Most oldest city in world

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27/08/2020

Best Sweet Shops in Varanasi
Expert recommended Top 3 Sweet Shops in Varanasi, Uttar Pradesh. All of our sweet shops face a rigorous 50-Point Inspection, which includes customer reviews, history, complaints, ratings, satisfaction, trust, cost and their general excellence. You deserve only the best!

New Rajshree Sweets
NEW RAJSHREE SWEETS
Near Kachahari Chauraha, Golghar, Hamrautia, Varanasi, UP 221002 Directions
Chocolate Bite, Dry Fruit Sweet, Indian Sweet, Addu, Desi Sweet, Orange Bite, Jelly Sweets, Karachi Sweets, Chhuti Bundi and Bathusa, Kaju Puri Sweets, Dry Fruit Bite, Bengali Sweet, North Indian Sweets & Churma Ladu

'New Rajshree Sweets' is known for its innovation while maintaining the original flavours of traditional Indian sweets. Their rich decade of considerable experience will truly reflect their mouth-watering taste and great service. They offer a wide range of tasty sweets snack and hundreds of eateries for their customers.

facebook.com/newrajshrees...

Reviews

0542 250 4477
Mon - Sun 9:00 am - 10:00 pm


Bengal Sweet House
BENGAL SWEET HOUSE
Bhikharipur, BHU-DLW road, DLW Road, In front of police station, Varanasi, UP 221004 Directions
Dry Fruits Laddu, Besan Ladoo, Badam, Vegetables Patties, Badam Halwa, Akhrot Bites, Aloo Tikki Chaat, Mathura Peda, Mango Kalakand, Chocolate Bites, Moong Barfi, Beverages, Motichoor Laddu & Besan Laddu

Bengal Sweet House is supplying the residents of its neighbourhood in Varanasi with the taste of Indian novelty sweets. They uphold the tradition of simple and fulfilling sweets, created from the best ingredients that are always the right ones. The sweet shop specialises in handmade sweets with a variety of flavours.

Reviews

99352 27267
Mon - Sun 8:00 am - 10:00 pm


KSHEER SAGAR
Mahmoorganj Road, Near Virat Villa, Varanasi, UP 221010 Directions
Kaju Laddu, Dry Fruit Sweets, Patisa and Bengali Mithai, Mawa Peda, Maghdal, Mawa Sweets, Baked Sweets, Kaju Roll, Ghewar, Badam Katli, Special Laddu, Feeni, Soan Papri, Rosagulla, Kaju Katli & Gulab Sakri

Ksheer Sagar has more than 10 outlets in the city and offers a wide range of sweets along with some traditional Varanasi sweets as magdal and malai gilouri. The shop offers a modern touch to traditional Indian treats by playing with chocolate vanilla strawberry.

Reviews

74084 30994
Mon - Sun 8:00 am - 10:00 pm

TBR® Inspection Report

Who is the best in Varanasi, Uttar Pradesh?
Buffet restaurants in Varanasi
Cafes in Varanasi
Cake shops in Varanasi
Catering services in Varanasi
Chinese restaurants in Varanasi
Fast food restaurants in Varanasi
Fresh juice shops in Varanasi
Non veg Restaurants in Varanasi
Pizza outlets in Varanasi
Pure vegetarian Restaurants in Varanasi
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Photos from Most oldest city in world's post 14/04/2018

Must visit this holy place ones in yours life.

Photos from Most oldest city in world's post 10/04/2018

277 सालों से MYSTERY बना है मंदिर में सूर्य के किरणों का पहुंचना
वाराणसी. काशी के स्वामी लक्ष्मी नारायण और भू-देवी मंदिर का एक रहस्य 277 सालों से आज तक कोई नहीं जान सका।
झरोखे से भगवान विष्णु के माथे पर जाती है सूर्य की पहली किरण

मंदिर वाराणसी के भोसले घाट पर बना है। मंदिर के शि‍खर से 20 फीट नीचे और छत के लेवल से 8 इंच ऊपर एक झरोखा बना है। इससे सूर्य की पहली किरण भगवान विष्णु के माथे पर जाती है और मुकुट से टकराकर गर्भ गृह में अपने आप रोशनी हो जाती है। खास बात है कि झरोखे से बरसात के दिनों में पानी की एक बूंद भी गर्भ गृह में नहीं जाती, न ही कोई मंदिर के अंदर से झरोखे के जरिए आसमान देख पाता है। यही वजह है कि 277 सालों से यह रहस्य आज तक बरकरार है कि झरोखा किस तरह बना है कि सूर्य की किरण से मंदिर का गर्भ गृह प्रकाश से भर जाता है।

मणि से टकराती थी सूर्य की किरण, निकलता था प्रकाश

झरोखा रेक्टेंगल शेप में एक फीट लंबा, 10 इंच चौड़ा और 4 फीट गहरा है। आचार्य बागीश दत्त शर्मा ने बताया, 1740 में इस मंदिर को नागपुर स्टेट के तत्कालीन राजा रघुजी राव भोसले ने बनवाया था। उस समय भगवान को सुबह होने से पहले आरती कर मुकुट-मणि पहनाया जाता था। गर्भ गृह में उस समय सूर्य की किरण इसी झरोखे से आकर मणि पर टकराती थी, जिससे प्रकाश मिलता था। जब तक भगवान सूर्य आकाश में दि‍खते है, भगवान के मस्तक से प्रकाश निकलता रहता था। हालांकि, अब वह मुकुट और मणि दोनों ही नहीं हैं, लेकिन सूर्य की किरण अभी भी वैसे ही भगवान के माथे से टकराती है।

मंदिर में बने अखाड़े में रियाज करते थे राजगुरु

मंदिर के अंदर सीढ़ियों के ऊपर प्राचीन अखाड़ा भी है, जहां कभी राजगुरु आकर रियाज किया करते थे। इस मंदिर को उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय शैली से बनाया गया है। पत्थर चुनार के हैं। शिखर से लेकर गर्भ गृह द्वार तक नक्काशी देखने को मिलती है। कई देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हैं।

Photos from Most oldest city in world's post 08/04/2018

बनारस। धर्म की नगरी काशी में अनेक रहस्‍य दबे हुए हैं। इनमें से कुछ उजागर हो चुकें है तो कुछ पर से पूरी तरह से पर्दा अभी उठना बाकी है। ऐसा ही एक रहस्य है शहर के पातालपुरी मठ में। जिस पर से पर्दा उठाने के लिए टीम Livevns पातालपुरी मठ पहुंची। जहां मठ के नाम के अनुसार पातल तक जाने वाली एक गुफा का द्वारा खुला दिखाई दिया।



आखिर कहां तक गयी है यह गुफा? इसका निर्माण किसने कराया और तो और आखिर बनारस हिन्‍दू यूनिवर्सिटी आखिर क्‍यों करने जा रहा है इस गुफा पर रिसर्च ? इन सब पहलुओं पर से हम पर्दा उठाएंगे अपनी इस ख़ास रिपोर्ट में।

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दरअसल, जोगीश्वर महादेव के पीछे के हिस्से में स्थित पातलपुरी मठ का नाम पातालपुरी क्यों पड़ा, पहले ये जानने का विषय। इसी सच्चाई को जानने के लिए जब हम पातालपुरी मठ पहुंचे तो वहां मठ के महंत बाबा बालक दास से हमारी मुलाकात हुई। उनसे जब हमने इस तथ्य के बारे में जानने की इच्छा ज़ाहिर की तो उन्होंने कई रोचक चीज़ें बताईं जो शायद ही आम जनमानस को पता हो। इस पातलपुरी मठ में पाताल को जाने वाली गुफा के रहस्य से उन्होंने ही पर्दा उठाया।

काशी खंड में है गुफा का ज़िक्र
पातलपुरी मठ के महंत बाबा बालक दास ने बताया कि इस मठ में जो गुफा है उसके बारे में काशी खंड में भी ज़िक्र आया है –


‘विश्वेशं माधव ढूंढी दंडपाणि। वन्दे काशी गुहां गंगा भवानी मणिकर्णिका।।

ये वो वाक्य हैं जो इस गुफा के बारे में कशी खंड में वर्णित हैं। कहते हैं कि यह गुफा द्वापर काल की है। जिसे गंगापुत्र भीष्म पितामह ने बनाया था।

इसी रास्‍ते हस्‍थिनापुर तक भागे थे भीष्म
बाबा बालक दास ने बताया कि द्वापर युग में काशी नरेश ने अपनी तीन बेटियों अम्बा, अम्बे और अम्बालिका का स्वयंवर आयोजित किया था। उन्होंने देश और दुनिया के सभी राजा-महराजाओं को स्वयंवर में पधारने का न्‍यौता भेजा, किंतु हस्तिनापुर के राजा को इस स्वयंवर का न्योता नहीं दिया गया।
जिसके बाद गंगापुत्र भीष्म खुद काशी आये और क्रोध में उन्होंने काशी नरेश की तीनो बेटियों का हरण कर लिया। उन्हें ढूंढने के लिए काशी नरेश ने अपनी सेना उनके पीछे लगा दी। मगर भीष्म उनकी सेना से झगड़ा करना नहीं चाहते थे। कहते हैं कि भीष्‍म ने आज जहां पातालपुरी मठ है वहां से भूमि में एक तीर छोड़ा जो गुफा बनाते हुए सीधा हस्तिनापुर निकला। इसी रस्ते से भीष्मपितामाह अपने रथ के साथ हस्तिनापुर तक गए। तब से ही यह गुफा आजतक यहां मौजूद है।



अम्बा बनी भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण
हस्तिनापुर पहुंचकर भीष्म ने अपने दो भाइयों चित्रवीर और विचित्र वीर का अम्बे और अम्बालिका से विवाह करा दिया। भीष्‍म अम्बा को वो वापस छोड़ देना चाहते थे। अम्बा ने तब भीष्म से कहा था, आप मुझे हरण कर लाये हैं, अब आपको ही मुझसे विवाह करना पड़ेगा। तब भीष्म ने अपने ब्रह्मचर्य और भीषण प्रतिज्ञा की बात कहकर अम्‍बा को मना कर दिया। इससे नाराज होकर अम्बा ने श्राप दिया अगले जन्म में मैं शिखंडी के रूप में जन्‍म लूंगी और आपकी मृत्‍यु का कारण बनूंगी । आखिरकार अम्‍बा का शाप सही साबित हुआ और कुरुक्षेत्र के रण में भीष्‍म पितामह की मौत का कारण शिखंडी ही बना।
रिसर्च करने गुफा में गए अंग्रेज़ आज तक नहीं लौटे
दुबारा लौटते हैं पातालपुरी मठ के गुफा के रहस्‍य की ओर। जैसा कि मठ के महंत बाबा बालक दास पहले ही बता चुके हैं कि इस गुफा का काशीखण्ड और स्कंदपुराण में भी वर्णन मिलता है। बाबा ने बताया कि सन 2003 में मठ के जीर्णोद्धार के समय मैंने भी अंदर जाने का प्रयास किया, करीब 30 फिट जाने के बाद मेरा दम घुटने लगा और मैं वापस आ गया।



उन्‍होंने बताया कि आज से कई वर्ष पहले इस गुफा के रहस्य को जानने के लिए दो विदेशी स्कॉलर आये थे। उन्हें तत्कालीन महंत जी ने मना किया की आप अंदर न जाएं। अंदर ऑक्सीजन की कमी है। इसपर वो लोग बोले की हमारे पास ऑक्सीजन सिलेंडर है हमें कोई दिक्कत नहीं होगी और वे दोनों इस गुफा में चले गए। काफी दिनों तक जब वो जब नहीं लौटे तो पुलिस को सूचित किया गया। जिसके बाद पुलिस ने इस गुफा के दरवाजे को बंद करा दिया।


बिना गुफा के दर्शन के काशी दर्शन अधूरा
बाबा बालक दास के अनुसार यह गुफा द्वापर काल की है और काशी दर्शन में इस गुफा का बहुत महत्त्व है। यहां दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। यदि आप भी काशी दर्शन का लाभ लेना चाहते हैं तो आपको इस गुफा के दर्शन करना अनिवार्य है।



कई इतिहासकारों ने लिखा गुफा का इतिहास
हमने गुफा की सच्चाई जानने के लिये जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर राजीव श्रीवास्तव से बात की तो उन्‍होंने भी इसके इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि यह गुफा इतिहास में दर्ज है। समय-समय पर भारतीय इतिहासकारों के साथ-साथ विदेशी इतिहासकारों ने भी इस गुफा का वर्णन अपनी किताबों और रिसर्चों में किया है। इस गुफा के कई पुख्ता सुबूत भी मिले हैं
बीएचयू करेगा शोध
डॉ राजिव श्रीवास्तव ने बताया कि इस गुफा के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए बीएचयू का इतिहास विभाग जल्‍द ही रिसर्च शुरू करने वाला है। इस गुफा के बारे में कई अनकहे तथ्यों से बीएचयू पर्दा उठाएगा।

Photos 08/04/2018

रात में हुई बारिश सुबह झील में तब्दील हुआ राजातालाब-जयापुर मुख्य मार्ग

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रात में हुई बारिश सुबह झील में तब्दील हुआ राजातालाब-जयापुर मुख्य मार्ग
By Saiyed Faiz Hasnain -April 8, 2018
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बनारस। साल 2014 में जब वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो सभी काशी के विकास के लिए आश्वस्त हो गये। इसी बीच प्रधानमंत्री ने सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की और अपने संसदीय क्षेत्र में जयापुर गांव को गोद लिया। इससे यहां का विकास का पहिया साल भर तक दौड़ा पर इस विकास में तीन साल के बाद बारिश के पानी ने पैबंद लगा दिया। बीती रात हुई बारिश ने राजातालाब बाज़ार से जयापुर को जाने वाली सड़क को झील में तब्दील कर दिया। इससे इस क्षेत्र में होने वाली जल निकासी की पोल खुल गयी।

PM मोदी के गांव जयापुर जाने वाले रोड का हालत देखकर आप भी चौक जाएंगे। राजातालाब बाजार की जलनिकासी व्यवस्था की स्थिति कितनी दयनीय है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मामूली बारिश के बाद भी सड़कों पर कई घंटे तक जलजमाव बना रहा । रविवार की भोर में हुई बारिश से बाजार के कई मोहल्लों, गलियों सहित प्रमुख मार्ग राजातालाब पुरानी पुलिस चौकी नेशनल हाइवे से लेकर रानीबाजार रेलवे लाईन तक लगभग पांच सौ मीटर जलजमाव हो गया।

इस दौरान इस जर्जर खस्ता हाल पंचक्रोशी मार्ग राजातालाब पर आवागमन दूभर हो गया। जिससे लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मुख्य मार्ग से राजातालाब होते हुए रानीबाजार जाने वाले मार्ग पर लोगों को सर्वाधिक फजीहत का सामना करना पड़ रहा हैं। विगत एक दशक से सड़क जर्जर खस्ता हाल होने के कारण मामूली बारिश ने भी मुसीबत खड़ी कर दी। लोगों को कहना है कि समय रहते जलनिकासी व्यवस्था पर अभी से काम शुरु नहीं किया गया तो आने वाले समय में लोगों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा।

स्थानीय निवासी सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार गुप्ता ने बताया कि सड़क को बनवाने के लिए सीवर व्यवस्था दुरुस्त करवाने के लिए कई बार लोगों ने जनप्रतिनिधियों से लेकर आलाधिकारियों तक गुहार लगाई लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर प्रधानमंत्री मोदी ने बतौर सांसद प्रथम चरण में गोद लिए आदर्श गांव जयापुर भी है। जयापुर जाने के लिए यह मुख्य मार्ग है इसके बावजूद भी ये सड़क जर्जर हालत मे है।

स्थानीय निवासी सत्यनारायण कनौजिया ने कहा कि अगर इससड़क निर्माण नहीं हो पा रहा है सड़क के जानलेवा गड्डे मे हमेशा जलजमाव बना रहता है तो क्यों नहीं यहां बेरोजगार लोगों को मछली पालन के लिए दिया जाए। उन्होंने कहा कि लोगों का आक्रोश सरकार के खिलाफ बढ़ता ही जा रहा है जो एक बडे आंदोलन का रूप धारण कर लेगा जिसकी समस्त जिम्मेदारी सरकार की होगी।

Photos 08/04/2018

बनारस की रहने वाली है पूनम यादव, कॉमनवेल्थ गेम में स्वर्ण पदक जीतकर बढ़ाया देश का मान

वाराणसी. कॉमनवेल्थ गेम 2018 में बनारस की बेटी पूनम यादव ने स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया है। पूनम यादव ने 69 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। 22 साल की पूनम यादव ने राष्ट्रमंडल खेल 2014 में 63 किग्रा भार वर्ग में कांस्य पदक जीता था। पूनम यादव ने पहले प्रयास में 95, दूसरे में 98 और तीसरी कोशिश में 100 किलो वजन उठाया। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 122 किग्रा रहा। इस तरह उन्होंने कुल 222 किग्रा वजन उठाकर स्वर्णपदक अपने नाम कर लिया।



कौन है पूनम यादव !
बनारस से 7 किलोमीटर दूर बसे गांव दादूपुर की रहने वाली पूनम यादव का जीवन गरीबी से लड़ते हुए बीता है। इनके पिता एक किसान है। खेती और पशुपालन के सहारे अपने परिवार की जीविका चलाते हैं। पूनम के पिता ने अपनी बेटियों को वेट लिफ्टिंग सिखाने के लिए अपनी भैस तक बेंच दी थी। इतना ही नहीं 7 लाख रुपए कर्ज भी लिया था। पूनम की बहनें शशि और पूजा भी वेटलिफ्टिंग की तैयारी में जुटी हैं। पूनम यादव वर्तमान में रेलवे में टीटीई के पद पर कार्यरत हैं। ग्लासगो में वह पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स खेली थीं।

पूनम यादव ने इससे पहले 2015 में इस टूर्नामेंट- 2014, ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स: 63 किलोग्राम कैटेगरी में ब्रॉन्ज, 2014, अलमाटी (कजाखिस्तान) वर्ल्ड चैम्पियनशिप: 63 किग्रा कैटेगरी में 20वें नंबर पर रहीं थीं। 2015 में पुणे में हुई कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप: 63 किग्रा कैटेगरी में गोल्ड, 2017 में कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप (गोल्ड कोस्ट): 69 किग्रा कैटेगरी में सिल्वर, 2017- अनॉहाइम (अमेरिका) में हुई वर्ल्ड चैम्पियनशिप: 69 किग्रा कैटेगरी में 9वें नंबर पर रहीं थीं। तब उन्होंने 218 किग्रा (स्नैच में 98 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 120 किग्रा) का वजन उठाया था।

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