25/02/2018
ओ शिव से अपनी तुलना करने वालों
स्वयं के मद में मदमस्त रहने वालों
समुद्र मंथन का भी वह पल याद कर लो
क्या शिव के बिन मंथन हो सकता था ?
बासुकी को भी तो शिव ने ही दिया था |
आदि योगी को किस बात की इच्छा थी ?
उसकी तो सब इच्छाएँ शेष पड़ी थी ,
फिर भी; मंथन का आधार वही था ;
सबकी , देवों और दानवों की
कुछ न कुछ इच्छा थी स्वयं विष्णु भी ; सर्वज्ञ; वहीँ थे
किसी को रत्नों , किसीको अमृत घट की ही पड़ी थी
शिव ने तो कालकूट को ही पिया था |
चन्द्रमा से अपने को शांत; सुषोभित किया था
हर परिस्थिति में स्वयं को एकरूप शांत रखने पर
योग ध्यान में रत रह; शक्ति संजोने पर
अपनी नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का चिंतन करने पर
कालकूट भी पानी बन जाता है
यही तो शिव हमें समझाता है
काम, क्रोध , लोभ , मोह , मद , मात्सर्य से विरत वही है
पर परिवार का महत्व जो समझा , शिव वही है|
सांप , मोर मूषक में जो प्रेम करादे शिव वही हैं
सिंह के साथ बैल भी जिसके परिवार में हो शिव वही है
नर-नारायण , देव-दानव , भूत पिशाच भी जिसकी माने , शिव वही है
पत्नी के यज्ञकुंड में जाने पर; जो महाकाल; प्रलय ला दे ; शिव वही है
है छोटा सा परिवार जिसका
है हम दो हमारे दो का ज्ञान जिसका
है पूरा का पूरा संसार जिसका
हाँ ! वही शिव है |
Post by : Shri Himanshu Chaudhary
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25/01/2018
एक बिना देश वाला धर्म भी है? आप जानते हैं क्या?
एक बिना देश वाला धर्म भी है? आप जानते हैं क्या? - rightlog.in
पुरे विश्व में एक भी हिन्दु देश नहीं है (अधिकारिक रूप से)। हिन्दू एक देशरहित धर्म है (Hinduism is a stateless religion)। आखिरी हिन्दू देश ...
13/01/2018
A large step for a man, a failure of mankind.
Mr. Jalandhar Nayak has cut 2 mountains through in past 2 years. He wants to connect his village to a city 15km away so that his children can go to school. Yet another feat of a man literally against mountaneous odds after Mr Dasrath Majhi. Commendable job indeed. A man wins, a system fails. Even in this day and age our citizens are at odds with nature for as basic amenities as education, electricity, roads and health . Isn't it unfortunate that such mammoth tasks have to accomplished by a man on its own for such basic needs? If it is not a failure of our admin/ govt /system then what it is?
If after 70 yrs of independence we can't provide our citizens a decent life then for what our forefathers sacrificed their lives? Is this the country that they had envisioned? Have we done our best to build a nation?
Why do we need super humans? Why can't we come with robust systems instead? My questions are not only for those in power/ position but to everyone. Govt is just a reflection of its society. Do we as citizens fulfil our duties or are we at least aware of them? We need to honestly answer these questions and act upon them if we dont want that 70 years later our grand children write something like this again
Capt Jitender Yadav via LinkedIn
02/12/2017
What is worse than a looser? It is someone who looses badly.
sweeps . Opposition leaders are still busy blaming EVMs and emphasizing that it is not a mandate for and .
I wonder what it would take them to realise that maybe times have changed. Maybe political scenario is changing, if not already have changed for better. Maybe electorate no longer wants to choose "Lesser of the two evils ". May be it is time to shift focus from highlighting the flaws in others and focus on how can they be better.
Is a clean, development focused and national interest politics so difficult? Is it too much to ask them to do their job, in true sense, for which they were elected in first place?
There are countries which are much more developed than us. There is no dearth of issues upon which elections are fought. Whenever issue pertaining to national interest arises they stand United. Why can't we do the same?
Electorate of this country have endured /supported tough decisions by govt. People across different stratas have come together to support movements of change. They have given a loud and clear msg. It is upon political class to understand it and act as per the will of governed- that is actually how things should work in Democracy.
Capt Jitender Yadav follow on Twitter :
30/07/2017
Cover Page of our Aug-17 issue.
21/07/2017
रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनना बताता है कि अब देश में आरक्षण खत्म होना चाहिए।
रामनाथ कोविंद जी का राष्ट्रपति बनना सुखद है। सुखद के साथ साथ यह एलान करता है कि अब देश में जातिगत भेदभाव की वजह से किसी की तरक्की नहीं रुक सकती है। जिसमें संघर्ष है। मेहनत है। लक्ष्य के प्रति इमानदारी है। वह जीत सकता है। बावजूद इसके कि वह दलित ही क्यों न हो। भारत में कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन हो सकता है। बावजूद इसके कि वह किसी भी जाति का क्यों न हों। यह पैमाना है कि अब देश में जातिगत आरक्षण खत्म होना चाहिए। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो यह सिर्फ लोगों के हुनर खत्म करने का रास्ता बचेगा। शायद यही वजह है कि देश की कई जातियां संघर्ष कर रही है कि उन्हें पिछड़ा माना जाए। जब पूरी दुनिया आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रही हो उन सालों में हमारे देश में इस बात के लिए आंदोलन किया जा रहा है कि उन्हें पिछड़ा मानो। बल्कि होना तो यह चाहिए कि लोग कहे हमें मौका दो और हम आपने को साबित करेगें। लेकिन सरकार के लिए यह मानना मुश्किल होगा। सरकार के लिए यह सुविधा जनक है कि एक हजार में से कुछ लोगों के लिए फायदा दे दो। उसकी तुलना में यह काम मुश्किल है कि एक हजार लोगों को काबिल बना दो। और वे आरक्षण की जगह मौका मांगे। अवसर मांगे। अपने आप को साबित करने के लिए।
20/07/2017
जब सेना जान बचाती है। तब कहां शर्म से छुप जाते हैं पत्थरबाज।
जम्मू कश्मीर के नौशहरा में मंगलवार को पाक ने फायरिंग की । इसमें सीमा से सटे सरकारी स्कूलों के 200 से ज्यादा बच्चे फंस गए। इन बच्चों को सेना ने बुलेट प्रूफ वाहनों से बाहर निकाला। ये कोशिश देर रात तक जारी रही। ये बच्चे एलओसी के नजदीक कदाली के सरकारी स्कूल से बचाए गए। ठीक इसी तरह पिछले साल जब बाढ़ आई थी भारतीय सेना ने अपनी जान की बाजी लगाकर कई लोगों की जानें बचाई थी। जब में रेस्क्यू आपरेशन की तस्वीरे देख रहा था। मुझे अचानक याद आया। सेना के आपरेशन्स का विरोध करने वाले पत्थरबाज अब कहां हैं। क्या वे ऐसे मौके पर शर्म से कहीं छुप जाते है। जब हमारी सेना आंतकवादियों से मुकाबला करती है तब तो यही लोग खूब पत्थर बरसाते हैं। जब वही सेना इन्हीं लोगों के परिवार वालों की जान बचाती है तब कहां बेशर्मी की चादर ओड़ कर सो जाते हैं। कभी तुम्हारा जमीर जगे और याद आए कि सेना के जवान किस तरह से तुम्हारी मुश्किलों में तुम्हारे साथ खडे़ हो जाते है तो पत्थर की जगह कोई एक आध व्यक्ति फूल भी बरसा देना। मुझे इंतजार रहेगा
19/07/2017
मायावती का इस्तीफा या राजनैतिक ड्रामेबाजी
इस तरह का माहौल बनाने में। हमारे नेता सफल है। इतने सालों में राजनैतिक दल भी सफल कहे जा सकते है। खासकर इस बात पर कि अगर आप किसी भी दलित नेता का विरोध करो तो लगता है कि हम दलित विरोधी है। अगर हम कहे कि मायावती अपने खिसकते जनाधार और बंटते वोट बैंक से खासी परेशान है। उन्हें कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। कुछ महीनों बाद उनकी राज्यसभा खत्म होने वाली थी। और अब उनके पास इतने वोट नहीं है कि वे फिर से जीत कर आती। सो उन्होंने एक पटकथा लिखी और अपना इस्तीफा दे दिया। अब वे फिर घूम सकती है। हर शहर में यह आरोप लगाते हुए कि दलितों की आवाज को राज्यसभा में दबाया जा रहा है। और में कु्र्बानी देकर आई हूं। लेकिन अगर इतने बार की मुख्यमंत्री रहने के बाद भी मायावती की आवाज को दबाया जा सकता है। तो फिर सत्तर साल का सरकारी पूरा आंदोलन ही फैल हो गया। अगर मायावती आज भी शोषित हैं। उनकी आवाज दबाई जा रही है। तो फिर यह देश इतने सालों से किसके लिए काम कर रहा है। अगर लोकसभा स्पीकर। मुख्यमंत्री। राष्ट्रपित जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बाद भी अगर हम किसी भी दलित को ताकतवर नहीं बना पाए। तो कहीं न कहीं हमारी सोच गलत है। अगर मीरा कुमार आज भी कमजोर है। मायावती की आवाज अगर आज भी दबाई जा सकती है तो फिर हमें इस पूरे विषय को फिर से सोचना चाहिए।
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18/07/2017
क्या हमारी काबलियत पर जाति की पहचान हावी है।
राष्ट्रपति पद के लिए वोटिंग हो गई। यह लगभग तय हो गया है कि अगला राष्ट्रपति कौन होगा। फिर भी इस चुनाव में इतना रस नहीं आया। लेकिन जिस तरह से इस चुनाव में उम्मीदवार खड़े किए गए उससे लोगों को हैरत जरूर हुई। राष्ट्रपति का पद देश का सबसे गरिमामय पद है। लिहाजा इसका चुनाव उसी गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। काबलियत की मिसाल बन जए। यह पैमाना हमें बनाना चाहिए। लेकिन जिस दिन से बीजेपी ने अपना उम्मीदवार घोषित किया उसी दिन से चर्चा सिर्फ इस बात पर हुई कि वे दलित है। अखबारों में आया कि बीजेपी का दलित कार्ड। कई पार्टियों को इनका विरोध करना मुश्किल होगा। इसका जबाव कांग्रेस ने भी दलित कार्ड से ही दिया। दोनों ही उम्मीदवार काबिल और जानकार है। लेकिन उनकी काबलियत और जानकारी पर कोई चर्चा नहीं हुई। पूरे समय सिर्फ दलित कार्ड पर ही चर्चा हुई। क्या हमारा तमाम हुनर। त्याग। अऩुभव। देश के लिए काम। इनकी कोई कसोटी नहीं। क्या सिर्फ हमारी पहचान हमारी जाति होगी। और अगर हमारी पहचान सिर्फ जाति से होनी है तो फिर तो मुश्किल हो जाएगा। लोग इस पहचान को और ज्यादा मोटे अक्षरों में लिखेंगे। और समाज जातियों के आधार पर कई खानों में बटता रहेगा। हम चाहतें है कि देश से जातिय़ां खत्म हो। लेकिन हमारी राजनैतिक पार्टियों के काम इसके उलट हों रहें हैं। वे जातियों की पहचान को और मजबूत कर रही हैं।। उम्मीदवार कोई भी हो। अगर उसकी काबिलयत पर चर्चा हो। उसकी इमानदारी पर चर्चा हो। उसके त्याग पर चर्चा हो। फिर दूसरी पार्टी भी उसकी टक्कर का उम्मीदवार खोजकर लाए. क्या आपको नहीं लगता कि इस प्रक्रिया से हम ज्यादा बेहतर अपने नेता खोज पाएगें.। बजाए जाति के कार्ड से ।
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