सभी प्रिय बंधुओं को मेरा सादर प्रणाम ओर आप सभी का ह्रदय आभार की आपने वर्ष 2018 में मेरा सहयोग ,सम्मान ,ज्ञान, समय, दिया ह व मेरे से भूल वस किसी प्रकार की गलती हुई हो तो में माफ़ी चाहता हु
वर्ष 2019 की हार्दिक बधाई आप सभी के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं
🙏🙏आपका
भरत कुमार खारोल
बी एन इंटरप्राइजेज
उदयपुर
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Shakambari Mata, or Shakambhari Devi, is an incarnation of Shakti and is worshipped in many parts of India. In 2011, Shakambari Mata Navratra or Navarati begins on January 12 and ends on January 19. It is believed that she feeds those who are hungry with vegetarian food. She is Mother Earth who suffices hunger. Shakambari Ma is known as ‘the bearer of the greens’ – Shaka means vegetables and Amabari means who bears. Goddess Shakambari is mentioned in the Devi Mahatmya.
Shakambari Mata is worshipped during Navratri and Durga Puja but one of the most famous Navratra dedicated to her happens in Paush month or Pushya Month (December – January). Shakambari Mata Navratra is a major puja and festival in some parts of Karnataka, Maharashtra, Rajasthan and Uttar Pradesh.
In the Devi Mahatmya, it is said that Goddess Durga appeared as Shakambari after a dry period of hundred years. She brought forth from her body fruits, flowers, vegetables and herbs to suffice the hunger of the people.
Major Temples dedicated to Goddess Shakambhari are located in Badami and Bangalore Karnataka, Nagewadi and Kumbhoj inMaharashtra, Uttar Pradesh, and Rajasthan. In Karnataka, she is known as Goddess Banashankari and Banada Ashtami is a major event during Shakambari Mata Navratra.
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शाकम्भरी देवी का प्राचीन शक्तिपीठ जयपुर जिले के सांभर कस्बे में अवस्थित है। शाकम्भरी माता सांभर की अधिष्ठात्रीदेवी है और इस शक्तिपीठ से ही इस कस्बे ने अपना यह नाम पाया।
सांभर, पौराणिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक महत्तव का एक सांस्कृतिक पहचान रही है एशिया की सबसे बड़ी नमक उत्पन्न करने वाली खारे पानी की झील भी यही है। शाकम्भरी देवी के मंदिर की अतिक्ति पौराणिक राजा ययाति की दोनों रानियों देपयानी और शर्मिष्ठा के नाम पर एक विशाल सरोवर व कुण्ड अद्यावधि वहां विद्यमान है जो इस क्षेत्र के प्रमुख तीर्थस्थलों के रूप में विख्यात है। वर्तमान में देवनानी के नाम से प्रसिद्ध इस तीर्थ का लोक में बड़ा माहात्म्य है जिसकी सूचक यह कहावत है देवदानी सब तीर्थो की नानी।
शाकम्भरी देवी के नामकरण के विषय में पौराणिक उल्लेख है कि एक बार इस भू- भाग में भीषण अकाल पड़ने पर देवी ने शाक वनस्पति के रूप में अंकुरित हो जन जन की बुभुक्षाशान्त कर उनका भरण पोषण किया तभी से इसका नाम शाकम्भरी पड़ गया जिसका अपभ्रंश ही सांभर है।
सांभर पर चौहान राजवंश का शताब्दियों तक असधिपत्य रहा। चौहान काल में सांभर और उसका निकटवर्ती क्षेत्र सपादलक्ष (सवा लाख की जनसंख्या सवा लाख गांवों या सवा लाख की राजस्व वसूली क्षेत्र) कहलाता था।
ज्ञात इतिहास के अनुसार चौहान वंश शासक वासुदेव ने सातवीं शताब्दी ईं में सांभर झील और सांभर नगर की स्थापना शाकम्भरी देवी के मंदिर के पास में की।
सांभर सातवीं शताब्दी ई. तक अर्थात् वासुदेवी के राज्यकरल से १११५ ई. उसके वंशज अजयराज द्वारा अजयमेरू दुर्ग या अजमेर की स्थापना कर अधिक सुरक्षित समझकर वहां राजधानी स्थानांतरित करने तक शाकम्भरी इस यशस्वी चौहान राजवंश की राजधानी रही।
सांभर की अधिष्ठात्री और चौहान राजवंश की कुलदेवी शाकम्भरी माता का प्रसिद्ध मंदिर सांभर से लगभग १५ कि.मी. दूर अवस्थित है। शाकम्भरी देवी का स्थान एक सिद्धपीठ स्थल है जहां जनमानस विभिन्न वर्गो और धर्मो के लोग आकर अपनी श्रद्धा भक्ति निवेदित करते हैं।
शाकम्भरी दुर्गा का एक नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शाक से जनता का भरण पोषण करने वाली। मार्कण्डेय पुराण के चण्डीस्तोत्र तथा वामन पुराण (अध्याय ५३) में देवी के शाकम्भरी नामकरण का यही कारण बताया गया है।
इस प्राचीन देवी तीर्थ का संबंध शक्ति के उस रूप से है जिससे शाक या वनस्पति की वृद्धि होती है। सांभर के पास जिस पर्वतीय स्थान में शाकम्भरी देवी का मंदिर है वह स्थान कुछ वर्षों पहले तक जंगल की तरह था और घाटी देवी की बनी कहलाती थी। समस्त भारत में शाकम्भरी देवी का सर्वाधिक प्राचीन मंदिर यही है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि देवी की प्रतिमा भूमि से स्वतः प्रकट हुई थी।
शाकम्भरी देवी की पीठ के रूप में सांभर की प्राचीनता महाभारत काल तक चली जाती है। महाभारत (वन पर्व), शिव पुराण (उमा संहिता) मार्कण्डेय पुराण आदि पौराणिक ग्रन्थों में शाकम्भरी की अवतार कथाओं में शत वार्षिकी अनावृष्टि चिन्तातुर ऋषियोंपर देवी का अनुग्रह शकादि प्रसाद दान द्वारा धरती के भरण पोषण की कथायें उल्लेखनीय है। वैष्णव पुराण में शाकम्भरी देवी के तीनों रूपों में शताक्षी, शाकम्भरी देवी का शताब्दियों से लोक में बहुत माहात्म्य है। सांभर और उसके निकटवर्ती अंचल में तो उनकी मान्यता है ही साथ ही दूरस्थ प्रदेशों से भी लोग देवी से इच्छित मनोकमना, पूरी होने का आशीर्वाद लेने तथा सुख-समृद्धि की कामना लिए देवी के दर्शन हेतु वहां आते हैं। प्रतिवर्ष भादवा सुदी अष्टमी को शाकम्भरी माता का मेला भरता है। इस अवसर पर सैंकड़ों कह संख्या में श्रद्धालु देवी के दर्शनार्थ वहां आते हैं। चैत्र तथा आसोज के नवरात्रों में यहां विशेष चहल पहल रहती है।
शाकम्भरी देवी के मंदिर के समीप उसी पहाड़ी पर मुगल बादशाह जहांगीर द्वारा सन् १६२७ में एक गुम्बज (छतरी) व पानी के टांके या कुण्ड का निर्माण कराया था, जो अद्यावधि वहां विद्यमान है।
शाकम्भरी देवी के चमत्कार से संबंधित एक जनश्रुति है कि मुगल बादशाह औरंगजेब जब स्वयं शाकम्भरी देवी की मूर्ति तोड़ने के इरादे से वहां आया और प्रतिमा नष्ट करने का आदेश दिया तो असंख्य जहरीली मधुमक्खियों का झुण्ड उसकी सेना पर टूट पड़ा तथा सैनिकों को घायल कर दिया तब विवश हो औरंगजेब ने अपनी आज्ञा वापिस ली तथा देवी से क्षमा याचना की।
सारतः शाकम्भरी देवी अपने आलौकिक शक्ति और माहात्म्य के कारण सैंकड़ों वर्षो से लोक आस्था का केन्द्र है।
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