Gangwar history

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The Gahadvala, or Gaharwar,{gangwar} was a Hindu Rajput dynasty that ruled the kingdom of Kannauj for approximately a hundred years, beginning in the late

Bihar caste-based survey: Anger spills against CM Nitish 10/04/2026

अब सारा डेटा सामने है। यह बहुत दिलचस्प और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तस्वीर है:

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**पहले क्या दावा करते थे — जनगणना के बाद क्या निकला**

बिहार में जातिगत जनगणना से पहले ब्राह्मण नेता और संगठन आमतौर पर अपनी आबादी **8% से 12%** के बीच बताते थे। कुछ संगठन तो इससे भी ज़्यादा का दावा करते थे — यह दावा चुनावी सौदेबाजी और आरक्षण विरोध की रणनीति का हिस्सा था।

**अक्टूबर 2023 की जाति जनगणना में सच्चाई:**

बिहार में ब्राह्मणों की जनसंख्या मात्र **3.65%** निकली। और तुलना करें तो 1931 की ब्रिटिश जनगणना में भी यह सिर्फ 4.7% थी — यानी ब्राह्मण आज 1931 से भी कम हो गए हैं। [ETV Bharat](https://www.etvbharat.com/english/state/bihar/bihar-caste-based-survey-opens-a-can-of-worms-as-as-anger-spills-against-cm-nitish/na20231004072313280280609)

**सभी सवर्ण जातियों का हाल:**

ब्राह्मण 3.66%, राजपूत 3.45%, भूमिहार 2.89%, और कायस्थ मात्र 0.60% निकले। [ETV Bharat](https://www.etvbharat.com/english/state/bihar/bihar-caste-based-survey-opens-a-can-of-worms-as-as-anger-spills-against-cm-nitish/na20231004072313280280609)

**ज़मीन और जनसंख्या का अंतर्विरोध:**

भूमिहार जो सिर्फ 2.8% हैं, वे बिहार की 39% ज़मीन के मालिक हैं। ब्राह्मण जो 3.6% हैं, उनके पास 16% ज़मीन है। [Indiancurrents](https://www.indiancurrents.org/story-bihar-caste-survey-boost-for-justice-dr-prakash-louis-368.php) यही असली खेल है — संख्या में कम, लेकिन संसाधनों पर कब्ज़ा ज़्यादा।

**दूसरी जातियों का भी यही हाल:**

कुशवाहा समुदाय अपनी आबादी 12% बताता था, लेकिन जनगणना में सिर्फ 4.21% निकली। [Castefiles](https://castefiles.com/powerful-backward-castes-lose-numbers-game)

**राजनीतिक असर:**

जनगणना ने दिखाया कि ब्राह्मण जैसी पारंपरिक रूप से privileged जातियाँ सरकारी नौकरियों में अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं ज़्यादा represent हैं। [Science](https://www.science.org/content/article/first-time-century-india-s-states-will-count-politically-sensitive-caste-membership) इसी आधार पर नीतीश कुमार ने OBC/EBC के लिए आरक्षण 50% से बढ़ाकर 65% कर दिया।

**सार:** जनगणना ने वो "inflated numbers game" तोड़ दिया जो दशकों से चल रहा था। 10-12% का दावा करने वाले 3-4% पर आ गए — और इसीलिए सवर्ण नेताओं ने जाति जनगणना का इतना विरोध किया था।

Bihar caste-based survey: Anger spills against CM Nitish The census that revealed that the Other Backward Classes (OBCs) comprise 63 per cent of the state's population, has stirred the hornet's nest as leaders of other dwindling castes coming out loud in their protest against the Nitish Kumar-led government. Their contention is their respective castes wer...

10/04/2026

सपा से मिलकर ब्राह्मणवाद को कैसे हराया कुर्मियों ने शक्ति पहचानो अपनी

01/11/2025

राहुल गाँधी उत्तर भारत के लीडर नहीं बन पाए हैं.

राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर भारत के लीडर नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव हैं.

दक्षिण भारत के नेता स्टालीन और राहुल गाँधी हैं.

बिहार चुनाव में राहुल गाँधी की सक्रियता सस्पेंस में है. शायद अब वो समझने लगे हैं कि बिहार "शुद्ध पोलिटिकल माइनफील्ड" है. इस राज्य से चालें चली जाती है.

तेजस्वी यादव सीएम बन जाएंगे तो राहुल गाँधी का शतरंज बिखर जाएगा. उत्तर भारत का नेता तो दूर की बात है, ईधर वो पहले की तरह अपना सॉफ्ट डोमिनेन्स स्ट्रेटजी का गेम भी नहीं खेल पाएंगे.

अखिलेश की तरह तेजस्वी ने भी ताकत हासिल कर लिया तो, राष्ट्रीय फ्रेम में कांग्रेस की केंद्र बिंदु की भूमिका भी कमजोर हो जाएगी.

राहुल जी की निष्क्रियता बिल्कुल सोची समझी है. बिहार जैसे राजनीतिक चालबाजी के माहिर राज्य को वे अपने से 20 वर्ष छोटे युवा के हाथ में नहीं जाने देना चाहते.

होना बस इतना हीं है कि चुनाव परिणाम में महागठबंधन की हार के बाद बिहार की राजनीति राहुल गाँधी से लड़ना शुरू करेगी. राहुल लड़ने भी देंगे. कुछ समय बाद फिर विपक्षी गठबंधन और इनका समर्थक वर्ग थक जाएगा. कांग्रेस खुद से लड़ाकर आपको थकाती हीं है.

ज़ब सब थक जाएंगे तो राहुल अपना विचार कार्ड खेलेंगे. अंततः वे उत्तर भारत के विपक्षी गठजोड़ों में मॉरल सेंटर बने रहेंगे.

तेजस्वी यादव को जीताने में कांग्रेस मेहनत क्यों करेगी? तेजस्वी की जीत उत्तर भारत में अखिलेश यादव को सबसे पावरफुल सेंटर बना जाएगा.

ऐसे में राहुल गाँधी का उत्तर भारत वाला शतरंज बोर्ड बिखर हीं न जाएगा?

अखिलेश यादव सबकुछ जानते हुए अब जाकर जोर लगाना शुरू कर रहे हैं, लेकिन बिहार में वे क्या हीं कर लेंगे. उनका बिहार में प्रचार करना महागठबंधन के नेताओं की समय की बर्बादी है.

राहुल गाँधी विपक्षी गठबंधन का मॉरल सेंटर बने रहने की राजनीति कर रहे हैं. बड़े नेताओं के लिए राज्यों की राजनीति सिर्फ शतरंज का खेल होता है, राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र-बिंदु में बने रहना उनकी प्राथमिकता होती है.

पुरे पोस्ट में एक बार भी नितीश जी का नाम नहीं लिया हूं लेकिन राहुल गाँधी , नितीश कुमार की तरह बैकग्राउंड में रहकर शतरंज खेलने की कोशिश कर रहे हैं.

नोट - पोस्ट का 90 फीसदी हिस्सा 7 दिन पहले लिखा था. इसे 15 नवंबर को पोस्ट करना था. लेकिन मन में एंटरटेनमेंट चल रहा है तो आज हीं कर दे रहा हूं.

26/10/2025

प्रशांत किशोर एक भी सीट जीत गया तो बिहार में चल रही रेवोलुशनरी एंटीकास्ट परम्परा पर एक दाग लग जाएगा.

क्योंकि बिहार इस देश का अकेला राज्य है जहाँ की राजनीति से जातिवाद खत्म हो चुका है.

बिहार के लोग राजनीति में मनु के सोशल आर्डर को समाप्त कर चुके हैं.

जातिवाद के दार्शनिक मनु ने जिस जाति की रिचूअल ड्यूटी राजनीति और शाशन प्रशाशन से दूर रहने की तय की थी, बिहार उस जातिवादी दर्शन को इनकार कर चुका है.

जातिवादी दर्शन जिसको खेती कराना चाहता है, वह बिहार में सबसे लंबे समय से मुख्यमंत्री है.

जातिवादी दर्शन जिसे भैंस चराने को कहता है, वह नेता प्रतिपक्ष है.

जातिवाद का मनुवादी दर्शन जिनको राजनीति से दूर रखना चाहता है, वही इस राज्य की राजनीति चला रहा है.

टिकट बांटने वालों में एक भी मनुपुत्र नहीं रहता है.

जिनको जदयू का टिकट चाहिए, वे क़ृषि कार्य करने वाली जाति के पास जाएं.

जिनको राजद का टिकट चाहिए, वो चरवाहे के पास जाएं.

जिनको लोजपा का टिकट चाहिए, वह सबाल्टर्न आर्मी (रिचुअल ड्यूटी -चौक़ीदार) के पास जाएं.

जिनको VIP का टिकट चाहिए, वे मछुआरे के पास जाएं.

जिनको भाजपा और RLM का टिकट चाहिए, वे भैंस चराने वाले और सब्जी उगाने वाले के पास जाएं.

जिनको HAM का टिकट चाहिए, वे चूहा पकड़ने वाले के पास जाएं.

जिन्हें IIP का टिकट चाहिए, वो एक बुनकर के पास जाएं.

जातिवाद का मनुवादी दर्शन जिस जाति को शाशक तय करने का अधिकार देता है उस जाति का प्रशांत किशोर इस बार टिकट बांटने आया है. उसके टिकट पर एक भी उम्मीदवार जीतकर आ गया तो बिहारियों का सिर शर्म से झुक जाएगा.

अभी तक बिहार में राजनीति वो कर रहा है,जिसको जातिवाद के दर्शन में राजनीति और शाशन व्यवस्था से दूर रहने को कहा गया है.

राजनीति में मनुवादी जातिवादी व्यस्था के खिलाफ हुई मुक्तियुद्ध में बिहार ने जीत हासिल कर लिया था. समाजिक गैरबराबरी के खिलाफ लड़कर बिहार एक विजेता राज्य बन चुका है. लेकिन इस बार बिहार को एक अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है.

जो जद्दोजहद 2500 साल पहले तथागत बुद्ध के नेतृत्व में शुरू हुआ था, उस जद्दोजहद को आधुनिक समय में लालूजी के नेतृत्व में हमने विजेता बनकर खत्म की है. इस परम्परा को बनाए रखना हमारी पीढ़ी की लड़ाई है.

10/07/2025
09/07/2025
09/07/2025
07/07/2025

राजनीति में प्रतिनिधित्व बनाम प्रभाव: अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल की "सत्ता में मौन भागीदारी" का विश्लेषण

विशेष रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति में "कुर्मी समाज" हमेशा से एक निर्णायक भूमिका में रहा है, विशेषकर पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में। लेकिन जब सवाल उनके प्रतिनिधित्व और परिणाम का आता है, तो सबसे बड़ा नाम जो सामने आता है — वह है अनुप्रिया पटेल और उनके पति आशीष पटेल का।

पद मिला, पर प्रभाव नहीं: सत्ता में होते हुए भी 'निष्क्रिय' क्यों?

अनुप्रिया पटेल लगातार दूसरी बार मोदी सरकार में मंत्री हैं। आशीष पटेल यूपी में तकनीकी शिक्षा मंत्री रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि दोनों सत्ता में रहते हुए भी अपने समाज के लिए कोई ठोस और प्रत्यक्ष काम नहीं दिखा सके, जिस पर जनता कहे — "हां, यह कुर्मी समाज के मंत्री ने कराया है।"

अब तक कोई पांच ठोस काम जो दबाव बनाकर कराए हों?

यहां एक कटु सत्य सामने आता है — ऐसे कोई पांच बड़े उदाहरण नहीं हैं जिनमें ये कहा जा सके कि मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने:

1. किसी थाने में कुर्मी युवकों के उत्पीड़न पर FIR दर्ज करवाई हो,

2. किसी ज़िले में OBC भर्ती भेदभाव या आरक्षण पर केंद्र/राज्य से भिड़ंत ली हो,

3. अपने समाज के लिए कोई शैक्षिक संस्थान, मेडिकल कॉलेज, OBC स्कीम या फंड पारित कराया हो,

4. किसी अफसरशाही के खिलाफ समाज के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ी हो,

5. या फिर कुर्मी बाहुल्य जिलों में योजनाओं का रणनीतिक विस्तार कराया हो।

नतीजा: जो समाज उन्हें चुनकर दिल्ली और लखनऊ भेजता है — उसी के युवाओं, किसानों, महिलाओं के लिए कोई स्पष्ट, ठोस, और जनसंवेदनशील कार्य दिखाई नहीं देता।

बड़े चेहरे, लेकिन छोटी सुनवाई: बीजेपी में 'कोटे का मंत्री' होने की सच्चाई
भाजपा के सहयोगी दलों को मंत्रीपद तो मिलता है, लेकिन वास्तविक नीतिगत फैसला और प्रशासनिक पकड़ सिर्फ भाजपा के बड़े चेहरों तक सीमित रहती है।
सत्ता में हैं, पर अफसर नहीं सुनते
मंत्री हैं, पर थानेदार नहीं मानता
राज्यसभा भेजते हैं, पर विकास योजनाओं की लिस्ट में नाम नहीं होता

यही वजह है कि कुर्मी समाज का एक बड़ा तबका अब सवाल कर रहा है — "क्या हमें केवल प्रतीकात्मक मंत्री चाहिए, या हक की आवाज़ उठाने वाला नेता?

राजनीतिक नुकसान: कब तक चलेगी ये 'प्रतीकवाद की राजनीति'?
अगर यह स्थिति जारी रही, तो इसका असर अगले चुनाव में साफ दिखेगा:
जनता कहेगी: "नाम का मंत्री है, काम का नहीं"
पार्टी के विधायक "अपने ही समाज के बीच अलोकप्रिय हो जाएंगे"

अपना दल (S) का आधार सिर्फ भाजपा के वोट पर टिका रहेगा, जो किसी भी वक्त गिर सकता है

कुर्मी समाज में नई लीडरशिप की मांग उठ सकती है — जो सिर्फ कुर्सी नहीं, काम भी करे

भविष्य की पटकथा: कब तक रहेगा 'सत्ता का कोटा'?

> अगर अपना दल ने सरकार पर दबाव बनाकर अपने समाज के मुद्दों — शिक्षा, रोज़गार, उत्पीड़न, प्रशासनिक भेदभाव — पर आवाज़ नहीं उठाई, तो 2027 तक कुर्मी समाज में वैचारिक विद्रोह तय है।

भाजपा को भी यह समझना होगा कि सिर्फ आंकड़ों की साझेदारी (ally share) से राजनीति नहीं चलती, बल्कि ज़मीन पर सम्मान और काम चाहिए।

अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल को अब प्रतीक से नीति-निर्माता बनना होगा।
वरना आने वाले चुनाव में जनता खुद कहेगी:

हमने चुना था लड़ने वाला, मिला सिर्फ बैठने वाला!"

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