आप सभी को मेरा नमस्कार।
एक कहावत है नाम बड़े और दर्शन छोटे ये बिल्कुल सही बैठ रहा है थामा फिल्म के लिये।
बॉलीवुड वालों का कुछ समझ नहीं आता की वो करना क्या चाहते है?
नकल भी कर रहे है तो पूरी तरह से नहीं कर पा रहे है। थामा फिल्म जो एक तरह से देखा जाये तो हॉलिवुड वालों के ड्रैकूला से प्रेरित तो है पर हमारे बॉलीवुड वालों ने उसमें भारतीय पौराणिक कथाओं को जोड़ कर बेताल बना दिया है।
वो एक मशीन है ना जिसमे इधर से आलू डालो तो उधर से सोना निकलता है कुछ उसी के माफिक बॉलीवुड वालों ने इधर से ड्रैकूला डाला और उधर से निकला बेताल।
थामा एक हॉरर कॉमेडी फिल्म है जिसमे ना ही ढंग से हॉरर है और ना ही कॉमेडी।
फिर भी ये फिल्म इसलिये भी चल सकती है क्योंकि इसके निर्माता के सर पर "स्त्री " का हाथ है। मतलब इस फिल्म के निर्माता ने ही स्त्री,स्त्री 2,मुंजया,भेड़िया जैसे हॉरर कॉमेडी फिल्म बनाई है।
अब फिल्म तो मैंने देख ली और मेरे हिसाब से फिल्म का विएफएक्स जबरदस्त है पर कहानी औसत।
मतलब नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे मंझे हुये कलाकार, आयुष्मान खुराना जैसे बेहतरीन अभिनेता भी इस कमजोर कहानी में अपना बेहतरीन अभिनय तो दिखा सकते है पर फिल्म अब कैसा प्रदर्शन करती है ये तो दर्शक ही तय करेंगे।
टाइम पास करने के लिये अच्छी फिल्म है एक बार तो देख ही सकते है।
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A***n Shashank
Arsu Ki Chaupal
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शीर्षक- माँ फिल्म की समीक्षा
प्रमुख कलाकार-काजोल,रोनित रॉय,इत्यादि।
फिल्म प्रकार-पौराणिक,डरावनी
आप सभी को मेरा नमस्कार।
मैं आर्यन शशांक इस लेख क माध्यम से आप सबको पूरी ईमानदारी से देने वाला हूँ नई रिलीज माँ फिल्म की समीक्षा।
मुझे बचपन के दिनों से ही भूत प्रेत की फिल्मों से काफी लगाव रहा है जो की बढ़ते उम्र के साथ बढ़ती चली आ रही है। पर जो डर का माहौल और आतंक बचपन के दिनों के फिल्मों और टीवी शो से बनते थे वो आज कल के सिनेमा में कहीं नज़र नहीं आता।
पहले की फिल्म के निर्देशक रामसे बंधुओ की लगभग सारी फिल्में इतनी भयानक और डरावनी होती थी की अकेले जाने में भी डर लगता था या फिर टीवी पर आहट या फिर रात होने को है जैसे सीरियल ने तो हमें अकेले सोने भी नहीं देता था किन्तु आज कल के भूत प्रेत की फिल्में अकेले देख लेने पर भी डर नहीं लगता।
हाल में रिलीज हुई फिल्म माँ जिसका ट्रेलर देख कर मन खुश हो गया था अरसो बाद कोई ढंग की भूत वाली फिल्म देखूँगा पर जब फिल्म देखने बैठा तो डरना तो दूर की बात समझ ही नहीं आया की डरना कब है।
फिल्म की शुरुआत होती है चंदनपुर गाँव से जो पश्चिम बंगाल में है वहाँ पर एक खास परिवार में जब भी कोई बेटी जन्म लेती है तो उसे शैतान को बलि के रूप में भेंट चढ़ना पड़ता है ऐसा उस परिवार और गाँव वालों का मानना है पर उसी परिवार का एक सदस्य (काजोल का पति) अपनी बेटी को उस गाँव से दूर रख कर हंसी खुशी रह रहा होता है।
इसी बीच एक रात उसे एक फोन आता है जहां उसे पता चलता है की उसके पिता की मौत हो गई है। वो फौरन अपने गाँव चंदनपुर को जाता है और अपने पिता के अंतिम संस्कार को करने के बाद वापस निकल पड़ता है पर रास्ते में ही उसे शैतान मार देता है।फिर काजोल और उसकी बेटी का उदास होना और रोना जैसा दृश्य चलता है।
इसी बीच उस गाँव का सरपंच(रोनित रॉय) काजोल को फोन कर के रोहित की आखिरी इच्छा के बारे में बताता है जिसे पूरा करने के लिये काजोल अपनी बेटी को साथ ले कर चंदनपुर गाँव को रवाना होती है।
वहाँ जाने के बाद से कुछ डरावने दृश्य आते है, शैतान काजोल की बेटी को अगवा कर लेता है जिसको बचाने के लिये काजोल काली माँ की पूजा करती है और फिर अपनी बेटी को बचाने के लिये निकल पड़ती है।
अब फिल्म में हीरो हो या हिरोइन हारना तो विलेन को ही है। शैतान को काजोल मार देती है और अपनी बेटी को बचा लेती है।
मेरे हिसाब से कहानी अच्छी थी पर और भी बेहतरीन हो सकती थी।
शैतान का परिचय जितना भयावह बताया गया था उतना था नहीं।
दर्शकों को डर भी डर डर कर डरा रही थी।
मेरे तरफ से 5 में से 2 स्टार।
आप मेरी समीक्षा पर नहीं जाइये ये मेरे अपने निजी विचार है आप सपरिवार फिल्म का आनंद ले सकते है।
✍️
आर्यन शशांक
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