06/08/2023
【 'सत्यं किम प्रमाणं, प्रत्यक्षं किम प्रमाणं' 】
सत्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, न ही जो स्पष्ट है।
✎ सर्वप्रथम विश्वेश्वर आदिलिंग अविमुक्तेश्वर का वर्णन ✎
अविमुक्तं च स्वानं तथा मध्यमकं पदम् ।
एतत्रिकण्टकं देवि मृत्युकालेऽमृतप्रदम् ॥
(लि० पु०, कृ० क० त०, पृ० १२३)
अविमुक्तेश्वर का मूर्धन्य स्थान तो उस समय सवस्वीकृत था ही।
कलौ स्थानानि पूजयेत्।
विश्वेश्वर तो काशी के देवता ही माने जाते हैं। इस पर्यालोचन के समय हमको एक बात और भी ध्यान में रखनी है कि सकाम उपासना में जिस कामना से आराधना होती है, उसके अनुसार ही देवस्थानों का चयन किया जाता है और इस प्रकार उनका आनुपातिक महत्त्व तथा प्राधान्य बदलता रहता है।
इसके अतिरिक्त पारमार्थिक तथा लौकिक महत्ता भी सदैव एक साथ नहीं रहतीं। नगर के निकटवर्ती देवालयों का लौकिक महत्त्व सदैव दूरवर्ती स्थानों की अपेक्षा अधिक होता है।
जैसा कि मुगलों के आधिपत्य के पूर्व वाराणसी-क्षेत्र के स्वामी अविमुक्तेश्वर थे। उनका सर्वाधिक माहात्म्य था। पृथ्वी के सभी तीर्थ तथा पुण्यायतन उनके दर्शनों को प्रत्येक पर्व पर उपस्थित होते हैं। उस समय उन सभी का माहात्म्य अविमक्तेश्वर में लीन हो जाता है।
अविमुक्तेश्वर के दर्शन करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता। यह आदिलिंग माना गया है, जिसको देखकर ही बाद में अन्य शिवलिंगों का स्वरूप-निर्धारण हुआ। अविमुक्तेश्वर के दर्शन से जन्म-जन्मान्तर के पापों का तत्क्षण नाश हो जाता है। भगवान् विश्वनाथ भी नित्य उनका पूजन करते हैं। इनके दर्शन से तो पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती ही है, इनके स्मरण करने का भी वही फल है।
यहाँ तक कि दूर देश में भी यदि कोई मनुष्य अविमुक्तेश्वर का ध्यान तथा जप नियमित रूप से त्रिकाल करता रहे, तो वहाँ मरने पर भी काशी में मृत होने का फल,अर्थात् मुक्ति मिलती है। यदि मनुष्य इनका दर्शन करके कार्यवश दूसरे नगर को जाय, तो कार्यसिद्धि के पश्चात् पुनः काशी में शीघ लौटकर आ जाता है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण ने तो यहाँ-तक कहा है कि अविमुक्तेश्वर की आराधना से ही ब्रह्मानारायणादि देवताओं को शक्ति तथा अधिकार मिले हैं:
नैमिषं पुष्करअविमुक्त सदालिङ्ग योऽत्र द्रक्ष्यति मानवः।
तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥
(लिं० पु०, कृ० क० त०, पृ० १०६)
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था।
उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है।
उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था।
आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू है। सन् 1752 से लेकर सन् 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए। 7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।
सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मंडप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया। इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक (1325) के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब 'विविध कल्प तीर्थ' में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोजशाह तुगलक के समय कुछ मंदिर मस्जिद में तब्दील हुए थे। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही लिंग है।
इसका फल यह हुआ कि जब आगे चलकर वाराणसी में पुनः मन्दिर बने, तब विश्वेश्वर के मन्दिर को अन्यत्र बनवाना पड़ा और वह इस प्रकार अवि-मुक्तेश्वर के प्रांगण में बना।
जब इस सबके प्रायः पांच सौ वर्षों के बाद जब औरंगजेब का जोश समाप्त हो चुका था, जयपुरनरेश मिर्जा राजा जयसिंह ने विश्वेश्वर के आदिम स्थान की स्मृति जीवित रखने के उद्देश्य से रजिया की मस्जिद के सन्निकट यह शिवालय बनवाया, जिसका नाम इसी कारण आदिविश्वेश्वर रखा गया।
इस बीच विश्वेश्वर का मन्दिर अपने नये स्थान में भी चार बार पुनः टूट चुका था।
【 आदिविश्वेश्वर का मन्दिर 】
विश्वेश्वर का मन्दिर नहीं है, वह विश्वेश्वर के आदिम स्थान का स्मारक-मात्र है । कृत्यकल्पतरु में विश्वेश्वर का जैसा वर्णन है, वैसा ही वर्णन एक जगह काशीखण्ड में भी मिलता है, यद्यपि इस ग्रन्थ में अन्यत्र विश्वेश्वर को काशी का आधिपत्य मिल चुका है।
17वें अध्याय के 179वें श्लोक में विश्वेश्वर के कृत्यकल्पतरुवाले स्वरूप का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि:
यत्समाप्याप्यते पुण्यं निष्ठापाशुपतव्रतम् ।
तदाप्यतेऽत्र विश्वेश सकृदीक्षणतः क्षणात् ॥ (का० ख०, ६७।१७६)
जो कृत्यकल्पतरु के वर्णन का शब्दान्तर-मात्र है। इसके पश्चात् विश्वेश्वर के मन्दिर का वही स्थान काशीखण्ड में भी बतलाया गया है कि उसके ईशान कोण में अवधूततीर्थ था:
तदीशानेऽवधूतेशो योगज्ञानप्रवर्तकः।
तीर्थं चैवावधूतेशं सर्वकल्मषनाशकृत् ॥ (का० ख०, ६७१८०)
यही बात कृत्यकल्पतरु में इस प्रकार कही गई है कि :
पूर्वोत्तरदिशाभागे तस्य देवस्य सुन्दरि।
अवधूतम्महत्तीर्थं सर्वपापनुदुत्तमम् ॥ (लि० पु०, कृ० क० त०, पृ० ६३)
काशीखण्ड में ही इस प्रकार के विरोधास्पद वर्णन का कारण यह है कि उस ग्रन्थ के ९७वें अध्याय में मुसलमानों के आधिपत्य के पूर्व का वर्णन है और काशीखण्ड के शेष अध्यायों में चौदहवीं शताब्दी के मध्य की परिस्थिति का वर्णन है, जब विश्वेश्वर काशीपति हो चुके थे।
काशीखण्ड में एक जगह और विश्वेश्वर नामक शिवलिंग का उल्लेख है, परन्तु कृत्य-काशीखण्ड के १७वें अध्याय के विषय में जो मत ऊपर दिया गया है। उसका तर्क-सहित प्रमाण 'तीर्थों के स्थानान्तरण' नामक अध्याय में मिलेगा।
लिंगपुराण के तथा काशीखण्ड के ९७वें अध्याय के आधार पर विश्वेश्वर के माहात्म्य का वर्णन कर चुकने के बाद अब हमको काशीखण्ड के विश्वेश्वर के माहात्म्य की ओर दृष्टिपात करना है; क्योंकि तेरहवीं शताब्दी के बाद से उनका वही माहात्म्य माना जाता रहा है और आज भी माना जाता है।
काशीखण्ड में कहा गया है कि विश्वेश्वर-लिंग स्वयम्भू-लिंग था :
अस्मिन्ममानन्दवने यदेतल्लिङ्ग सुधाधाम सुधामधाम ।
आसप्तपातालतलात्स्वयम्भूसमुत्थितं भक्तकृपावशेन ॥
(का० खं०, ६६।४४)
स्वयम्भुवोऽस्य लिङ्गस्य मम विश्वेशित : सुराः ।
राजसूयसहस्रस्य फलं स्यात्स्पर्शमात्रतः॥ (का० ख०, ६६।२६)
इसके दर्शन-पूजन से मुक्ति-प्राप्ति का फल होता है, तत्त्वज्ञान भी मिलता है।
वस्तुतः,सभी कुछ प्राप्त होता है:
तस्य दर्शनमात्रेण तत्त्वज्ञानविधायकम् ।
पापं क्षयमवाप्नोति सर्वथा नात्र संशयः ॥ (प०पु०,त्रि० से०, पृ०१८३)
स्नात्वा मुमुक्षुमणिकर्णिकायां मृडानि गङ्गाहृदये त्वदास्ये।
विश्वेश्वरं पश्यति योऽपि कोऽपि शिवत्वमायाति पुनर्न जन्म॥
(सन० सं०, त्रि० से०, पृ० १८४)
सर्वलिङ्गार्चनात्पुण्य यावज्जन्म यदर्यते ।
सकृद्विश्वेशमभ्यर्च्य श्रद्धया तदवाप्यते ॥
सर्वलिङ्गार्चनात्पुण्य यावज्जन्म यदर्यते ।
सकृद्विश्वेशमभ्यर्च्य श्रद्धया तदवाप्यते ॥
यज्जन्मनां सहस्रण निर्मलं पुण्यमचितम् ।
तत्पुण्यपरिवर्तन भवेद्विश्वेशदर्शनम् ॥
गवां कोटिप्रदानेन सम्यग्दत्तेन यत्फलम्।
तत्फलं सम्यगायत विश्वेश्वरविलोकनात् ॥(का०ख०, त्रि०से०, पृ०१८५)
अर्हसर्वेषु लिङ्गषु तिष्ठाम्येव न संशयः ।
परं त्वियं परामूतिर्मम लिङ्गस्वरूपिणी ॥ (का० ख०, ६६।
यस्तु विश्वेश्वर दृष्ट्वा ह्यन्यत्रापि विपद्यते ।
तस्य जन्मान्तरे मोक्षो भवत्येव न संशयः ॥ (का० ख०, ६९।४२)
काशीविश्वेश्वरं लिङ्गं ज्योतिलिङ्ग तदुच्यते ।
तदृष्ट्वा परमं ज्योतिराप्नोति मनुजोत्तमः ॥
(ना० पु०, त्रि० से०, पृ० १८७)
लिङ्ग महानन्दकरं विश्वेशाख्यं सनातनम् ।
नमस्कृत्य विमुच्येत पुरुषः प्राकृतगुणैः ॥
(ब० वै० पु०, त्रि० से०, पृ० १८३)
काश्यां श्रीदेवदेवस्य विश्वनाथस्य पूजनम् ।
सर्वपापरह पुंसामनन्ताभ्युदयावहम् ॥
संसारदावनिर्दग्ध जीवभूरूहजीवनम्
दुःखार्णवौघपतितप्राणिनिर्वाणकारणम
(शिवपु०, त्रि० से०, पृ० १८८)
उपर्युल्लिखित माहात्म्य को देखने से स्पष्ट है कि पहले जो माहात्म्य अविमुक्तेश्वर का था, वह प्रायः सभी सरकारी कुछ काशीखण्ड, ब्रह्मवैवर्तपुराण, नारदपुराण, पद्मपुराणादि में विश्वेश्वर का बतलाया गया है। एक बात और है, यद्यपि काशीखण्ड, पद्मपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में अविमुक्तेश्वर तथा विश्वेश्वर को एक नहीं माना गया है, तथापि काशीखण्ड में जिस वाराणसी का वर्णन है, उसके सौ वर्ष बाद ही जनमानस इन दोनों को एक ही मानने लग गया था।
अतएव, दोनों का माहात्म्य भी एकरूप हो जाने में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।
देवदेव और विश्वेश्वरदेव अविमुक्तेश्वर के ही नाम थे, उनकी इस उक्ति का आधार मत्स्यपुराण है, जहाँ देवदेव पद तो बहुत बार आया है और विश्वेश्वर एक जगह (१८२।१७)।
अब रही विश्वेश्वर देव की बात, सो जिस श्लोक में यह पद आने का उल्लेख 'काशी का इतिहास' में हुआ, वह इस प्रकार है :
प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते।
अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्चति ॥
परन्तु, इसके अतिरिक्त एक अन्य श्लोक में भी 'विश्वेश' पद आया है :
तीर्थानां पञ्चकं सारं विश्वेशोनन्दकानने ।
दशाश्वमेधं लोलार्कः केशवो बिन्दुमाधवः॥
पञ्चमी तु महाश्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका । (म० पु०, १८५७६५-६६)
जब वाराणसी में विश्वेश्वर नाम का एक शिवलिंग वर्तमान है, ऐसी स्थिति में इन श्लोकों के आधार पर यही कहा जा सकता है कि या तो देवदेव के समान ही 'विश्वेश्वर' शब्द केवल शिववाची है, अन्यथा यह कि विश्वेश्वर नामक शिवलिंग के लिए ही इसका प्रयोग हुआ है। अविमुक्तेश्वर का नाम ही विश्वेश्वर था, यह तो इन सन्दर्भो से किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता।
इसके अतिरिक्त ‘काशी का इतिहास' ने स्वयं ही अविमुक्तेश्वर (पृ० १७३) तथा देवदेव (पृ० १८३) के मन्दिरों को अलग-अलग बतलाया है।
पूर्वोतरे दिग्विभागे तस्मिन् क्षेत्रे तु सुन्दरि ।
उत्पन्नं मम लिङ्गतु भित्वा भूमि यशस्विनि ॥
तेषामनुग्रहार्थाय लोकानां भक्तिभावतः।
वाराणस्यां महादेवि तत्र स्थान स्थितो ह्यहम् ॥
तं दृष्ट्वा मनुजो देवि पशुपार्शविमुच्यते।
कूपस्तत्रैव संलग्नो महादेवस्थ
तत्रोपस्पर्शनाद्देवि लभेद्वागीश्वरों गतिम् ।
तत्र वाराणसी देवी स्थिता विग्रहरूपिणी॥
मानवानां हितार्थाय स्थिता कूपस्यपश्चिमे ।
वाराणसी तु यो दृष्ट्वा भक्त्या चैव नमस्यति ॥
तस्य तुष्टा च सा देवी वसति च प्रयच्छति।
महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षमिति विश्रुतम् ॥
(कृ० क० त०, पृ०, ४१-४२)
इस शिवलिंग का नाम 'महादेव' था, यह अन्तिम पंक्ति से निश्चित हो जाता है. यद्यपि छठी पंक्ति में 'महादेवस्य संलग्नो कूपस्तत्रैव चैव हि' से भी यही बात सिद्ध होती है। यदि 'महा-देवस्य कूपः' कहें, तो भी बात वही निकलती है। आगे चलकर फिर कहा गया है :
पश्चिमे तु दिशाभागे महादेवस्य भामिनि ।
स्कन्दन स्थापितं लिङ्ग मम भक्त्या सुरेश्वरि ॥ (कृ० क० त०, पृ० ४६)
इस प्रकार, जिस शिवलिंग का नाम 'काशी का इतिहास' ने अविमुक्तेश्वर स्थापित किया है, उसका नाम केवल 'महादेव' था, जिनकी पूजा-अर्चना इसी नाम से सोलहवीं शताब्दी तक होती थी और आज भी होती है। त्रिस्थलीसेतु में लिखा है :
1. त्रिलोचनसमीपस्थः
महावेवे पवित्रारोपणं महाफलम् (त्रि० से०, पृ० २५१) ।
2. अन्यदायतनं वक्ष्य वाराणस्यां सुरेश्वरि ।
यत्रव देवदेवस्य रुचिरं स्थानमीप्सितम् ॥
नीयमानं पुरा देवि तल्लिङ्ग शशिमौलिनः ।
राक्षसैरन्तरिक्षस्थवजमानं सुसत्वरम् ॥
तावत् कुक्कुटशब्दस्तु तस्मिन् देशे समुत्थितः ।
शब्दं श्रुत्वा तु तं देवि राक्षासास्त्रस्तचेतसः॥
लिङ्गमुत्सृज्य भीतास्ते प्रभातसमये
गतैस्तु राक्षसवि लिङ्ग तत्रैव संस्थितम् ॥
स्थाने तु रुचिरे शुभ्र देवदेवः स्वयं प्रभुः।
अविमुक्तस्तत्र मध्ये अविमुक्त ततः स्मृतम्॥
अविमुक्तं सदालिङ्ग योऽत्र द्रक्ष्यति
पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥
(कृ० क० त०, पृ० १०८-१०६)
यहाँ पर 'देवदेव' शब्द भगवान् शंकरवाची है। शिवलिंग का नाम तो 'अविमुक्त' स्पष्ट लिखा है। इसके बाद ज्ञानवापी तथा निकटवर्ती शिवलिंगों का विवरण देने के बाद कहा गया है कि :
अविमुक्तस्य चाग्ने तु लिङ्ग पश्चान्मुखं स्थितम् ।
प्रीतिकेश्वरनामानं प्रीति यच्छति शाश्वतीम् ॥
अविमुक्तोत्तरेणैव लिङ्ग पश्चान्मुखं स्थितम् ।
(कृ० क० त०, पृ०११२)
इस प्रकार, स्वयं 'काशी का इतिहास' अविमुक्तेश्वर के दो स्थान बतलाता है, यद्यपि उसमें एक जगह नाम देवदेव ग्रहण किया गया है, परन्त वर्णन अविमुक्तेश्वर का ही है, जैसा ऊपर दिखलाया जा चुका है और वह स्वयं भी पहले कह चुका है कि देवदेव अवि-मुक्तेश्वर का ही नाम है। अब प्रश्न उठता है कि अविमुक्तेश्वर का शिवायतन कहाँ था।
इस सम्बन्ध में काशी के इतिहासकार को जो भी भ्रम हो क्योंकि, उन्होंने इस विषय में तीन बातें कही हैं :
1. वह गंगातट पर अथवा उसके पास था (पृ० ९६);
2. वह वाराणसी-क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में था, जहाँपर पुराण महादेवलिंग का स्थान बतलाते हैं, (पृ० १७३) तथा
3. देवदेव नाम से वह ज्ञानवापी के उत्तर में था], परन्तु बात इतनी स्पष्ट है कि इस भ्रम का कारण समझ में ही नहीं आता। कृत्यकल्पतरु में यह लिखा है कि अविमुक्तेश्वर के दक्षिण वापी है, जिसका जल पीने से मनुष्य के हृदय में तीन लिंग
उत्पन्न होते हैं और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ इस वापी का नाम नहीं दिया हुआ है, परन्तु उसके चारों ओर स्थित जिन शिवलिंगों का वर्णन है, उनसे स्पष्ट है कि यह वापी ज्ञानवापी ही है। उसके पश्चिम में दण्डपाणि, पूर्व में तारकेश्वर, उत्तर में नन्दीश्वर तथा दक्षिण में महाकालेश्वर उसके जल की रक्षा करते हैं। इन देवताओं के स्थान ज्ञानवापी के चारों ओर आज भी पूजे जाते हैं। इतना ही नहीं, काशीखण्ड में भी इस वापी का यही स्थान और उसके चारों ओर यही देवता कहे गये हैं।
उसका जल पीनेवालों के हृदय में तीन लिंगों की उत्पत्ति का वर्णन भी वहाँ मिलता है :
देवस्य दक्षिणे भागे वापी तिष्ठति शोभना ।
तस्यास्तथोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥
पीतमात्रेण तेनेव उदकेन यशस्विनि।
त्रीणि लिङ्गानि वर्धन्ते हृदय पुरुषस्य तु ॥
दण्डपाणिस्तु तत्रस्थो रक्षते तज्जलं सदा ।
पश्चिमं तीरमासाद्य देवदेवस्य शासनात् ॥
पूर्वेण तारको देवो जलं रक्षति सर्वदा ।
नन्दीशश्चोत्तरेणैव महाकालस्तु दक्षिणे ॥
रक्षते तज्जलं नित्यं मद्भक्तानां तु मोहनम् ।
(लि० पु०, कृ० फ० त०, पृ० १०६-११०)
अविमुक्तस्य चाग्ने तु लिङ्ग पश्चान्मुखं स्थितम् ।
तु प्रीतिकेश्वरनामानं प्रीति यच्छति शाश्वतीम् ॥
(लि० पु०, कृ० क० त०, पृ० १११)
देवस्य दक्षिणे भागे तत्र वापी शुभोदका।
तदम्बु प्राशनंनं णामपुनर्भवहतवे॥
तज्जलात्पश्चिमे भागे दण्डपाणिः सदावति ।
तत्प्राच्यवाच्यत्तरस्यां तारः कालः शिलादजः ॥
लिङ्ग त्रयं हृदब्जे यच्छ्रद्धया पीतमर्पयेत् ।
यैस्तत्र तज्जलं पीतं कृतार्थास्ते नरोत्तमाः॥
(का० ख०, ९७४२२०-२२२)
यहाँ तारः से तारकेश्वर, काल: से महाकालेश्वर तथा शिलादजः से, जो नन्दी का नाम है, नन्दीश्वर का तात्पर्य है। इस प्रकार अविमुक्तेश्वर के शिवायतन का वही स्थान सिद्ध होता है, जहाँ औरंगजेब की आलमगीर मस्जिद है। जिसे लोग ज्ञानवापीवाली मस्जिद के नाम से जानते हैं।
यहाँ यह शंका उठ सकती है कि उक्त मस्जिद तो विश्वेश्वर का मन्दिर तोड़कर बनी थी, फिर वह स्थान अविमुक्तेश्वर का कैसे हो सकता है।
इस शंका का निवारण विश्वेश्वर के शिवायतन के वर्णन में नीचे दिया जाता है।
आजकल अविमुक्तेश्वर के दो शिवलिंग हैं, एक तो विश्वनाथजी के वर्तमान मन्दिर में आग्नेय कोण के छोटे मन्दिर में और दूसरा ज्ञानवापी की मस्जिद की सीढ़ियों के सामने धर्मशाले में खिड़की के भीतर का बड़ा शिवलिंग ।
इसके अतिरिक्त अविमुक्तेश्वर के प्राचीन स्थान की स्मृति तथा साक्ष्य के रूप में ज्ञानवापी के उत्तर फाटक से घुसते ही सामने पृथ्वी पर फूल चढ़ाने की हिन्दु ओं को न्यायालय से आज्ञा मिली हुई है।
विश्वेश्वर का लिंग आयतन परम गुह्य है, जिसकी सभी देवता वन्दना करते है और जिसके दर्शन से पाशुपतव्रत का फल प्राप्त होता है :
अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं गुह्यं यशस्विनि ।
लिङ्ग विश्वेश्वर नाम सर्वदेवस्तु वन्दितम् ॥
तेन दृष्टेन लभ्यत व्रतात्पाशुपतात्फलम्।
(लि० पु०, कृ० क० त०, पृ० ६३)
लिंगपुराण के अनुसार विश्वेश्वर के शिवलिंग का कोई बड़ा माहात्म्य नहीं था। यही निष्कर्ष डॉ० आयंगर ने तथा डॉ० मोतीचन्द्र ने भी निकाला है।।
महाराज गोविन्दचन्द्र द्वारा विश्वेश्वर का दर्शन तथा ग्राम-दान यह सिद्ध करता है कि उस समय विश्वेश्वर का शिवायतन वाराणसी के प्रमुख शिवायतनों में था।
इससे भी यह सिद्ध होता है कि उस समय लौकिक दृष्टि से वही वाराणसी का प्रधान मन्दिर था। कर्णाटक के हयशल राजा नृसिंह तृतीय ने सन् १२७९ ई० में एक दानपत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने एक गाँव की आय (६४५ निष्क) कर्णाटक, तिलंगाणा, तुलू, तिरहुत, गौड इत्यादि के निवासियों को काशीयात्रा के समय तुरुष्क-दण्ड देने तथा श्रीविश्वेश्वर की सेवा के लिए दिया था।
इससे स्पष्ट है कि काशी के प्रधान शिवलिंग के रूप में उस समय विश्वेश्वर ही दूर-दूर के प्रदेशों में प्रसिद्ध थे। जैसा हम आगे चलकर देखेंगे, गुजरात में भी विश्वेश्वर की ही ख्याति थी, जिसके आधार पर सेठ वस्तुपाल ने एक लाख रुपया उनकी सेवा के लिए भेजा था। ऐसा जान पड़ता है कि उन दिनों धार्मिक प्राधान्य अविमुक्तेश्वर का होते हुए भी सांसारिक दृष्टि से विश्वेश्वर की भी उतनी ही महिमा थी और सम्भावना यही है कि 'कुट टनीमतम्' नामक ग्रन्थ में जिस शिवायतन का वर्णन है, वह विश्वेश्वर का ही था। इस ग्रन्थ की रचना कश्मीर के राजा जयापीड के मन्त्री दामोदरगुप्त ने सन् ७७९ से ८१३ ई० के बीच किया था। इसमें उज्जयिनी का राजकुमार समरभट वाराणसी आने पर भगवान् शंकर के जिस मन्दिर में गया, उसके चारों ओर जो भीड़- भाड़ थी, उसमें वेश्याओं, विटों, चेटिकाओं आदि का प्राधान्य था।
भगवान् का दर्शन करने के उपरान्त मन्दिर के बाहर आने पर वह राजकुमार भी उसी समाज में बैठ गया और उसके सामने नर्तक, वेणुवादक, गायक तथा वेश्याएँ बैठ गई और नगर के प्रमुख सेठ, वणिक् इत्यादि पान, सुवास आदि लेकर आये।
इस वर्णन को विश्वेश्वर के शिवायतन से सम्बद्ध करने का यह कारण है कि वाराणसी के किसी भी शिवमन्दिर में वेश्याओं को मण्डली नहीं जाती, परन्तु आदिविश्वेश्वर के मन्दिर में आज भी वर्ष में एक दिन नगर की सभी वेश्याएँ रात-भर नाचती-गाती हैं।
आदिविश्वेश्वर का मन्दिर विश्वेश्वर के आदिम स्थान का स्मारक होकर पुराने मन्दिर के स्थान से थोड़ा हटकर बना हुआ है और इन नगर-नायिकाओं के वहाँ जाकर गाने की परम्परा उस पुरानी परिस्थिति की ओर संकेत करती है, जिसका वर्णन 'कुट्टनीमतम्' में किया गया है।
विश्वेश्वर के शिवलिंग के सम्बन्ध में एक विशेषता यह भी कही गई है कि उसमें स्पर्शास्पर्श-दोष नहीं होता था। जिस प्रकार का जनसमाज उस मन्दिर के चारों ओर था, उस परिस्थिति में स्पर्शास्पर्श-दोष का निर्वाह सम्भव नहीं था।
वहां तो हर प्रकार के लोग थे, जो मन्दिर में दर्शन-पूजन भी करते थे और बाहर आकर सांसारिक विषय-वासना में लिप्त हो जाते थे। सभी जाति के लोग उस समाज में थे और इस कारण वहाँ सभी जाति के लोग विश्वेश्वर के लिंग का दर्शन-पूजन तथा स्पर्श करते थे ।
इस कठिनाई का निराकरण सनत्कुमारसंहिता में मिलता है :
ब्राह्म मुहूर्ते मणिकणिकायां स्नात्वा समाराधयति स्वमेव ।
अस्पृश्यसंस्पर्शविशोधनाय कलौ नराणां कृपया हिताय ॥
(त्रि० से०, पृ० १८३)
विश्वेश्वर का मन्दिर कहाँ था, इस प्रश्न का उत्तर लिंगपुराण तथा काशीखण्ड के ९७वे अध्याय में मिलता है। वहां लिखा है कि विश्वेश्वर के ईशान कोण में अवधूत महातीर्थ था, जिसके पूर्व में पशुपतीश्वर का शिवायतन था। इस प्रकार, पशुपतीश्वर के पश्चिम में अवधूततीर्थ और उसके नैऋत्य कोण में विशैलेश्वर। यह स्थिति थी।
इस प्राचीनतम् नगरी के प्रति हिन्दुओं में आस्था कूट-कूट कर भरी है। काशी सारे दुःखों को समाप्त करने वाली मोक्षदायिनी नगरी है। नैषधचरित के रचनाकार श्री हर्ष ने इस प्रकार लिखा है-
वाराणसी निविशते न वसुन्धरायां तत्र स्थितिर्मखभुआं भवने निवासः।
तत्तीर्यमुक्तवपुषामत एव मुक्तिः स्वर्गात् परं पदमुपदेतु मुदेतुकीदृक।।
अर्थात्, काशी समग्र भारत प्रतिरूप के रूप में मौजूद है। यह समस्त दुःखों को समाप्त करने वाली मोक्षनगरी है। यह इस भूमण्डल से बाहर है। यह पृथ्वी पर नहीं है। काशी अलग-अलग कालों में समय के साथ और विकसित होती गयी।
काशी का विध्वंस सिर्फ औरंगजेब द्वारा उसके काल में नही हुआ बल्कि एक बृहद इतिहास रहा है काशी विध्वंस का।
काशी में सबसे पहला आक्रमण 1027 में गजनी सेना ने किया।
12वीं सदी काशी पर गहड़वालों का शासन। गहड़वाल नरेश गोविन्दचंद्र के राजपंडित दामोदर द्वारा तत्कालीन लोकभाषा (कोसली) में उक्तिव्यक्ति प्रकरण की रचना। गोविंदचंद्र की रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में विहार बनवाया। गहडवाल युग में काशी के प्रधान देवता अविमुक्तेश्वर शिव की विश्वेश्वर में तब्दीली।
सन् 1193 काशीराज जयचंद की मृत्यु।
सन् 1194 कुतुबुद्दीन का काशी पर आक्रमण हुआ, जिसने विष्णु-मंदिर को तोड़कर ढाई कंगूरे की मस्जिद बनवा दी।
सन् 1194 व 1197 काशी पर शहाबुद्दीन और कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले। काशी की भारीलूट। गहडवालों का अंत।
वाराणसी के सभी मन्दिर सन् 1194 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वा दिये और उसके बाद प्रायः पचास वर्षों तक वे सभी टूटे पड़े रहे। इसके बाद विश्वेश्वर-मन्दिर के स्थान पर रजिया सुलताना (राज्यकाल सन् 1236-1240 ई०) ने मस्जिद बनवा दी।
सन् 1248 दूसरी बार मुहम्मद गोरी का आक्रमण हुआ।
सन् 1526 बाबर ने इब्राहीम लोदी को पराजित करने के बाद काशी पर भी आक्रमण किया।
सन् 1531 बनारस व सारनाथ में हुमायूं का डेरा।
सन् 1538 बनारस पर शेरशाह की चढ़ाई।
तत्कालीन विश्वनाथ मंदिर और कई मंदिरो को तोड़ा। और काशी में लूट पाट खून खराबा किया ।
सन् 1565 काशी पर बादशाह अकबर का कब्जा।
सन् 1583-91 प्रथम अंग्रेज यात्री रॉल्फ फिच की वाराणसी-यात्रा।
सन् 1584 काशी में ज्ञानवापी स्थित प्राचीन विश्वेश्वर मन्दिर का निर्माण दिल्ली सम्राट अकबर के दरबारी राजा टोडरमल के द्वारा हुआ।
सन् 1585 राजा टोडरमल और नारायण भट्ट की मदद से विश्वनाथ मंदिर का पुननिर्माण।
सन् 1600 राजा मान सिंह द्वारा काशी में मानमंदिर और घाट का निर्माण।
सन् 1623 सोमवंशी राजा वासुदेव के मंत्री नरेणु रावत के पुत्र श्री नारायण दास के दान से काशी में मणिकर्णिका घाट स्थित चक्रपुष्करणी तीर्थ का निर्माण हुआ।
सन् 1642 विंदुमाधव मन्दिर ( प्रथम ) का निर्माण जयपुर के राजा जयसिंह द्वारा हुआ।
सन् 1656 दारा शिकोह की बनारस यात्रा।
सन् 1666 औरंगजेब की आगरा-कैद से भागकर छत्रपति शिवाजी कुछ दिन काशी में ठहरे।
सन् 1669 औरंगजेब के आदेश से विश्वनाथ मंदिर गिरा कर उसके स्थान पर ज्ञानवापी की मस्ज़िद उठा दी गई। बिंदुमाधव का मन्दिर भी गिराकर वहां मस्जिद बनाई गई।
सन् 1669 औरंगजेब के शासन काल में उसकी आज्ञा से ज्ञानवापी का विश्वेश्वर मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1669 छत्रपति शिवाजी आगरे के किले से औरंगजेब को चकमा देकर कैद से निकल कर सीधे काशी आये। यहाँ आकर पंचगंगा घाट पर स्नान किया।
सन् 1673 काशी में औरंगजेब द्वारा बेनी माधव का मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1699 आमेर के महाराज सवाई जयसिंह के द्वारा काशी में पंचगंगा घाट पर राम मन्दिर बनवाया था।
सन् 1714 गंगापुर ग्राम में कार्त्तिक कृष्ण पक्ष में काशीराज महाराज बलवन्त सिंह का जन्म हुआ।
सन् 1725 काशी राज्य की स्थापना।
सन् 1734 नारायण दीक्षित पाटणकर का वाराणसी आगमन; उन्होंने यहां कई घाट बनवाए।
सन् 1737 महाराजा जयसिंह नें मानमन्दिर वेधशाला का निर्माण कराया।
सन् 1740 बलवन्त सिंह के पिता श्री मनसाराम का देहावसान हो गया।
सन् 1741-42 गंगापुर में तत्कालीन काशीराज द्वारा दुर्ग का निर्माण कराया गया।
सन् 1737 सवाई जयसिंह द्वारा मानमंदिर- वेधशाला की स्थापना।
सन् 1747 महाराज बलवन्त सिंह ने चन्देल वंशी राजा को पराजित कर विजयगढ़ पर अधिकार किया।
सन् 1752 काशीराज बलवंत सिंह द्वारा रामनगर किले का निर्माण।
सन् 1754 महाराज बलवन्त सिंह ने पलिता दुर्ग पर विजय पाया।
सन् 1755 बंगाल, नागौर राज्य की रानी भवानी के द्वारा पंचक्रोशी स्थित कर्दमेश्वर महादेव के सरोवर का निर्माण हुआ।
सन् 1756 रानी भवानी ने भीमचण्डी के सरोवर का निर्माण करवाया।
सन् 1770 21 अगस्त का महाराज बलवन्त सिंह का स्वर्गवास हुआ।
सन् 1770 से 1781 तक काशी पर महाराज चेतसिंह का शासन था।
सन् 1777 महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का नवनिर्माण कराया।
सन् 1781 16 अगस्त को काशी में शिवाला घाट पर अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह के सिपाहियों का संघर्ष हुआ। यह विद्रोह राजभक्त नागरिकों द्वारा मारे गये। 19 अगस्त, 1781 को काशी की देश भक्त जनता की क्रांति से भयभीत होकर वारेन हेस्टिंग्स जनाने वेश में नौका द्वारा चुनार भाग गया। दिसम्बर सन् 1781 से 1794 तक काशी राज्य पर महाराज महीप नारायण का राज्य था।
सन् 1785 काशी में महारानी अहिल्या बाई द्वारा विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण हुआ। सन् 1787-1795 जोनाथन डंकन बनारस के रेजिडेंट।
सन् 1787 काशी में प्रथम बार भूमि का बन्दोबस्त मिस्टर डंकन साहब के द्वारा हुआ जो डंकन बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है।
सन् 1814 बनारस में लार्ड हेस्टिंग्स का आगमन और दरबार।
सन् 1822 जेम्स प्रिंसेप ने बनारस का सर्वेक्षण किया।सन् 1825 बाजीराव पेशवा द्वितीय ने कालभैरव मन्दिर का निर्माण कराया।
सन् 1828 ज्ञानवापी के खंडित सरोवर की रक्षा हेतु ग्वालियर की रानी बैजबाई ने एक कूप बनवाया।
सन् 1828-29 जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनारस की जनगणना; कुल आबादी-1,80,000
सन् 1839 पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा काशी विश्वनाथ मन्दिर के कलश पर स्वर्ण-पत्र-चढ़ाया।
🐹 औरंगजेब - काशी विध्वंस 🐹
मुगल सम्राट औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669, को बनारस के "काशी विश्वनाथ मंदिर" तोड़ने का आदेश जारी किया था। जिसका पालन कर अगस्त 1669, को काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था। उस आदेश की कॉपी आज भी एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में सुरक्षित रखी हुयी है।
अपने बाप को कैद करने और प्यास से तड़पाने वाले आतातयी तथा धर्माध मुग़ल शासक औरंगजेब ने हिन्दुओं के श्रध्दा और आस्था के केंद्र बनारस सहित प्रमुख तीर्थ स्थलों के मंदिरों को अपने शासन काल में तोड़ने और हिन्दुओं को मानसिक रूप से पराजित करने के हरसंभव प्रयास किये। औरंगजेब के गद्दी पर आते ही लोभ और बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण ने भीषण रूप धारण किया था। अप्रैल 1669 में चार हिन्दू कानूनगो बरखास्त किये गये जिन्हे मुसलमान हो जाने पर वापिस ले लिया गया।
औरंगजेब की घोषित नीति थी 'कानूनगो बशर्ते इस्लाम' अर्थात् मुसलमान बनने पर कानूनगोई।
अविमुक्तेश्वर का स्थान विश्वेश्वर ने किस प्रकार लिया
यह कहा जा चुका है कि मुगलों के आधिपत्य के पूर्व वाराणसी का प्रधान शिवायतन अविमुक्तेश्वर का था। यह भी हम कह चुके हैं कि शास्त्रीय दृष्टि से मध्यम कोटि का शिवायतन होते हुए भी तत्कालीन जनजीवन में लौकिक उल्लास तथा सांसारिक सुख-सामग्री से सुसज्जित होने के कारण विश्वेश्वर के मन्दिर को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और वहाँ सदैव ही मेला लगा रहता था। धर्मप्राण लोग तो अविमुक्तेश्वर की आराधना करते थे, परन्तु सांसारिक वृत्तिवाले लोगों का विश्वेश्वर-मन्दिर की ओर विशेष झुकाव था।
इसी कारण विश्वेश्वर का वैभव भी कदाचित् अधिक था और देश-विदेश में विश्वेश्वर अथवा विश्वनाथ की ही ख्याति अधिक थी, जिसका प्रमाण कश्मीर में लिखी हुई 'कुट्टनीमतम' से मिलता है और फिर गुजरात के सेठ वस्तुपाल द्वारा विश्वेश्वर की पूजा के लिए एक लाख रुपये भेजने से भी इसकी परिपुष्टि होती है। कर्णाटक के राजा द्वारा एक ग्राम की आय के दान का उल्लेख भी ऊपर किया ही जा चुका है। यह परिस्थिति सैकड़ों वर्षों से चल रही थी।
सन् ११९४ ई० में टूटे हुए मन्दिरों का जब फिर से निर्माण हुआ, तब विश्वेश्वर मन्दि