08/05/2022
अवर्णनीय,अज्ञय वनस्पतियों,झीलों,कुंदराती झाड़ियों का लचीला " #स्नेह" और किन्हीं बेमेल समांतर नदियों का किसी प्रयाग तट पर मिलकर अंत में एश्चुरी के त्रिकोणीय विस्तार की सागर से मिलने वाली " #तृप्ति" , गंगा ब्रहमपुत्र नदी के डेल्टा पर उपजे सुंदरवन के समान पनपे " #स्नेह "
या सहारा-गोबी रेगिस्तान के मरुस्थल की तमाम बालू के एक-एक कण में व्याप्त श्वेत अभ्रक कि गिनती जितनी "करूणा"लिए हमारी #मांए हमें संवारती है। मां नि:स्वार्थ प्रेम हमें संवारती है। #मां का नि:स्वार्थ प्रेम
"झेलम-सतलज" जितना गहरा है, लेकिन उसी गहराई में ट्रेंच जितने गहरे खड उसी गहराई को भींची आंखों से देखिए....कराहती वनस्पतियां कुंदराती झाड़ियों वाली तृप्ति मिलेगी हम 9 महिने पेट में और तमाम उम्र मां के दिल में बसे रहते हैं।
मां के बारे में लिखने के लिए.. आकाश जितना स्याह पत्र और ..समंदर जितनी स्याही चाहिए
होती है.....दुनिया की तमाम मांओं को.... मातृदिवस ढेर सारी शुभकामनायें और मेरा सादर प्रणाम 🌺🌼🙏

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