बाहरिसिंह की राजनीति के शिखर पुरुष,हम सब के आदरणीय,पूर्व सरपंच #रामलाल_जी_लड्ढा साहब बाऊजी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
आपका आशीर्वाद ओर मार्गदर्शन मिलता रहे बाऊजी।
Ramlal Laddha

#नोरत_मल_वर्मा_लाम्बाहरिसिंह


🎈🎈🎂🍫🎉🎈🎈
🎈🎈🎂🍫🎉🎈🎈

03/10/2026

🔥 पंचायत चुनाव का बिगुल: अब गांव की सरकार चुनने की बारी

नगर निकाय चुनाव के बाद अब चुनावी रथ पंचायत राज की ओर बढ़ चुका है। गांवों में सरपंच पद के दावेदारों की हलचल तेज होगी और चौपालों से लेकर गलियों तक चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू होगा। लेकिन इस बार असली परीक्षा केवल उम्मीदवारों की नहीं, मतदाताओं की समझ और जागरूकता की भी होगी।

साझा किए गए कार्यक्रम के अनुसार पंचायत चुनाव चार चरणों में होंगे—

🔹 प्रथम चरण: 8 अक्टूबर से नामांकन शुरू, 24 अक्टूबर अंतिम तिथि, 25 अक्टूबर मतदान व परिणाम।

🔹 द्वितीय चरण: 13 अक्टूबर से नामांकन, 30 अक्टूबर अंतिम तिथि, 31 अक्टूबर मतदान व परिणाम।

🔹 तृतीय चरण: 19 अक्टूबर से नामांकन, 5 नवंबर अंतिम तिथि, 6 नवंबर मतदान व परिणाम।

🔹 चतुर्थ चरण: 31 अक्टूबर से नामांकन, 15 नवंबर अंतिम तिथि, 16 नवंबर मतदान व परिणाम।

अब गांव की चौपाल पर सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि “कौन चुनाव लड़ रहा है?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “कौन गांव की समस्याओं को समझता है, कौन विकास का स्पष्ट रोडमैप रखता है और कौन जनता के बीच उपलब्ध रहेगा?”

चुनाव के मौसम में पोस्टर बड़े हो सकते हैं, वादे बड़े हो सकते हैं, प्रचार का शोर भी बड़ा हो सकता है—लेकिन लोकतंत्र में फैसला मतदाता की समझ से बड़ा कोई पोस्टर नहीं होता।

इस बार चुनाव केवल सरपंच चुनने का नहीं, बल्कि अगले कार्यकाल के लिए गांव की दिशा तय करने का अवसर है।

सोचिए, परखिए और अपने मताधिकार का जिम्मेदारी से प्रयोग कीजिए। 🇮🇳

#पंचायत_चुनाव #सरपंच_चुनाव #गांव_की_सरकार #मतदाता_जागरूकता #लोकतंत्र

02/10/2026

“एक कचोरी, दो समोसा…
मर्दों, तुम्हारा क्या भरोसा?”
महिला सुरक्षा की चिंता बिल्कुल जायज़ है। हर महिला को बिना डर, सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। **लेकिन सुरक्षा के नाम पर हर पुरुष को शक की निगाह से देखना भी समाधान नहीं है।**

जिस पिता ने बेटी को उंगली पकड़कर चलना सिखाया,
जिस भाई ने बहन की मुश्किल में ढाल बनकर साथ दिया,
जिस पति ने पत्नी के सपनों के लिए अपने सुखों का त्याग किया,जिस बेटे ने मां-बाप के लिए दिन-रात मेहनत की—
क्या इन सबका भी कोई भरोसा नहीं?
महिला सुरक्षा का मतलब सिर्फ खतरे से बचाना नहीं; इसका मतलब है-सम्मानजनक माहौल, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, प्रभावी कानून, त्वरित कार्रवाई और पुरुषों की जिम्मेदार भागीदारी।
गलत करने वाले का विरोध होना चाहिए—चाहे वह कोई भी हो।
लेकिन कुछ लोगों के गलत आचरण की कीमत पूरे पुरुष समाज को संदेह के घेरे में रखकर नहीं चुकाई जा सकती।
हर मर्द रक्षक नहीं होता, लेकिन हर मर्द संदिग्ध भी नहीं होता।

इसलिए—
लिंग नहीं, नीयत देखिए।
नफरत नहीं, जिम्मेदारी बढ़ाइए।
महिलाओं की सुरक्षा भी चाहिए,
और पुरुषों का सम्मान भी।
क्योंकि सुरक्षित समाज वह है,
जहां महिलाएं बेखौफ हों और
अच्छे पुरुष बेवजह कटघरे में न हों।

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#मर्दो_का_भरोसा

 #राष्ट्रपिता  #महात्मा_गांधी जी व  #लाल_बहादुर_शास्त्री जी की जयंती पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। "किसी व्यक...
02/10/2026

#राष्ट्रपिता #महात्मा_गांधी जी व #लाल_बहादुर_शास्त्री जी की जयंती पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।

"किसी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नही बल्कि उसके चरित्र से आंकी जाती है":
#लाल_बहादुर_शास्त्री_जयंती #गांधी_जयंती

#महात्मागांधी #नोरत_मल_वर्मा_लाम्बाहरिसिंह

30/09/2026

मुझे रिजल्ट के लगभग 6 महिने बाद ( ) घर पर ही प्राप्त हुआ है।

29/09/2026

जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के नियम बदले! अब 1 साल बाद SDM और 2 साल बाद कोर्ट के आदेश से ही होगा पंजीयन

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