20/02/2024
खाना खा लो दोस्तो
हमारे साथ जंगल में खाने का मन हो तो आ जाओ
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20/02/2024
खाना खा लो दोस्तो
हमारे साथ जंगल में खाने का मन हो तो आ जाओ
07/12/2023
01/10/2023
1777 में हैदर अली ने चित्रदुर्ग किले को घेर लिया और तमाम प्रयत्नों के बाद भी वे किले में घुस नही पा रहे थे तब उन्होंने एक महिला को देखा जो एक छेद से निकल कर जा रही थी
उन्हे शीघ्र ही मालूम हो गया कि ये चित्रदुर्ग किले का गुप्त मार्ग है, हैदर अली की आरंभ से रणनीति किले में रक्तपात करना था ताकि बिना सैन्य टकराव के वे युद्ध को जीत जाए
चित्रदुर्ग किले के शासक मदकरी नायक ने मराठों और पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध कई अभियानों में हैदर अली की सहायता की थी बावजूद हैदर अली की नजर चित्रदुर्ग किले में थी
जब मराठों और निजाम की संयुक्त सेना के युद्ध की संभावना बढ़ी तो हैदर की दुष्ट नीति को समझ मदकरी नायक ने अभियान में साथ नही दिया और स्वतंत्र नीति अपनाई
इससे क्रोधित हो हैदर अली ने चित्रदुर्ग पर भारी भरकम जुर्माना लगाया जिसे चुकाने से मदकरी नायक ने अस्वीकार कर दिया, इसी पर हैदर अली ने चित्रदुर्ग किले को जीतने के लिए सेना भेज दी थी
सभी सैनिक उस छोटे से मार्ग से जिसमे केवल एक एक करके ही जाया जा सकता था, जा रहे थे
वहां के पहरेदार हनुमा जो भोजन करने गए थे, उसकी पत्नी ओबव्वा पानी की व्यवस्था के लिए तालाब गई थी उन्होंने सैनिकों को देख लिया
राष्ट्र पर संकट देख एक सामान्य सी नारी ओबव्वा, मूसल जिससे धान कुटा जाता है उसे लेकर मार्ग के अंत में जाकर खड़ी हो गई और जैसे ही कोई सैनिक आता तो उसके सर में प्रहार करती
इसी प्रकार उसने सैकड़ों सैनिकों को ढेर कर दिया, पानी लाने में देर होता देख ओबव्वा के पति जब उसे ढूंढता हुआ आया तो वो अवाक सा रह गया
बाद में ओबव्वा का भी निधन उसी दिन हो गया कुछ इतिहासकार इसे सदमा मानते है तो कुछ शत्रु के द्वारा
अपने बहादुरी के इस कृत्य से उसने किले और राज्य को उस दिन बचा लिया
1779 में पालेयगार के सेवाओं में कार्यरत मुस्लिम अधिकारियों की गद्दारी के कारण अंततः चित्रदुर्ग पराजित हो गया और उनके राजा को बंदी बना लिया गया
ओबव्वा को उनके महान कृत्य के कारण उन्हे कन्नड़ का गौरव कहा जाता है, चित्रदुर्ग में उनके नाम पर एक खेल स्टेडियम भी है "वीर वनीथे ओंके स्टेडियम"। इसके अलावा उनकी एक प्रतिमा का भी अनावरण किया गया है
10/09/2023
यहाँ किसी ने पूरी सेना बना दी थी अंग्रेजों के खिलाफ और लोग कहते हैं आज़ादी चरखा चलाने से मिल गई ! 🇮🇳
24/08/2023
चंद्रमा पर भारत की मौजूदगी के होंगे निशान!
चंद्रमा की सतह पर अब ये छवि स्थाई रूप से अंकित हो गई है क्योंकि रोवर के टायरों पर यह छाप है। चूंकि चंद्रमा पर कोई हवा नही है इसलिए ये निशान हमेशा के लिए रहेंगे।
लैंडर से निकलने के बाद रोवर प्रज्ञान न केवल डेटा इकठ्ठा करेगा बल्कि चंद्रमा की सतह पर हमेशा के लिए भारत की मौजूदगी के निशान भी छोड़ेगा. रोवर का पिछला पहिया इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह आगे बढ़ने पर अपने पीछे चंद्रमा की सतह पर सारनाथ में अशोक की लाट से लिया गया भारत का राष्ट्रीय चिह्न अंकित करेगा. इसका दूसरा पिछला पहिया इसरो का निशान प्रिंट करेगा जो हमेशा के लिए चांद पर भारत की मौजूदगी का प्रमाण होगा।
गर्व के क्षण!
साभार
#इतिहासनामा
23/08/2023
22/08/2023
#चितौड़गढ़ के पहले #जौहर की वीरांगनाओं को याद करने के साथ साथ हमें #मेवाड़ के 2 कोहीनूर ( #गोरा - #बादल) को भी याद करना चाहिए। ये वही महावीर योद्धा थे, जिन्होंने दिल्ली जाकर, ख़िलजी की हलक से रावल रत्न सिंह को आजाद किया था...इन्ही दो परमवीरो के ऊपर ,उस इतिहास को दर्शाती कुछ लाइनें लिख रहा हूँ , जो मेवाड़ के राजकवि प. नरेंद्र मिश्र जी द्वारा लिखी गयी है..
● दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई कुर्बानी
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने
कालजई मित्रों से मिलकर दगा किया खिलजी ने
खिलजी का चित्तौड़दुर्ग में एक संदेशा आया
जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया
दस दिन के भीतर न पद्मिनी का डोला यदि आया
यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया
तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे
शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे
यह दारुण संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में
यह बिजली की तरह क्षितिज से फैल गया अम्बर में
महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंहासन डोला था
था सतित्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था
रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर
जिनसे रण में भय खाती थी खिलजी की शमशीर
अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे
रत्न सिंह की संधि नीति से नाता तोड़ गए थे
पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला
वन वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला
गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया
मगर वीरता का अपमानित ज्वार नहीं मिट पाया
बोला मैं तो बहुत तुच्छ हू राजनीति क्या जानूँ
निर्वासित हूँ राज मुकुट की हठ कैसे पहचानूँ
बोली पद्मिनी, समय नहीं है वीर क्रोध करने का
अगर धरा की आन मिट गयी घाव नहीं भरने का
दिल्ली गयी पद्मिनी तो पीछे पछताओगे
जीते जी राजपूती कुल को दाग लगा जाओगे
राणा ने जो कहा किया वो माफ़ करो सेनानी
यह कह कर गोरा के क़दमों पर झुकी पद्मिनी रानी
यह क्या करती हो गोरा पीछे हट बोला
और राजपूती गरिमा का फिर धधक उठा था शोला
महारानी हो तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो
प्राण प्रतिष्ठा एक लिंग की ज्योति अग्निगंधा हो
जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा
महाकाल से भी राणा का मस्तक नहीँ कटेगा
तुम निश्चिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी
राणा के सकुशल आने तक गोरा नहीँ मरेगा
एक पहर तक सर कटने पर धड़ युद्ध करेगा ।
21/08/2023
80 साल की उम्र के #क्षत्रिय ाजा__छत्रसाल जब मुगलो से घिर गए,और बाकी राजपूत राजाओं से कोई उम्मीद ना थी तो उम्मीद का एक मात्र सूर्य था " ब्राह्मण बाजीराव बलाड़ पेशवा"
एक क्षत्रिय ने एक ब्राह्मण को खत लिखा:-
जो गति ग्राह गजेंद्र की सो गति भई है आज!
बाजी जात बुन्देल की बाजी राखो लाज!
( जिस प्रकार गजेंद्र हाथी मगरमच्छ के जबड़ो में फंस गया था ठीक वही स्थिति मेरी है, आज बुन्देल हार रहा है , बाजी हमारी लाज रखो) ये खत पढ़ते ही बाजीराव खाना छोड़कर उठे उनकी पत्नी ने पूछा खाना तो खा लीजिए तब बाजीराव ने कहा
अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक #क्षत्रिय ने #मदद मांगी और #ब्राह्मण भोजन करता रहा "-
ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर #बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा #छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े । दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके आते ही
ब्राह्मण योद्धा बाजीराव बुंदेलखंड आया और फंगस खान की गर्दन काट कर जब क्षत्रिय राजा छत्रसाल के सामने गए तो छत्रसाल से बाजीराब बलाड़ को गले लगाते हुए कहा:-
जग उपजे दो ब्राह्मण: परशु ओर बाजीराव।
एक डाहि क्षत्रिय, एक डाहि तुरकाव।।